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बुलेट, कार देने के बाद भी पत्नी को छोड़ा, दहेज का दंश झेल रहीं मेवात की मुस्लिम बेटियां

मेवात में 85 प्रतिशत लोगों की जिंदगी खेती पर बसर होती है. इसके बावजूद भी यहां दहेज के दानव ने ऐसे पैर पसार लिए है, कि बेटियों की शादी करना मा-बाप की जिंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान बन गया है. 

बुलेट, कार देने के बाद भी पत्नी को छोड़ा, दहेज का दंश झेल रहीं मेवात की मुस्लिम बेटियां
प्रतीकात्मक तस्वीर

पुन्हाना: मोमिना (बदला हुआ नाम) की शादी जब 2018 में हुई तो मां-बाप ने दहेज में एक बुलेट, एक कार, एक ट्रैक्टर, जेवरात, कई लाख रुपए कैश, फ्रिज, वॉशिंग मशीन और घर का बहुत सारा सामान उसे दहेज में दिया. मोमिना के पिता ने उम्मीद की थी कि ज्यादा दहेज देंगे तो बेटी को ससुराल में प्यार मिलेगा, वो खुश रहेगी, लेकिन शादी के कुछ ही महीनों के बाद मोमिना( बदला हुआ नाम) को ससुराल ने ये कहकर मायके भेज दिया कि सामान कम है. 

मोमिना पिछले कई महीनों से मायके में ही रह रही है, क्योंकि उसका पति उसे ले जाने से इंकार कर रहा है. मोमिना के पिता का ये सोचकर बुरा हाल है, कि मोमिना की शादी में 50 लाख रुपये खर्च किए तब भी बेटी को खुशी नहीं मिल सकी. बेहद शर्मीली 22 साल की मोमिना इस गम में लगातार कमजोर होती जा रही है कि सरकारी स्कूल की टीचर होते हुए भी उसके पिता ने इतना दहेज दिया, इतनी बड़ी शादी की, तब भी ससुराल से खुशी उनके हिस्से में नहीं आयी. 

ये कहानी हरियाणा के नूह जिले के पुन्हाना तहसील में बसे एक गांव की है, जिसमें मोमिना रहती है. ये गांव राजस्थान-हरियाणा और यूपी बॉर्डर के बिल्कुल करीब बसा है. मुस्लिम बहुसंख्यक मेवात इलाके में शिक्षा और रोजगार की कमी है, पिछड़ापन है, बदहाली है लेकिन दहेज का चलन इतना ज्यादा है कि जल्दी से कहीं दूसरी जगह देखने को नहीं मिलता. पिछले कुछ साल में इस बुराई ने पूरे मेवाती समाज में इस कदर पैर पसार लिए हैं कि पिता अपनी बेटी की शादी के लिए या तो जमीन बेचने के लिए मजबूर हो रहा है या फिर जमीन को गिरवी रख रहे हैं. 

मोमिना के पिता इकबाल अभी भी इस उम्मीद में बैठे हैं कि बेटी के ससुराल वालों का दिल पसीज जाए और मोमिना अपने ससुराल चली जाए. सरकारी स्कूल में टीचर और कुछ खेती की जमीन के मालिक इकबाल ने अपनी बेटी की शादी में एक नहीं तीन वाहन दहेज में दिए, आखिर क्यों उन्होंने ऐसा किया, इसका जवाब देते हुए इकबाल कहते हैं कि "लड़के वाले पहले ही हर बात तय करते हैं, उन्हें क्या क्या चाहिए, बड़ी बेटी की शादी में भी ऐसा ही हुआ था, तब भी उन्होंने ये सब सामना दिया था, लेकिन इतना दहेज देना ठीक नहीं, इस पर लगाम लगनी चाहिए, लड़की वाले मजबूर हो जाते हैं". 

मेवात में 85 प्रतिशत लोगों की जिंदगी खेती पर बसर होती है. इसके बावजूद भी यहां दहेज के दानव ने ऐसे पैर पसार लिए है, कि बेटियों की शादी करना मा-बाप की जिंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान बन गया है. पुन्हाना के सामाजिक कार्यकर्ता और वकील अख्तर हुसैन बताते हैं कि "इलाके के अमीर लोगों में दहेज को लेकर एक होड़ लगी हुई है, जो पूरे समाज को खराब कर रही है. आज हालात ये है कि चाहे कितना भी गरीब आदमी हो उसे अपनी बेटी की शादी में बुलेट या चार पहियों की कार और नकद रुपया जरूर देनी पड़ता है" ये सबकुछ शादी के पहले लड़के वाले तय कर लेते हैं, तभी शादी हो पाती है."

