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ZEE जानकारी: कैसे सुधर सकती है दिल्ली की बिगड़ती 'सेहत'

शहरीकरण का बोझ उठाते उठाते दिल्ली के कंधे झुक चुके हैं और दिल्ली की सेहत लगातार बिगड़ रही है .

ZEE जानकारी: कैसे सुधर सकती है दिल्ली की बिगड़ती 'सेहत'

चीन के महान दार्शनिक Confucius ने कहा था कि बुढ़ापा दरअसल एक सुंदर घटना है. ये सच है कि बुढ़ापे में आप जिंदगी के मंच से उतार दिए जाते हैं लेकिन तब आप अपनी पूरी जिंदगी को आगे की पंक्ति में खड़े होकर देख सकते हैं . अपनी जवानी की तस्वीरें तो हर कोई देखना चाहता है लेकिन बुढ़ापे की तस्वीर कोई नहीं देखना चाहता क्योंकि बुढ़ापे को ज्यादातर लोग लाचारी से जोड़कर देखते हैं . हम मानते हैं कि बुढ़ापा आपको मौका देता है कि आप अपनी पूरी जिंदगी को पीछे मुड़कर देखें .

यानी जब आप बूढ़े हो जाते हैं तो आपकी पूरी जिंदगी आपकी आंखों के सामने किसी फिल्म की तरह घूमने लगती है . लेकिन आजकल लोग जवानी में ही अपने बुढ़ापे के दर्शन कर रहे हैं . ऐसा करने के लिए लोग टाइम मशीन में बैठकर भविष्य की सैर नहीं कर रहे हैं बल्कि ये सब एक मोबाइल Application की मदद से हो रहा है . ये Application अब पूरी दुनिया में वायरल हो चुकी है, और हर जगह इसकी चर्चा हो रही है . इससकी मदद से लोग अपनी तस्वीर Click करते हैं और फिर ये Application सॉफ्टवेयर की मदद से आपको बता देती है कि बूढ़े होकर आप कैसे दिखेंगे . 

आज हम आपको इस Application के बारे में पूरी जानकारी देंगे और ये भी बताएंगे कि कैसे इस App ने पूरी दुनिया में खतरे की घंटी बजा दी है, और कैसे अमेरिका जैसे देश इस Application के गलत इस्तेमाल को लेकर डरे हुए हैं . 

लेकिन उससे पहले हम आपको देश की राजधानी दिल्ली के बूढ़े होते चेहरे के दर्शन कराएंगे, जिसके चेहरे पर अव्यवस्था की झुर्रियां हैं और जिसकी सेहत भ्रष्टाचार ने बिगाड़ कर रख दी है . हमने दिल्ली के बूढ़े होते चेहरे का ये DNA टेस्ट NASA की एक तस्वीर की मदद से तैयार किया है . इस तस्वीर में आप देख सकते हैं कि  वर्ष 1989 में दिल्ली और आस पास के इलाकों का शहरीकरण कितना कम था और वर्ष 2018 आते आते इसका दायरा कितना ज्यादा बढ़ गया . शहरीकरण का बोझ उठाते उठाते दिल्ली के कंधे झुक चुके हैं और दिल्ली की सेहत लगातार बिगड़ रही है .

NASA ने इस तस्वीर के साथ एक रिपोर्ट भी लिखी है जिसमें कहा गया है कि पूरी दुनिया के मुकाबले दिल्ली का शहरीकरण सबसे ज्यादा तेज़ी से हो रहा है . इस तस्वीर के ज़रिए ये भी बताया गया है कि कैसे 29 वर्षों में दिल्ली का भौगोलिक क्षेत्रफल पहले के मुकाबले दोगुना हो गया है . 

यानी दिल्ली की तुलना अगर किसी इंसान से की जाए तो आप कह सकते हैं कि दिल्ली की उम्र काफी ज्यादा हो चुकी है . लेकिन उसका परिवार दिन प्रतिदिन बड़ा होता जा रहा है. इस आबादी के बोझ ने दिल्ली के शरीर को निढाल कर दिया है . 

