दलितों की बढ़ती नाराजगी के बीच BJP के किले में दरार!

इन्‍हीं परिस्थितियों में बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह बुधवार को लखनऊ पहुंच रहे हैं.

दलितों की बढ़ती नाराजगी के बीच BJP के किले में दरार!
बीजेपी के दलित सांसदों के बागी तेवर अपनाने के बाद पार्टी के भीतर चिंता बढ़ गई है.(फाइल फोटो)

दो अप्रैल को दलितों के भारत बंद और उसके बाद बीजेपी के पांच दलित सांसदों के अचानक 'बागी' तेवर दिखाने के बाद बीजेपी के भीतर बेचैनी बढ़ गई है. ऐसा इसलिए क्‍योंकि 2014 में बीजेपी को दलितों का बड़ा वोट मिला था. बीजेपी ने उस दौरान लोकसभा की 66 आरक्षित सीटों में से 40 सीटें जीती थीं. यानी कि बीजेपी ने ऐसी करीब 60 फीसदी सीटें जीती थीं. ऐसे में 2019 के चुनाव से पहले इस तरह के आंदोलन और दलित सांसदों के बागी तेवरों के कारण पार्टी में चिंता बढ़ गई है.  

चिंता की एक बड़ी वजह यह भी है कि जिन पांच दलित सांसदों ने पार्टी पर परोक्ष रूप से निशाना साधा है, वे सभी यूपी से ताल्‍लुक रखते हैं. यूपी से 2014 में बीजेपी ने सबसे ज्‍यादा लोकसभा सीटें जीती थीं. इन्‍हीं परिस्थितियों में बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह बुधवार को लखनऊ पहुंच रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक इस यात्रा के दौरान दलित सांसदों की नाराजगी को दूर करने का कोई फॉर्मूला पार्टी निकाल सकती है. इससे पहले सीएम योगी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात और उसके बाद प्रदेश अध्‍यक्ष डॉ महेंद्रनाथ पांडे की शीर्ष नेतृत्‍व से मुलाकात के बाद ही ऐसे किसी फॉर्मूले के निकाले जाने की चर्चा चल रही है.

महादलित और महापिछड़ा कार्ड
इस बीच गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनावों में सपा-बसपा के तालमेल के बाद कहा जा रहा है कि 2019 में भी ये गठबंधन होगा. इससे निपटना भी बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती होगी. सूत्रों के मुताबिक इसी की काट के लिए यूपी की योगी सरकार महादलित और अतिपिछड़ा कार्ड खेल सकती है. इस कार्ड का मकसद सपा-बसपा गठबंधन के प्रभाव को कम करना महादलितों एवं अतिपिछड़ों के भीतर सरकार को लेकर एक सकारात्मक माहौल बनाना है. सूत्रों के मुताबिक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के फॉर्मूले को उत्तर प्रदेश सरकार भी आजमा सकती है. नीतीश ने बिहार में महादलित और महापिछड़ों को जोड़ने का सफल प्रयोग किया था. इसके तहत यूपी में भी अब कोटे में कोटा की शुरुआत हो सकती है.

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बीजेपी में दलितों के लिए सबसे पहले बहराइच से सांसद सावित्री बाई फुले ने आवाज उठाई. उदित राज ने भी बागी तेवर दिखाए.(फाइल फोटो)

बदलते सियासी समीकरण
हालांकि इन सबके बीच राजनीतिक हलकों में यह भी कहा जा रहा है कि जिन दलित सांसदों ने आवाज उठाई है, उनमें से अधिकांश दलबदलू नेता हैं. अब सपा-बसपा की दोस्‍ती की आहट के बीच ये फिर से इन दलों की तरफ लौटने का रास्‍ता तलाश रहे हैं. मसलन दलितों के लिए रैली करने वाली बहराइच से सांसद सावित्री बाई फुले भले ही पिछले एक दशक से बीजेपी में हैं लेकिन उनकी पृष्‍ठभूमि बामसेफ और बसपा से है. इसी तरह दलितों के मुद्दे पर प्रधानमंत्री को खत लिखने वाले बिजनौर में नगीना के बीजेपी सांसद डॉ यशवंत सिंह रालोद और बसपा से विधायक रहने के बाद 2014 से ऐन पहले बीजेपी में शामिल होकर सांसद बने. अब अचानक उनके विद्रोही तेवर के बारे में कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में किसी अन्‍य दल से नई पारी शुरू कर सकते हैं.

सियासी हलकों में कमोबेश यही चर्चा रॉबर्ट्सगंज के सांसद छोटेलाल खरवार और मायावती सरकार में मंत्री रह चुके बीजेपी सांसद अशोक दोहरे के बारे में भी हो रही है. इसी तरह कई अन्‍य दलित बीजेपी सांसद भी विरोध करने का मन बना रहे हैं. जैसे कि यूपी के रहने वाले और दिल्‍ली से सांसद उदित राज ने भी दलितों के मुद्दे पर आवाज उठाई है. उन्‍होंने तो 2014 के चुनाव से पहले अपनी इंडियन जस्टिस पार्टी का बीजेपी में विलय कर लिया था.