दहेज को लेकर हालात इतने खराब हो गए हैं कि लड़के के परिवार के लोग अपने बेटे को दहेज की मंडी में बेचने को तैयार रहते है. गुड़गांव रहकर अपना कारोबार करने वाले मुबीन खान कहते हैं कि "मेवात में मेट्रिक पास लड़के को शादी में बुलेट, 10वीं और 12वीं पास लड़के को कार और सरकारी नौकरी वाले लड़के को कार और ट्रेक्टर और बुलेट तीनों वाहन चाहिए, और ऐसा कोई छुपाकर नहीं होता बल्कि लड़के के मां- बाप पहले सबकुछ तय कर लेते हैं वरना शादी नहीं करते".

समाज में बढ़ते दहेज के नासूर से उन लोगों की जिंदगी मुश्किल में आन पड़ी है जिनके पास देने के लिए कुछ नहीं हैं. नुह जिले में रहने वाले लुकमान की उम्र 40 साल है, मजदूरी करते है, जमीन नहीं है. दो बहनों की शादी के लिए पिछले करीब डेढ़ साल से लोगों से रिश्ते की बात कर रहे है, लेकिन बात नहीं बन रही. लुकमान बताते हैं कि हर लड़का कम से कम बुलेट या गाड़ी मांगता है, उनके पास इतने पैसे हैं ही नहीं कि वो ये वाहन दे सके, इसलिए बहनों की शादी नहीं हो पा रही.

पिछले कुछ दशक से मेवात के मुस्लिम समाज में दहेज की इस बुराई ने बहुत गहरी पैठ बनाई है. इस बुराई को खत्म करने के लिए पंचायते भी खूब हुई. एक बड़ी पंचायत पुन्हाना में भी हुई थी, जिसमें इलाके के तमाम बड़े नेता और समाजिक लोग मौजूद थे. पंचायत में फैसला किया था कि 11 लोगों से ज्यादा बारात में नहीं जाएंगे, दहेज बिल्कुल नहीं लिया जाएगा, लेकिन ज़मीन पर इस पंचायत के फैसलों का कुछ भी असर नहीं दिखता. पंचायत में जमियत उलेमा ए हिंद हरियाणा के अध्यक्ष याहया करीमी भी मौजूद थे. वो बताते है कि "पंचायते तो हमेशा होती है, लेकिन पंचायतो में शामिल बड़े लोग ही अपने फैसलों पर नहीं टिकते, वो खुद दहेज लेते भी हैं और देते भी हैं इसलिए सामाजिक तौर पर लोगो मे कोई असर नहीं होता".

दहेज के बढ़ते बेतहाशा चलन ने मेवात में बेटियों की जिंदगी को बर्बाद करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी. मेवात में कांग्रेस के नेता शुभान खान कहते हैं कि "ज्यादातर शादियां बड़े बड़े दहेज देने के बावजूद टूट रही है, पूरा मेवात समाज दहेज की वजह से पिछड़ रहा है अगर अभी भी इस बुराई को नहीं रोका गया तो आने वाले दिनों में बेटियों को ब्याहना गरीब आदमी के बस की बात नहीं रहेगी. बढ़ते दहेज के लिए शुभान अशिक्षा को जिम्मेदार मानते है".

मेवात में अशिक्षा बहुत ज्यादा और लड़कियों में इसका प्रतिशत लड़को के मुकाबले और ज्यादा बढ़ा हुआ है. यही कारण है कि लड़कियां बड़े पैमाने पर आगे आकर दहेज चलन का विरोध नहीं करती और गरीब बाप को बेटी की शादी करने में अपनी ज़िंदगी खपानी पड़ रही है. अगर अभी भी मेवात में बड़े पैमाने पर मुहिम चलाकर दहेज के दानव को ना रोका गया तो आने वाले दिनों में परेशानी और ज्यादा बढ़ेगी.