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डियर जिंदगी : उनके लिए जो पहली, दूसरी नौकरी के बाद मुश्किल वक्त में हैं

डियर जिंदगी : उनके लिए जो पहली, दूसरी नौकरी के बाद मुश्किल वक्त में हैं
अगर आप पहली, दूसरी नौकरी में हैं, बार-बार नौकरियां बदल रहे हैं, तो यह 'कॉफी थ्‍योरी 'आपके लिए ही है.

आईआईएम से निकले युवा का जैसा मिज़ाज होना चाहिए. उसका वैसा ही है. इसके साथ उसके पिता का आर्मी ऑफ़िसर का बैगग्राउंड उसे विरासत में मिला. उसकी पहली नौकरी वैसी ही है, जैसी हम आईआईएम के कैंपस प्‍लेसमेंट की कहानियां पढ़ते हैं. लाखों का पैकेज और सपनों का शहर मुंबई, लेकिन अनुभूति आनंद की ज़िंदगी पटरी पर नहीं आ रही थी. 

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उसकी पहली नौकरी मुश्किल से एक बरस चली. दूसरी पहली से आधे बरस चली. और तीसरी कुल तीन महीने. उसके माता-पिता का मानना था कि अनुभूति अपने हिसाब से फ़ैसले कर रही है, तो कोई बात नहीं. दूसरी ओर अनुभूति को लग रहा था कि करियर की परेशानियों में परिवार को क्‍यों शामिल करना. जो भी है, उससे ख़ुद निपटा जाए. आखिर वह आईआईएम से है. भारत के सबसे प्रतिष्ठित मैनेजमेंट स्‍कूल से. 

पिता व्‍यस्‍त थे, मां एक पारंपरिक मां. उसे लगा कि इनसे बात करके क्‍या होगा. कई बार हम अपने माता-पिता को बहुत कम समझ पाते हैं, उनके अनुभव को डिग्रियों के मुक़ाबले देखते हैं. जबकि असल बात यह है कि उनके पास जीवन की पूंजी होती है, जो अनुभव के निवेश से लबालब होती है. सबसे बड़ी बात माता-पिता आपको आपसे बेहतर समझते हैं. आपके सबसे बड़े शुभचिंतक हैं. तो ऐसी कोई भी बात जो आपको परेशान करती है, सबसे पहले उसे घर पर शेयर कीजिए

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अनुभूति की बदलती कंपनियों और उससे कम हो रहे संवाद से कुछ हज़ार किमी दूर उसकी मां को टेलीपैथी के ज़रिए जो संदेश गया, मां के सहज मन ने उसे पढ़ने में कोई ग़लती नहीं की. वह पटना से मुंबई के लिए निकल पड़ीं. अगली सुबह मां-बेटी साथ थीं. मां ने थोड़ी ही देर में समझ लिया कि मामला क्‍या है. उनके स्‍पर्श ने अनुभूति को जल्‍द ही सहज कर दिया. उसने सारी दास्‍तां सुना दी. कैसे इतने शानदार पैकेज से करियर की जगमग शुरुआत करने वाली लड़की ऑफ़ि‍स से तालमेल नहीं बैठा पाने के चलते तनाव, निराशा के अंधेरे कोने में सिमट गई है. 

मां ने कहा, चलो कॉफ़ी पीते हैं. अगर आप मां हैं, बेटी हैं, तो यह मानकर पढ़िए कि यह कहानी आपके लिए ही है...मां ने किचन में जाकर तीन अलग-अलग बर्नर पर एक जैसे बर्तन में अंडा, आलू और कॉफी बींस उबलने के लिए रख दिए. तीनों को 15 मिनट तक उबलने दिया. तीनों को एक जैसी परिस्थ्‍िातियां दी गईं. लेकिन पंद्रह मिनट बाद तीनों का व्‍यवहार अलग-अलग था. अंडा पानी में उबलकर सख़्त हो गया, क्‍योंकि वह अपने को हालात के अनुसार नहीं ढाल पाया. यह कंपनी में पहली तरह के लोग होते हैं, जो बदली हुई स्थितियों का ठीक से सामना नहीं कर पाते. 

आलू पानी में उबलकर नरम हो गया, यानी ऐसे व्‍यक्‍ति तो मुश्किल वक़्त में ख़ुद में बदलाव तो लाते हैं, लेकिन पूरी तरह से अपने मिज़ाज को मिटा देते हैं, या पूरी तरह से हार स्‍वीकार कर लेते हैं. अंडे और आलू से अलग कैरेक्‍टर दिखाया कॉफ़ी ने. वह गर्म पानी यानी मुश्किल वक़्त में पूरी तरह से उसी में घुलमिल गई. अपने अस्तित्‍व को पानी में मिलाने के साथ अपने स्‍वाद और सुगंध का संसार रच दिया. 

मां ने मुस्‍कराते हुए कॉफ़ी का प्‍याला अनुभूति को देते हुए कहा, 'बदले हुए मैनेजमेंट के अनुसार अपने आपको बदल डालो. मैनेजमेंट कैसा भी हो, कॉफ़ी की तरह अच्‍छे स्‍वाद और सुगंध वाले वर्कर सबको चाहिए.' अनुभूति ने मां से वादा किया, वह दुनिया को बदलने की जगह ख़ुद की बदलेगी, पहले ख़ुद को साबित करेगी. तब दूसरों की बात करेगी और मिज़ाज को जितना हो सके, कॉफ़ी जैसा बनाने की कोशिश करेगी.  

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अगर आप पहली, दूसरी नौकरी में हैं, बार-बार नौकरियां बदल रहे हैं, तो यह 'कॉफी थ्‍योरी 'आपके लिए ही है. 

(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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