इंसानों के बुढ़ापे को तो टाला नहीं जा सकता, लेकिन शहर के तौर पर दिल्ली की सूरत ज़रूर बदली जा सकती है. इसलिए आज हम दिल्ली की जाम नसों को खोलने वाला एक DNA टेस्ट करेंगे .      
शेख़ मोहम्मद इब्राहीम दिल्ली के एक मशहूर शायर थे जिन्हें ज़ौक के नाम से भी जाना जाता है . ज़ौक ने अपनी एक शायरी में दिल्ली की खूबसूरती बयान करते हुए कहा था कि दक्षिण भारत में शायरों की कद्र ज्यादा है, लेकिन दिल्ली की गलियां छोड़कर कौन जाए ? . हमें यकीन है कि ज़ौक अगर आज जिंदा होते तो दिल्ली की हालत देखकर अपना इरादा बदल लेते और फौरन दक्षिण या फिर देश के किसी और शहर का रुख कर लेते . ऐसा हम क्यों कह रहे हैं ये समझने के लिए आज आपको दिल्ली की कुछ तस्वीरें देखनी होगी .

पहली तस्वीर आज दिल्ली में हुई बारिश के बाद की है . दिल्ली में आज सुबह जैसे ही बारिश हुई, देश की राजधानी की पोल खुल गई . जगह जगह पानी भर गया, ट्रैफिक जाम लग गया, कई जगह तो गाड़ियां पानी में लगभग डूब गईं . दिल्ली के पुल प्रहलादपुर इलाके में तो हालात ये हो गए कि अंडर पास में कई फीट पानी भर गया और लोगों को इसे पार करने के लिए ट्रैक्टर का सहारा लेना पड़ा . ट्रैक्टर वाले 10-10 रुपये लेकर लोगों को ये अंडरपास पार करा रहे थे . ये सब, देश की संसद से सिर्फ 19 किलोमीटर की दूरी पर हो रहा था .

बारिश के बाद दिल्ली की स्पीड पर ब्रेक लग गया , दिल्ली और नोएडा को जोड़ने वाले फ्लाइओवर पर लगभग 5 किलोमीटर लंबा जाम लग गया .

इन तस्वीरों को देखकर साफ पता चलता है कि देश की राजधानी सिर्फ आधे या पौने घंटे की बारिश भी नहीं झेल सकती . इसलिए आज हम ये सवाल उठा रहे हैं कि क्या देश के लिए नई राजधानी की तलाश करने का वक्त आ गया है .

सिर्फ बारिश की नहीं प्रदूषण भी दिल्ली के लिए बहुत बड़ी समस्या है और अक्सर दिल्ली की तुलना किसी गैस चैंबर से की जाती है . दिल्ली को कई बार दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर का दर्जा मिल चुका है और ये किसी भी देश की राजधानी के लिए शर्म की बात है . 

एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में हर साल प्रदूषण की वजह 10 हज़ार से लेकर 30 हज़ार लोगों की मौत हो जाती है. यानी प्रदूषण हर रोज़ दिल्ली में 80 लोगों की जान ले रहा है . 

इसके अलावा ट्रैफिक जाम की तस्वीरें भी देश की राजधानी दिल्ली की पहचान बन गई हैं . अक्सर Peak Hours में गाड़ियां सड़कों पर रेंगती हैं , जिससे ना सिर्फ प्रदूषण होता है बल्कि देश को लाखों करोड़ रुपये का नुकसान भी होता है . अप्रैल 2018 में The Boston Consulting Group ने भारत के शहरों में ट्रैफिक जाम को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी . 

इस रिपोर्ट में कहा गया था कि ट्रैफिक जाम से दिल्ली को हर साल 65 हज़ार करोड़ रुपये का नुकसान होता है . इसी रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली वालों को एशिया की दूसरे शहरों के मुकाबले हर रोज़ अपनी मंजिल तक पहुंचने में डेढ़ घंटा ज्यादा लगता है . 

