ZEE जानकारी: सड़क पर सिस्टम प्रायोजित आतंकवाद का पूरा विश्लेषण

हमारे सिस्टम ने लोगों को नियमों का उल्लंघन करने का लाइसेंस दिया हुआ है.

ZEE जानकारी: सड़क पर सिस्टम प्रायोजित आतंकवाद का पूरा विश्लेषण

हैदराबाद में एक अपराधी दो साल से बिना लाइसेंस के ट्रक चला रहा था. सिस्टम ने उसे रोका नहीं और परिणाम ये हुआ कि ये अपराधी एक चलता फिरता आतंकवादी बन गया..जिसके पास किसी का भी रेप करने और उसकी हत्या करने का लाइसेंस था. लेकिन दिल्ली में 3 युवाओं की जान सिर्फ इसलिए चली गई क्योंकि वो तेज़ रफ्तार से स्कूटी चला रहे थे, ट्रिपलिंग कर रहे थे और उन्होंने हेलमेट भी नहीं पहना था. शायद उनके माता पिता ने भी उन्हें स्कूटी चलाने से मना नहीं होगा. ये लड़के तेज़ रफ्तार में एक खंबे से टकरा गए और तीनों की जान चली गई. ये युवा ना सिर्फ बिना हेलमेट के स्कूटी चला रहे थे..बल्कि इनकी स्कूटी की स्पीड भी बहुत ज्यादा थी. यानी दिल्ली की सड़कों पर वाहन चलाने से जुड़े सभी नियमों का उल्लंघन एक साथ हो रहा था. लेकिन किसी ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया.

NCRB के आंकडों के मुताबिक वर्ष 2017 में 48 हज़ार 746 दो पहिया वाहन चालकों की जान सड़क दुर्घटनाओं में गई थी. इनमें से 73 प्रतिशत वाहन चालकों ने हेलमेट नहीं पहना था. सड़क दुर्घटनाओं में मरने वाले लोगों में से 33 प्रतिशत दो पहिया वाहन चालक ही होते हैं. NCRB के इन आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर घंटे 4 दो पहिया वाहन चालकों की मौत हेलमेट ना पहनने की वजह से होती है. ये आकंड़े हर साल बढ़ जाते हैं.

लोग बिना हेलमेट और बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाना नहीं छोड़ते. कई मामलों में वाहन चालक खुद मारे जाते हैं. तो कुछ में ये दूसरों की जान ले लेते हैं. कुल मिलाकर हमारे सिस्टम ने लोगों को नियमों का उल्लंघन करने का लाइसेंस दिया हुआ है. और ये लापरवाही अब एक तरह के आतंकवाद में बदल चुकी है जिसकी वजह से हर घंटे, हर मिनट लोगों की जान जा रही है.

चाहे हैदराबाद हो, दिल्ली या फिर देश का कोई और शहर हमारे सिस्टम का अपराधियों के साथ एक अदृश्य गठबंधन हो चुका है. ये गठबंधन सब चलता है वाली सोच से संचालित होता है. और ना तो अपराधों में कमी आती है और ना ही कानूनों का कोई असर होता है.

हैदराबाद में जो हुआ उसमें समाज भी दोषी है, सिस्टम भी और हमारी सरकारें भीं. गैंग रेप के आरोपी आपराधिक पृवत्ति के थे. लेकिन ना तो समाज ने उनकी पहचान की और ना ही हमारे सिस्टम ने. इसी वर्षफरवरी में केंद्र सरकार ने इमरजेंसी नंबर 112 की शुरुआत की थी. लेकिन देश के 10 राज्यों में अभी तक ये Helpline नंबर शुरु नहीं हुआ है. NCRB के आंकडों के मुताबिक साल 2017 में हुई दुष्कर्म की कुल वारदातों में से 24 प्रतिशत इन्हीं राज्यों में हुई थी. हैरानी की बात ये है कि जिन राज्यों में ये सेवा उपलब्ध है वहां भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ज़रूरत के वक्त आपको मदद मिल ही जाएगी. क्योंकि आज जब हमने नोएडा स्थित अपने ऑफिस से ONE ONE TWO पर कॉल किया..तो ज्यादातर Calls..यूपी पुलिस की बजाय..दिल्ली पुलिस को Transfer हो गई.

हैदराबाद में हुई वारदात को लेकर पूरे देश में प्रदर्शन हो रहे हैं. संसद में भी आज इस मुद्दे पर हंगामा हुआ. राज्यसभा सांसद जया बच्चन बलात्कार के अपराधियों को जनता के बीच सज़ा देने की मांग कर रही हैं. उन्होंने जिस तरह से अपनी मांग रखी आज उसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है.

हमारे देश में सड़कें सुरक्षित नहीं हैं. उन पर चलने वाली महिलाओं की सुरक्षा की भी कोई गारंटी नहीं है. दुनिया के कुल वाहनों में से सिर्फ 1 प्रतिशत भारत में हैं. जबकि दुनिया में होने वाली कुल सड़क दुर्घटनाओं में भारत की हिस्सेदारी 6 प्रतिशत है. सड़क पर 64 प्रतिशत मौतें Over Speeding की वजह से होती हैं. जबकि करीब 5 हज़ार लोगों की जान शराब पीकर गाड़ी चलाने की वजह से जाती है. वर्ष 2017 और 2018 में 14 हज़ार से ज्यादा लोगों की जान सड़क पर मौजूद गड्ढों की वजह से चली गई थी. यानी एक तरफ नेता और अधिकारी सड़क की क्वालिटी को कमिशन के रूप में पी जाते हैं. और दूसरी तरफ आम लोग भी धड़ल्ले से नियमों का उल्लंघन करते हैं.

NCRB के मुताबिक 2017 में भारत में 2 लाख 25 हज़ार से ज्यादा वाहन चोरी हुए थे. इन वाहनों का क्या हुआ ये किसी को नहीं पता. काले शीशे वाली गाड़ी में कौन बैठा है. ये भी किसी को नहीं पता. Pressure Horn पर भारी जुर्माना होने के बावजूद इसका इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है. Crash Guard पर पाबंदी के बावजूद...लोग अपनी गाड़ियों के बंपर पर ज़रूरत से बड़े Crash Guard लगवाते हैं. गैरकानूनी Modification करवाते हैं. ऊंची आवाज़ में Music बजाते हैं, गाड़ियों पर गैरकानूनी तरीके से अपनी जाति और धर्म से जुड़े Stickers लगाते हैं. ये लोग नियमों का उल्लंघन अपना रौब झाड़ने के लिए करते हैं. सड़कों पर अपनी हैसियत का इश्तेहार लेकर घूमते हैं और लोगों को डराते हैं.

यानी हमारे देश की सड़कों पर चलने वाली ज्यादातर गाड़ियां आतंक का पर्याय बन चुकी है. सड़क सुरक्षा से जुड़े एक NGO..The Traffic People के एक रिसर्च के मुताबिक भारत में एक आम आदमी अपने जीवन के औसतन 11 से 12 वर्ष सड़क पर सफर करते हुए गुज़ारता है. यानी ये 12 वर्ष ज्यादातर एक ऐसे आतंक के साए में गुज़रते हैं.

जिसने देश की आबादी एक बड़े हिस्से को अपना गुलाम बना लिया है. आज हमने Traffic Terrorism को लेकर देश के अलग अलग शहरों से Ground Reporting की है. ये रिपोर्टिंग देखकर आप समझ जाएंगे कि कैसे हमारे देश में सिस्टम, सरकारें और आम लोग मिलकर सड़कों वाले इस आतंकवाद को प्रायोजित करते हैं.