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छोटे-छोटे बच्चों ने बनाया ऐसा 'बैंक', जहां रुपया-पैसा नहीं, कूड़ा, कचरा होता है जमा

देश को प्लास्टिक मुक्त करने के लिए छोटे- छोटे बच्चे आगे आ रहे हैं. स्कूली बच्चों ने पेरेंट्स की मदद से मिल कर 'सफाई बैंक' बनाया है. 

छोटे-छोटे बच्चों ने बनाया ऐसा 'बैंक', जहां रुपया-पैसा नहीं, कूड़ा, कचरा होता है जमा

नई दिल्ली: देश को प्लास्टिक मुक्त करने के लिए छोटे- छोटे बच्चे आगे आ रहे हैं. स्कूली बच्चों ने पेरेंट्स की मदद से मिल कर 'सफाई बैंक' बनाया है. इस बैंक के जरिए प्लास्टिक वेस्ट लैंडफिल साइट में जाने की बजाए इसका इस्तेमाल सीमेंट फैक्ट्रियों और रोड बनाने के लिए किया जा रहा है. बिस्किट्स, नमकीन, चिप्स, चाय पत्ती के पैकेट. मैगी से लेकर सर्फ़ तक हर चीज़ प्लास्टिक पैकिंग में आती है. और ये पैकिंग एक बार इस्तेमाल के बाद सीधा कचरे के ढेर में जाती है. लेकिन यहां जमा ये पैकेट लैंडफिल में नहीं जाएंगे. बल्कि ये कूड़ा, कचरा सफाई बैंक में जमा होंगेेे.

क्या है ये सफाई बैंक?
क्या है ये सफाई बैंक? इस बैंक में क्या जमा होता है? कौन चलाता है इस तरह के सवाल आपके जहन में आ सकते हैं. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि ये बैंक कोई बिजनेस मैन नही बल्कि छोटे छोटे बच्चे मिल कर चला रहे हैं. और इसमें इक्ठ्ठा होते हैं प्लास्टिक के रैपर. और ये रैपर अलग से इसलिए इकट्ठे किए जा रहे हैं ताकि ये बाकी कूड़े के साथ मिल कर कचरे के ढेर में न पहुंचे. अर्यन 4th क्लास में पढ़ता है. छोटी सी उमर मे आर्यन ने  पर्यावरण को प्लास्टिक से बचाने की बड़ी जिम्मेदारी ली है. ये जो भी खाता है उसका रैपर डस्टबीन में डालने की बजाय उसको अलग से जमा करता है.

इस काम में अर्यन के घर वाले भी उसकी पूरी मदद करते हैं. अर्यन हर महीने करीब 1000 प्लास्टिक के रैपर लैंडफिल साइट में जाने से बचाता है. आर्यन का कहना है कि प्लास्टिक को अगर रोड पर फेंक देंगे तो pollution होगा. मेरे सारे फ्रेंड्स के रैपर इकट्ठा करते हैं और इसे सफाई बैंक में भेज देते हैं.

आर्यन की दादी उषा सेनी बताती हैं कि प्लास्टिक को लेकर अब सतर्क होना होगा प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त को सिंगल यूज़ प्लास्टिक को इस्तेमाल ना करने का लोगों से अनुरोध किया है. ये काम उसी दिशा में हो रहा है. आम बैंकों की तरह सफाई बैंक की भी देश में अलग अलग शहरों में शाखाएं हैं. जहां इसके वालंटीयर स्कूलों में जा कर बच्चों को प्लास्टिक से होने वाले नुकसान के बारे में बताते हैं. साथ ही प्लास्टिक के रैपर इकट्ठे करके उनको सफाई बैंक में जमा करने के बारे में बताते हैं. 

सफाई बैंक में इक्ट्ठे हुए ये प्लास्टिक के रैपर अखिर जाते कहां हैं ?
लेकिन सफाई बैंक में इक्ट्ठे हुए ये प्लास्टिक के रैपर अखिर जाते कहां हैं ? सबसे पहले ये बच्चे अपने घरों में ये रैपर जमा करते हैं. कम से कम 1000 रैपर इक्ट्ठा होने पर सिटी कॉर्डीनेटर को बता दिया जाता है. इसके बाद जगह इकट्ठे हुए ये रैपर सिटी कॉरडीनेटर के पास जाते हैं और वहां से इनको रोड बनाने, सीमेंट बनाने और वेस्ट टू एनर्जी प्लांट में भेज दिया जाता है. सफाई बैंक की सिटी कॉर्डिनेटर मनीषा सैनी का कहना है कि अगर हर कोई अपने घर से निकने वाले प्लास्टिक वेस्ट की ज़िम्मेदारी ले ले तो हम कुछ ही सालों में इस समस्या से बाहर आ सकते हैं.

सफाई बैंक की अब तक अलग अलग शहरों में क़रीब 105 ब्रांच बन चुकी हैं.
हम स्कूल कॉलेज में जाकर लोगों को प्लास्टिक के ख़िलाफ़ इस अभियान के बारे में जागरूक करते हैं इसमें सबसे अच्छा जो रेस्पॉन्स आता है वो छोटे छोटे बच्चों की तरफ़ से आता है. जिस तरह से हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने सिंगल यूज़ प्लास्टिक के ख़िलाफ़ संकेत दिए हैं हमारी कोशिश भी यही है की इसमें हम भी उनका साथ दें.सफाई बैंक की अब तक अलग अलग शहरों में क़रीब 105 ब्रांच बन चुकी हैं.

जिनमे दिल्ली मुंबई, जमशेदपुर, चेन्नई, गुड़गाँव, नॉएडा जेसे बड़े शहर शामिल हैं.जिनमे कुल 12 लाख से ज़्यादा पैकेट अब तक रोड बनाने या सिमेंट फ़ैक्टरी में भेजे जा चुके हैं. भारत में हर साल क़रीब 6 करोड़ टन प्लास्टिक वेस्ट निकलता है. अपने देखा होगा कि आपके घर तक पहुँचने वाले प्लास्टिक रैपर के अंदर सिल्वर कोटिंग होती है. इस तरह के पैकेट को MLP multi layer packaging कहते हैं.ये पैकेट कई तरह की प्लास्टिक से मिल कर बनते हैं. जिसे रीयूज़ नही किया जासकता. सफ़ाई बैंक की यही कोशिश होत है कि इस तरह कीप्लास्टिक को लैंड्फ़िल तक जाने से रोका जाए और इसका दोबारा इस्तेमाल किया जा सके.