इसके अलावा अतिक्रमण की समस्या भी दिल्ली के राजधानी वाले दर्जे पर सवाल उठाती है.

सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी एक टिप्पणी में कहा था दिल्ली में करीब 2 हज़ार 200 किलोमीटर लंबी सड़कें अतिक्रमण का शिकार हैं . आपको बता दें कि दिल्ली से कन्याकुमारी तक की दूरी 2 हज़ार 840 किलोमीटर है . 

इससे आप ये समझ सकते हैं कि दिल्ली में अतिक्रमण की समस्या कितनी गंभीर है .

दिल्ली में जनसंख्या वाला टाइम बम भी फटने वाला है . दिल्ली में इस वक्त 2 करोड़ 90 लाख लोग रहते हैं,और ये संख्या लगातार बढ़ रही है . इस मामले में दिल्ली जल्द ही दुनिया में सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला शहर बन जाएगी . 

2018 में आई United Nations की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2028 तक दिल्ली जनसंख्या के मामले में जापान की राजधानी टोक्यो को पीछे छोड़ देगी . वर्ष 2028 में दिल्ली में रहने वाले लोगों की संख्या 3 करोड़ 72 लाख हो जाएगी . यानी दिल्ली में जनसंख्या वाला टाइम बम फटने में सिर्फ 9 साल रह गए हैं .

ये आंकड़े और तस्वीरें दिखाने के बाद हमें ये कहते हुए बहुत दुख हो रहा हैं कि दिल्ली को देश की राजधानी होने का कोई अधिकार नहीं है . अब वक़्त आ गया है कि दिल्ली से भारत की राजधानी होने का सम्मान छीन लिया जाए . क्योंकि सिर्फ़ एक घंटे की बारिश में डूब जाने वाला शहर, देश की राजधानी नहीं हो सकता . प्रदूषण की मार लगातार झेलने वाला शहर किसी देश की राजधानी कैसे हो सकता है ? क्या अतिक्रमण से ग्रस्त शहर को देश की राजधानी होना चाहिए ? और क्या जनसंख्या विस्फोट का सामना कर रहा शहर देश की राजधानी होने का बोझ उठा सकता है . 

राजधानी का मतलब है... देश का स्वाभिमान . लेकिन दिल्ली राजधानी होने के हर पैमाने पर फेल हो रही है . 
ये सारी तस्वीरें देखने के बाद लगता है कि दिल्ली में सरकार नाम की कोई चीज है भी या नहीं ? इसलिए अब वक्त आ गया है कि दिल्ली को इस बोझ से हमेशा के लिए मुक्त कर दिया जाए .

दुनिया के ज्यादातर देशों की राजधानियां बड़ी योजनाओं और तैयारियों के साथ बसाई जाती हैं . दिल्ली मुगल काल में भी भारत की राजधानी थी, और सन 1931 में अंग्रेज़ों ने एक बार फिर इसे देश की राजधानी घोषित कर दिया था . लेकिन इतने अर्से में कभी किसी ने दिल्ली को योजनागत तरीके से बसाने की कोशिश नहीं की, और दिल्ली की सूरत बद से बदतर होती चली गई . 

मशहूर शायर मिर्ज़ा गालिब सन 1826 में पहली बार कोलकाता गए थे . तब भारत पर अंग्रेज़ों का राज था और कोलकाता देश की राजधानी हुआ करता था . मिर्ज़ा गालिब उस वक्त कोलकाता का विकास देखकर हैरान रह गए थे . लेकिन सच ये है कि आज कोलकाता, मुंबई और दिल्ली जैसे शहर दम तोड़ रहे हैं . इसलिए हमें इन शहरों को नए सिरे से बसाने के बारे में सोचना होगा, वर्ना जो हालत दिल्ली की है वो देश के लगभग हर शहर की हो जाएगी . आज हमने दिल्ली की बदहाली बयान करने वाली तस्वीरों के आधार पर एक वीडियो विश्लेषण तैयार किया है . जिसे देखकर आप भी सवाल उठाने लगेंगे कि क्या दिल्ली को देश की राजधानी बने रहने का अधिकार है ?

