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खेतों में पराली को जलाकर नहीं गलाकर भी समस्या से निजात मिल सकती है

इस हैलों सीआरडी में जीवाणु होते है. जब हम जीवाणु इस्तेमाल करेंगे तो आप देखेंगे की जो ठूठ बचे हुए है वो गल जाएगे . 

खेतों में पराली को जलाकर नहीं गलाकर भी समस्या से निजात मिल सकती है
खेतों में पराली को जलाकर नहीं गलाकर भी समस्या से निजात मिल सकती है

दिल्ली : अपने देश में वैसे तो सैकड़ों फ़सलों की खेती की जाती है.लेकिन इनमें से तीन-चार फ़सलें ही ऐसी होती हैं जिनके फ़सल अवशेषों को ठिकाने लगाने का काम किसानों के लिए सिरदर्द का काम होता है जिसमें  धान गेहूं और गन्ना अहम है. देश का दिल यानी राजधानी दिल्ली और उससे सटे आस-पास के शहर एक बार फिर से जानलेवा प्रदूषण की चपेट में हैं.यहां पराली के धुएं का असर जोरों से दिख रहा है, हवा में मिलते इस जहर के लिए पंजाब और हरियाणा में किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर जलाई जा रही पराली को जिम्मेदार बताया जा रहा है. पराली की ये समस्या साल दर साल गंभीर होती जा रही है. सरकार द्वारा जारी की जा रही चेतावनियां और जुर्माने का प्रावधान भी इस पर अंकुश लगाने में नाकाम साबित हो रहा है. हार्वेस्टर से काटी गई धान की फ़सल के खेत में पड़े अवशेषों को फिर से जलाया जा रहा है. खेत फिर से धू-धू करके जल रहे हैं.जिससे दिल्ली जैसे शहर पर फिर से उमड़ पड़ा है धुंए का कहर.

क्या है पराली ?
जब फसलों को मशीन द्वारा कटाई करा देते हैं तो फसल अवशेष खेतों मे पड़े रहते है उसमे बहुत से पोषक तत्व होते हैं.उसको जलाने से वातावऱण प्रदुषित होता है साथ ही जमीन से फसल पोषक तत्व का भी नुकसान होता हैं जब भी पराली जलाई जाती है तो बहुत बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनो ऑक्साइड पैदा होती है. ये ग्रीन हाउस गैस का एक भाग है. जब ये गैस, फॉग से मिलती है तो एक काले धुएं की शक्ल ले लेती है जिसे स्मॉग कहते हैं. जिससे स्किन और श्वांस संबधी रोग होता है उन फ़सलों के अवशेषों के जलाने के कारण पूरा देश पर्यावरण की मार को झेलता  है. चारों ओर मानों हाहाकार सा मच जाती है. ऐसा नहीं है की इनसे निपटने का कोई सुरक्षित तरीका नही है. देश के कृषि वैज्ञानिक लगातार इस क्षेत्र पर काम कर रहे हैं. और यहीं से फ़सल अवशेष के प्रबंधन के लिए नए धान के फ़सल अवशेष की समस्या से छुटकारा पाने के लिए सी.एस.आर.आई. लखनऊ के कृषि वैज्ञानिकों ने एक बैक्टरिया से बने सॉल्यूशन की खोज कर ली है. जिसके स्प्रे से किसान फ़सल अवशेष जैसी बड़ी समस्या से निजात पा सकेंगे.

CSSRI, लखनऊ के कृषि वैज्ञानिक डॉ संजय अरोड़ा के मुताबिक जो जीवाणु इन्होने इजाद किया है उसे हैलो सीआरडी नाम दिया गया है जब इस जीवाणु इस्तेमाल का इस्तेमाल किया जाएगा तो जो ठूठ बचे हुए है वह गल जाएगे . गलने के साथ वह मिटटी में मिल जाएगे जिससे पराली से निजात पायी जा सकती है

उपयोग की विधि ? 
220 लीटर या 200 लीटर का ड्रम में पहले पानी भरें उसके बाद उसमें दो से चार किलों  गाय का  गोबर  डाल दे फिर उसे डंडे से  हिलाकर अच्छी प्रकार से गोबर की खाद को पानी में मिला दे इसके बाद हैलेजोन वैक्टिरिया का साल्युशन जो घुलनशील अवस्था में होता उसको ड्रम के पानी में डाल दे . इसके बाद छाछ को पानी में डाला जाता है और फिर उसे तीन से चार दिन के लिए छोड़ दिया जाता है जिससे बैक्टिरिया की काफी सख्यां बढ़ जाती है . इस तरह साल्यूशन तैयार हो जाता है जिसे आप फसल अवशेष पर छिड़क सकते है . खेतों में दवा के छिड़काव से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना जरुरी है . जैसे खेतों में नमी होनी चाहिए अगर ऐसा नहीं है तो पहले खेत में सिंचाई कर लें और उसके बाद ही इस फॉर्मूले का छिड़काव करें.

CSSRI, लखनऊ के कृषि वैज्ञानिक डॉ संजय अरोड़ा के मुताबिक जब हैलेजोन का छिड़काव करते हैं तो इस बात का ध्यान रखे की फसल अवशेष अच्छी  प्रकार से  भीग जाए .खेतों में अगर नमी नही है तो सिंचाई जरूर करें इसके बाद छिड़काव करें. इसके बाद 20 से 25 दिन बाद जितने फसल अवशेष है गल जाएगे जिससे आप अगली फसल के लिए  आसानी से तैयारी कर खेत की बुवाई कर सकते हैं

हालांकि पराली से परेशान किसानों के लिए मल्चर मशीन भी उपलब्ध होती है जिससे आप धान  के साथ गेहूं और गन्ना  के फ़सल अवशेष को बारीक कर मिट्टी में मिला सकते हैं और पराली को खाद के तौर पर खेतों में ही मिला सकते है . इसके अलावा धान की कटाई के बाद आप हैप्पी सीडर जैसे यंत्र से रबी फ़सल की बुआई कर सकते हैं.जिससे की धान के अवशेष को जलाने की नौबत नही आएगी.हैप्पी सीडर के अलावा आप खेतों की जुताई के लिए मोल्ड बोर्ड हल का सहयोग ले सकते हैं.जिससे की फ़सल अवशेष मिट्टी में ठीक तरह से मिल जाता है.और फ़सल अवशेष जलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है. इस तरह आप फसल अवशेषों को जलाने की जगह उनका बेहतर प्रबंधन सीख कर इसे अपनाएंगे, तो आपको हानि की जगह लाभ ही लाभ होगा और आप पर्यावरण बचाने में भी अपना अहम योगदान दे पाएंगे. 

नरेश बिसेन, न्यूज डेस्क