डियर ज़िंदगी : नए 'रिवाज' कहां से आएंगे और कौन लाएगा...

डियर ज़िंदगी : नए 'रिवाज' कहां से आएंगे और कौन लाएगा...
हर युवा को अपने घर से उन विचारों को निकाल बाहर फेंकना होगा जो मानसिक बेड़ियों का काम कर रहे हैं.

आलोचना से डरना एक समाज के रूप में इस मायने में अच्‍छा है कि लोग आमतौर पर कुछ नियम-कायदों के बंधन को मान लेते हैं. समाज में इस आलोचना का डर कई बार क़ानून के डर के मुकाबले अधिक देखा गया है. तो समाज को व्‍यवस्थित करने के लिहाज से इसे ठीक कहा जा सकता है. लेकिन आलोचना अगर समाज के बदलाव के साथ अपने को अपडेट नहीं करती तो वह समाज विशेषकर युवाओं के पांव की बेड़ियों की भूमिका निभाने लगती है. यह बेड़ियां भारत जैसे ग्रामीण बहुल समाज में युवा सपनों के विस्‍तार में बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाती हैं. इसकी एक छोटी सी झलक हमें 'दंगल' के माध्‍यम से देखने को मिली. फ़ि‍ल्‍म के मुताबिक़ वहां बेटियों को इसलिए आगे बढ़ने से रोका जाता है क्‍योंकि वहां के समाज ने ऐसा कभी सोचा नहीं. 

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जब सोच इस दिशा पर चल पड़े कि अब तक ऐसा हुआ नहीं, इसलिए यह नया कदम उठाया नहीं जा सकता तो यह सबसे चिंताजनक स्थिति होती है. अगर राजा राममोहन राय सती प्रथा के बारे में यही सोचते और ईश्‍वर चंद्र विद्यासागर ने विधवा विवाह और महिलाओं की शिक्षा के बारे में वही रवैया अपनाया होता, जो उस समय के समाज का था तो आज हमारा समाज किस प्रकार का होता.

हमारे इन नायकों ने परंपरागत विचार को तर्क की कसौटी पर परखने का जोखिम उठाया. उन्‍होंने अपने विवेक, अध्‍ययन और चिंतन पर अधिक भरोसा किया, लेकिन इसके साथ ही उन्‍होंने सबसे अधिक भरोसा दिखाया था. मानवता के प्रति. स्त्रियों को जीवित जलाया जाना, पुरुष की मौत के बाद उनके साथ जानवरों जैसा जीवन जीने को विवश करना और लड़कियों की पढ़ाई के लिए संघर्ष की प्रेरणा उन्‍हें किसी स्‍कूल में नहीं मिली. यह उनकी वैज्ञानिक सोच और आलोचना से डरे बिना निर्भय होकर मानवता के पक्ष में खड़े होने के हौसले से संभव हुआ.

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एक समाज के रूप में बीते कुछ दशकों में हम वैचारिक शून्‍यता की ओर अग्रसर हैं. हमारे बीच अब ऐसे विचारकों और युवाओं की मौजूदगी में बड़ी-बड़ी शून्‍यता है. हमने राजनीति, विज्ञान के विकास को ही जीवन का केंद्र मान लिया है, हमने मनुष्‍य के समग्र विकास और समानता के अधिकार पर चिंतन समाप्‍त कर दिया है. आप युवाओं के बीच उनके संवाद को समझिए (कुछ समय पहले सीएसडीएस ने सर्वे किया था), उनके सोशल मीडिया कमेंट का अध्‍ययन कीजिए, तो आप पाएंगे कि राजनीति को हमने सबसे अधिक जगह दे रखी है, जबकि हमारे जीवन पर असर डालने वाले घिसे-पिटे रिवाज, महिलाओं और दलितों के साथ होने वाला अपमानजनक व्‍यवहार अब भी जारी है. ऐसे विषय कहीं भी समाज के मुख्‍य विमर्श का हिस्‍सा नहीं बन पा रहे हैं, जब तक ऐसा नहीं होगा, हमारे समाज में समग्र परिवर्तन संभव नहीं है.

हमें अपने घर से इन चीज़ो की शुरुआत करनी होगी, जो कि ग़ैर-बराबरी को जन्‍म देने वाली हैं. जैसे बेटे और बेटी से व्‍यवहार में अंतर. लड़कियों की शादी के दौरान बारातियों के अशिष्‍ट व्‍यवहार पर हमारी मौन सहमति. पढ़ी-लिखी, समझदार लड़कियों के लिए दोयम दर्जे के दब्‍बू और दकियानूसी लड़के का चयन. जब तक हम युवा इन विषयों पर मौन रहेंगे, इस डर से कुछ नहीं बोलेंगे कि हमारे घर के बड़े नाराज़ हो जाएं, तब तक हम समाज के रूप में वह नहीं हो सकते, जो किसी भी सभ्‍य, वैज्ञानिक समाज को होना चाहिए. 

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जो रिवाज और दस्‍तूर ग़लत हैं, भेदभाव फैलाने वाले हैं, असमानता को बढ़ावा देने वाले हैं, उनके ख़िलाफ़ सबसे पहले डर से ही विरोध का स्‍वर उठना चाहिए. यह मीडिया और सामाजिक विमर्श का हिस्‍सा बाद में हैं, पहले यह घर का विषय हैं, इसलिए हर युवा को अपने घर से उन विचारों को निकाल बाहर फेंकना होगा, जो सदियों से मानसिक बेड़ियों का काम कर रहे हैं. यह सब कुछ नए पेड़ लगाने जैसा है, जब तक नए पेड़ नहीं लगेंगे हमें साफ़, शुद्ध हवा नहीं मिलेगी. सब ओर बस शिकायत रहेगी कि हवा साफ़ नहीं है, हरियाली और सुकून नहीं है. जब तक नए विचार नहीं आएंगे, सड़े-गले विचारों, रिवाजों से हमारा जीवन बाधित होता रहेगा.

(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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