तो दिल्ली के बहुत सारे नेता सरकारी खर्च पर स्टडी टूर्स पर अक्सर विदेश जाते रहते हैं, लेकिन देश को इसका कभी ळाभ नहीं होता 

अब आपके मन में ये सवाल उठ रहा होगा कि धीमी मौत मरती दिल्ली को कैसे बचाया जा सकता है. इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमनें दुनिया के कुछ देशों की राजधानियों पर गहन रिसर्च किया . इस रिसर्च में दिल्ली का चेहरा बदले वाला फॉर्मूला छिपा है . 

सबसे पहले बात जापान की राजधानी टोक्यो की . टोक्यो जनसंख्या के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा शहर है लेकिन वहां की व्यवस्थाएं दिल्ली की तरह लचर नहीं हैं . 

टोक्यो में दिल्ली का तरह ट्रैफिक जाम नहीं लगता . टोक्यो में 100 अलग अलग रूटों पर रेलगाड़ियां और मेट्रो दौड़ती है . टोक्यो में ऐसी कोई जगह ढूंढना मुश्किल है जो रेल मार्ग से ना जुड़ी हो .

इसी तरह हंगरी की राजधानी Budapest ने भी पिछले 10 वर्षों में Infrastructure में काफी निवेश किया है . दिन में ही नहीं वहां रात में भी सार्वजनिक परिवहन चालू रहता है. वहां की TRAM LINE 6 पर आपको हर वक्त TRAM मिल जाती है. इसी तरह 41 बसें भी पूरे शहर का चक्कर लगाती हैं . यानी Budapest ने राजधानी के तौर पर अपने बुढ़ापे को संवार लिया है, जिससे शहर के लोगों का वर्तमान और भविष्य भी सुरक्षित और आरामदेह हो गया है.

और अब बात भारत के पड़ोसी देश चीन की राजधानी Beijing की, Beijing में 2016 में औद्योगिक प्रदूषण कम करने के लिए, प्रदूषण फैलाने वालों पर 150 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया था . बीजिंग में पिछले 5 वर्षो में 4 हज़ार 22 हेक्टेयर में फैले इलाके को फिर से हरा भरा बना दिया गया है .

टोक्यो, बुडापेस्ट और बीजिंग जैसे शहरों को बसाते वक्त काफी ध्यान दिया गया था . बड़ी बड़ी योजनाएं बनाई गई थीं और वहां आज भी सुविधाएं बेहतर करने पर काम हो रहा है . लेकिन दिल्ली की हालत देखने पर लगता है कि हमारे देश की मूल समस्या... हमारे देश के Town Planners, इंजीनियर और कर्मचारी हैं . 

शायद ये लोग इतने योग्य नहीं हैं कि एक शहर को व्यवस्थित कर सकें. हमारे देश के लोग भी इसके लिए कम ज़िम्मेदार नहीं हैं. ये लोग अवैध कब्ज़ा करना और चारों तरफ कूड़ा फैलाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं. ऐसे लोग कभी अपने हाथ गंदे नहीं करना चाहते लेकिन पूरे शहर को एकदम साफ देखना चाहते हैं . इसलिए दिल्ली जैसे शहरों को संजीवनी तभी मिल सकती है जब इन छोटी छोटी बातों पर ध्यान दिया जाए . 

