CIA Nuclear Device Himalayas: कोल्ड वॉर के दौरान अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA ने भारत के साथ मिलकर हिमालय में एक सिक्रेट मिशन किया था. इसका मकसद चीन की मिसाइल एक्टिविटीज पर नजर रखना था. CIA ने हिमालय में एक न्यूक्लियर डिवाइस खो दिया था और ऐसा माना जाता है कि वो अब भी वहीं है.
Trending Photos
)
CIA Nuclear Device Himalayas: साल 1965 में कोल्ड वार चल रही थी. उसी दौरान चीन ने अपना परमाणु परीक्षण किया. इससे अमेरिका की चिंता बढ़ गई. CIA चाहती थी कि चीन की मिसाइल टेस्टिंग पर गुप्त नजर रखी जाए. इसलिए उसने योजना बनाई कि हिमालय की ऊंची चोटी नंदा देवी पर एक न्यूक्लियर-पावर्ड एंटीना लगाया जाए, जिससे चीन और तिब्बत के इलाके साफ दिखाई देते थे.
बता दें कि इस मिशन के लिए Americans और Indian mountaineers की एक टीम बनाई गई. उनके साथ एंटीना, केबल और SNAP-19C नाम का 13 किलो वजनी जनरेटर जैसे सामानों को ले जाया गया. इस जनरेटर के अंदर प्लूटोनियम मौजूद था, जिसकी मात्रा नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम में इस्तेमाल हुए प्लूटोनियम का लगभग एक-तिहाई थी.
ऐसे हुआ गुप्त ऑपरेशन
ऑपरेशन को सिक्किम साइंटिफिक एक्सपेडिशन का नाम दिया गया, जिससे किसी को बिल्कुल शक न हो. इस मिशन की योजना एक कॉकटेल पार्टी में रखा गया था. यहीं पर अमेरिकी वायुसेना प्रमुख जनरल कर्टिस लेमे और नेशनल जियोग्राफिक के फोटोग्राफर व पर्वतारोही बैरी बिशप के बीच बातचीत हुई थी. बिशप ने बताया कि हिमालय की चोटियों से चीन साफ नजर आता है. इसके बाद CIA ने बिशप से सिक्रेट मिशन को करने के लिए कहा. भारत भी इसमें चुपचाप शामिल भी हुआ क्योंकि 1962 के युद्ध के बाद चीन को लेकर डर था. भारतीय टीम मशहूर पर्वतारोही कैप्टन एम.एस. कोहली लीड कर रहे थे.
सितंबर 1965 में चढ़ाई शुरू हुई. टीम को जल्दी-जल्दी हेलिकॉप्टर से ऊंचाई पर ले जाया गया, यही कारण रहा की वो अपने आपको मौसम के हिसाब से नहीं ढाल पाए, कई लोग बीमार भी पड़ गए. हालांकि साथ में ले जाया गया प्लूटोनियम जनरेटर गर्मी छोड़ता था और इससे ठंड में राहत भी मिलती थी. उस समय किसी को इसके radioactive होने का अंदाजा नहीं था. जब 16 अक्टूबर 1965 को शिखर के पास अचानक भीषण बर्फीला तूफान आ गया था तो हालात काफी बिगड़ गए, ऐसे में जान बचाना मुश्किल हो गया. नीचे एडवांस बेस कैंप से कैप्टन कोहली ने रेडियो पर मैसेज भेजा कि तुरंत वापस लौटो और डिवाइसेस को वहीं सुरक्षित जगह पर छोड़ दो.
गायब हुआ न्यूक्लियर डिवाइस
तेज तुफान से बचने और नीचे वापस उतरने के लिए, टीम ने सभी डिवाइसेस को कैंप फोर के पास बर्फीली चट्टान पर छिपा दिया. उसके बाद जान बचाकर टीम नीचे उतर आई. अगले साल जब टीम उसे वापस लाने लौटी तो वहां कुछ भी नहीं था. पूरा इलाका हिमस्खलन में बह चुका था. चट्टान, बर्फ और वह परमाणु उपकरण सबकुछ अपनी जगह से गायब हो चुका था. हालांकि इसके बाद कई सर्च ऑपरेशन चलाए गए. रेडिएशन डिटेक्टर और इंफ्रारेड सेंसर का भी इस्तेमाल किया गया लेकिन कुछ भी नहीं मिला. जिम मैकार्थी का कहना है कि जनरेटर लगातार गर्म रहता था जिससे बर्फ पिघलती जाती थी, जिससे वह और नीचे धंसता चला गया होगा.
बता दें कि अमेरिका ने इस मिशन को कभी ऑफिशियली स्वीकार ही नहीं किया. साल 1978 में पत्रकार हॉवर्ड कोन ने इस घटना का खुलासा किया जिसके बाद भारत में विरोध प्रदर्शन हुए. लोगों को डर था कि प्लूटोनियम गंगा नदी के ग्लेशियरों को प्रदूषित कर सकता है. मामला बढ़ने पर अमेरिका के राष्ट्रपति जिमी कार्टर और भारत के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने गुप्त रूप से बातचीत करके पूरी स्थिति को संभाला.
जानकारी के लिए बता दें कि इस मिशन में शामिल ज्यादातर लोग बहुत बुजुर्ग हो चुके हैं या दुनिया में नहीं हैं. जिम मैकार्थी आज भी मानते हैं कि गंगा को पानी देने वाले ग्लेशियर के पास प्लूटोनियम छोड़ना बहुत बड़ी गलती थी. वहीं कैप्टन एम.एस. कोहली ने अपने जीवन के अंत में माना कि यह मिशन उनके जीवन का सबसे दुख वाला लेशन था.