दिल्ली में साहित्य अकादमी के बाहर लेखकों का प्रदर्शन, मुंह पर काली पट्टी बांधकर जताया विरोध

साहित्य अकादमी की इमरजेंसी मीटिंग से पहले शुक्रवार को लेखकों ने साहित्य अकादमी के बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। लेखकों ने मुंह पर काली पट्टी बांधकर पोस्टर और बैनर के साथ साहित्य अकादमी के बाहर प्रदर्शन किया। लेखकों ने एमएम कलबर्गी की हत्या और देश में बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए साहित्य अकादमी के बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया।

दिल्ली में साहित्य अकादमी के बाहर लेखकों का प्रदर्शन, मुंह पर काली पट्टी बांधकर जताया विरोध
फोटो साभार- ANI

नई दिल्ली: साहित्य अकादमी की इमरजेंसी मीटिंग से पहले शुक्रवार को लेखकों ने साहित्य अकादमी के बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। लेखकों ने मुंह पर काली पट्टी बांधकर पोस्टर और बैनर के साथ साहित्य अकादमी के बाहर प्रदर्शन किया। लेखकों ने एमएम कलबर्गी की हत्या और देश में बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए साहित्य अकादमी के बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया।

साहित्य अकादमी के बाहर साहित्यकारों के पुरस्कार लौटाने के पक्ष और विरोधी दोनों गुटों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। साहित्य अकादमी के बाहर काफी तादाद में पुुलिस तैनात की गई है। साहित्यकारों के सम्मान लौटाने के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लेखक डॉक्टर अरुण भगत ने कहा कि साहित्यकारों को अब ही क्यों पुरस्कार लौटाने की याद आ रही है? जब जम्मू-कश्मीर में हिंदू मारे जा रहे थे और देश आपातकाल का दंश झेल रहा था और सिखों का कत्ल किया जा रहा था तब साहित्यकारों को पुरस्कार लौटाने की याद क्यों नहीं आई?

वहीं, सम्मान लौटान के पक्ष में विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि कहना है कि देश का सामाजिक और धर्मनिरपेक्षा ढांचा खतरे में है। ऐसे में साहित्यकारों ने अगर पुरस्कार लौटाया है तो इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। वरिष्ठ साहित्यकार मैत्रीय पुष्पे ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साहित्यकारों के पुरस्कार लौटाने पर अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए। प्रदर्शनकारी लेखकों ने अकादमी के अध्यक्ष तिवारी के हाल के उन बयानों की भी निंदा की जिसमें उन्होंने कई लेखकों की ओर से अपने पुरस्कार लौटाये जाने को ‘अतार्किक’ कृत्य करार दिया था।

साहित्यकारों के पुरस्कार वापस लौटाने के समर्थन में शांतिपूर्ण विरोध करने वाले लेखकों ने अकादमी के अध्यक्ष के पुरस्कार की रॉयल्टी से लाभ लेने संबंधी कथित बयान को लेकर लिखित माफी की मांग की। साहित्यकारों की तरफ से सौंपे गए ज्ञापन में कहा, '16 सितंबर को अकादमी के प्रतिनिधियों के साथ हिन्दू-उर्दू के 13 लेखकों के प्रतिनिधि-मंडल ने एक ‘शोक सभा’ के लिए मुलाकात की थी लेकिन अकादमी ने ऐसा करने से मना कर दिया। लेखकों ने कहा कि अगर दिल्ली में कलबुर्गी के लिए अकादमी एक शोकसभा का आयोजन नहीं करती तो वे तिवारी के इस्तीफे की मांग करेंगे।

विरोध रैली का आयोजन पांच समूहों जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, जनसंस्कृति मंच, दलित लेखक संघ और साहित्य संवाद ने किया था। प्रख्यात लेखक केकी एन दारूवाला, गीता हरिहरन, अनुराधा कपूर (नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के पूर्व निदेशक), शेखर जोशी और जावेद अली सहित अन्य लोगों ने प्रदर्शन में भाग लिया। देश के साहित्यिक इतिहास में ऐतिहासिक कदम उठाते हुये लेखकों का साथ देने का आह्वान करते हुये प्रदर्शनकारियों ने अकादमी से कन्नड़ लेखक कलबुर्गी, अन्य लेखकों और तर्कवादियों की हत्या किए जाने की कड़ी निंदा करने और लेखकों को यह भरोसा दिलाने की मांग की कि संकट के इस दौर में अकादमी अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार सुनिश्चित करेगी।
लेखकों ने एक बयान में कहा, ‘तिवारी ने लेखकों का भरोसा खो दिया है। अगर तिवारी माफी नहीं मांगते और दिल्ली में कलबुर्गी के लिए शोकसभा का आयोजन नहीं करते हैं तो हम उनके इस्तीफे की मांग करेंगे।’

 

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