ऐसा नहीं है कि अव्यवस्था की ये बाढ़ सिर्फ राजधानी दिल्ली में ही है . 
अगर सिस्टम समय से पहले बूढ़ा हो जाए.. और कोई प्राकृतिक आपदा आ जाए तो फिर ना इंसान बचते हैं और ना ही जानवर. बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा हमारे देश में एक वार्षिक समस्या बन चुकी है. जैसे हर साल दिवाली आती है. होली आती है. वैसे ही हर साल बाढ़ भी आती है. इस विश्लेषण को आगे बढ़ाने से पहले हम आपको असम के Kaziranga National Park से आई एक Tiger की तस्वीर दिखाना चाहते हैं . ब्रह्मपुत्र नदी में आई बाढ़ की वजह से Kaziranga National Park का 90 फीसदी हिस्सा पानी में डूब चुका है. बाढ़ से बचने के लिए बहुत से जानवर अब जंगल छोड़कर रिहाइशी इलाकों की तरफ भाग रहे हैं . 

ये Tiger बाढ़ के पानी से अपनी जान बचाकर एक मकान में घुस गया है. यहां बिस्तर पर आराम करते हए इस Tiger की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. लोगों का कहना है कि बाढ़ की तबाही ने Tiger जैसे खूंखार जानवर को एक डरी हुई बिल्ली बना दिया है. 
बाढ़ की वजह से Kaziranga National Park में अब तक 50 से ज़्यादा जानवर मारे गए हैं.

पिछले दो वर्षों में करीब साढ़े तीन सौ जानवरों की मौत हुई है. इनमें दुर्लभ प्रजाती के एक सींग वाले करीब 25 गैंडे भी शामिल हैं.

इन मौतों के पीछे बहुत सारे कारण रहे होंगे.. और बाढ़ इनमें से एक बड़ी वजह है.

वर्ष 1985 में UNESCO ने Kaziranga National Park को World Heritage Site घोषित किया था. लेकिन हमारा सिस्टम इस धरोहर की रक्षा नहीं कर पा रहा है. 

हमारे देश में जब भी बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा की ख़बर बताई जाती है, तो इसे सिर्फ़ लोगों की मौत और नुकसान के आंकड़ों तक सीमित कर दिया जाता है. हमारा सिस्टम ये कभी नहीं बताता कि बाढ़ से होने वाली बर्बादी को कैसे कम किया जा सकता है. पूरा देश जानता है कि भारत के पूर्वी राज्यों में हर साल बाढ़ आती है. इससे होने वाली तबाही से लाखों लोगों की ज़िंदगी बर्बाद हो जाती है. लेकिन इसके बावजूद देश का सिस्टम कोई सबक नहीं लेता . 

बाढ़ आने के बाद हमारे नेता हवाई सर्वेक्षण करते हैं और सिस्टम... बाढ़ पीड़ितों के बीच मुआवज़ा बांटकर रस्म अदायगी कर देता है.और फिर अगले साल बाढ़ आने तक सरकारें और सिस्टम गहरी नींद में सो जाते हैं. 

आज हमारे पास असम और बिहार से भी बाढ़ की कुछ तस्वीरें आई हैं. जिन्हें देखकर आपको लगेगा कि बाढ़ के सामने हमारा सिस्टम आज भी कितना बेबस है. इन दोनों राज्यों में 75 लाख से ज़्यादा लोग बाढ़ की वजह से सुरक्षित जगहों की तलाश में हैं . दोनों राज्यों में करीब 100 लोगों की मौत हो चुकी है. सिस्टम की आधी -अधूरी तैयारियों को देखकर लगता है कि ये आंकड़ा बढ़ सकता है. 

ये बात सच है कि बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है... लेकिन हमारा सवाल ये है कि इस बाढ़ से बचने की तैयारी.. सही समय पर क्यों नहीं होती. हमारा सिस्टम आज भी आग लगने के बाद.. पानी का कुंआ खोदने वाली सोच पर चल रहा है. पिछले 71 वर्षों में देश में बाढ़ की वजह से 1 लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. जबकि 3 लाख करोड़ रूपये से ज़्यादा का नुकसान हो चुका है .

यानी जिस पैसे से देश में विकास कार्य किये जा सकते थे, वो बाढ़ के पानी में डूब गये. इतने वर्षों में हमने कोई प्रभावी रणनीति तैयार नहीं की. जबकि दुनिया में ऐसे कई देश हैं जिन्होंने बाढ़ पर की समस्या पर जीत हासिल कर ली है . 

ये अजीब विरोधाभास है कि एक तरफ हम चांद और मंगल पर जाने की तैयारी कर रहे हैं और दूसरी तरफ हमारे देश के लाखों लोग हर साल बाढ़ की वजह से बेघर हो रहे हैं . देश में जब रक्षा, विज्ञान और technology के क्षेत्र में आधुनिक रणनीति बनाई जाती है तो हमारा सिस्टम बाढ़ के लिए ऐसी तैयारी क्यों नहीं करता?

प्राकृतिक आपदाओं पर किसी का बस नहीं चलता है...ना ही प्राकृतिक आपदाओं को रोका जा सकता है...लेकिन इन आपदाओं से होने वाले नुकसान को ज़रूर कम किया जा सकता है...हम आपको बताते हैं कि दुनिया के दूसरे देशों ने बाढ़ को कैसे कंट्रोल किया...और हम इन देशों से क्या सीख सकते हैं?

बाढ़ की समस्या के लिए पूरी दुनिया में नीदरलैड्स आदर्श उदाहरण है. एक वक्त था जब Netherlands का 66 फीसदी इलाका बाढ़ से प्रभावित होता था लेकिन अब ऐसा नहीं है.. क्योंकि Netherlands ने बाढ़ से निपटने के लिए एक अलग सोच अपनाई..और वो सोच ये कहती है कि...
live with water, don't fight it...यानी पानी के साथ जीना सीखो..उससे लड़ो मत...

इसी सोच के साथ Netherlands ने नदियों के किनारों को इतना चौड़ा कर दिया कि बाढ़ आने की स्थिति में भी कोई नुकसान ना हो... 

Netherlands ने नदियों पर बने बांधों के ऊपर Colonies बसाईं और ज़रूरत के मुताबिक ऐसे घर भी बनाए जो बाढ़ आने पर तैर सकें...

बाढ़ से निपटने की तकनीक सिंगापुर से से भी सीखी जा सकती है

सिंगापुर ने अपने ड्रैनेज सिस्टम को सुधारने में पिछले 30 वर्ष में 
200 करोड़ सिंगापुर डॉलर यानी करीब 10 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च किए

इसकी वजह से पूरे सिंगापुर में बाढ़ प्रभावित इलाके में करीब 
98 फीसदी की कमी आई है

सिंगापुर में ड्रेनेज सिस्टम को सुधारा गया, बिल्डिंग का न्यूनतम 
प्लेटफॉर्म तय किया गया

सिंगापुर के निचले इलाकों में...जहां बाढ़ में सड़कें डूब जाती थीं
वहां पर ड्रेनेज सिस्टम सुधारने के साथ सड़कों के लेवल को 
ऊंचा किया गया है 

1910 में आई बाढ़ के बाद फ्रांस की राजधानी पेरिस में सीन नदी के आसपास
कई झीलें बनाई गईं...ताकि सीन नदी पर पानी का दबाव कम रहे...

ब्रिटेन की राजधानी London को बाढ़ से बचाने के लिए टेम्स नदी के किनारों
पर एक बड़ा mechanical barrier बनाया गया...जब नदी का जल-स्तर एक 
निश्चित स्तर से ऊपर जाता है...तो इस barrier को ऊंचा कर दिया जाता है...ये
बांध जैसी एक व्यवस्था है

भारत में सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि नदियों के किनारे पर अंधाधुंध निर्माण हुआ है...और इससे नदियों के किनारे लगातार सिकुड़ते चले गए...हमारे देश में कभी भी drainage सिस्टम को सुधारने पर ध्यान नहीं दिया गया...इसीलिए ज़रा सी बारिश में भी देश की राजधानी दिल्ली परेशान हो जाती है . हमारा सिस्टम चाहे तो इन देशों से बहुत कुछ सीख सकता है .