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ZEE जानकारी: आपकी सांसों से जुड़ी, बहुत जरूरी खबर का विश्लेषण

अब सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि पराली तो वर्षों से जलाई जा रही है . लेकिन, ऐसा क्या हुआ कि पिछले कुछ ही वर्षों से हम इसकी चर्चा कर रहे हैं ? इस सवाल का जवाब इतिहास में छिपा है .वर्ष 1966 में देश में हरित क्रांति शुरू हुई थी.

ZEE जानकारी: आपकी सांसों से जुड़ी, बहुत जरूरी खबर का विश्लेषण

नई दिल्ली: पिछले 10 दिनों से पूरे उत्तर भारत में प्रदूषण का धुआं छाया हुआ है. इसकी वजह से दिल्ली और आस पास के शहरों की हवा खतरनाक स्तर तक पहुंच गई थी . आज भी दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स 235 है... यानी सांस लेने लायक हवा के मानकों से ये करीब 5 गुना ज्यादा खराब है . और इसकी बड़ी वजह ये भी है कि किसानों ने पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पराली को जलाना शुरू कर दिया है .

ZEE NEWS हमेशा आपसे जुड़ी हुई खबरों की ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर, कवरेज करता है. इसलिए हमारी टीम आज पंजाब और हरियाणा के उन खेतों में पहुंची... जहां लगी आग से निकला धुआं आपकी सांसें छीन रहा है. लेकिन पहले देखिए सुप्रीम कोर्ट ने आज वायु प्रदूषण पर क्या टिप्पणी की है .

दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने सख्ती से कहा कि क्या सरकारें इस तरह प्रदूषण से लोगों को मरने के लिए छोड़ सकती हैं? क्या आप देश को 100 साल पीछे जाने देना चाहते हैं . जस्टिस मिश्रा ने कहा- किसानों को दंड देना इस समस्या का समाधान नहीं है. आप सत्ता के महलों में बैठकर शासन कर रहे हैं और लोगों को मरने दे रहे हैं. अगर उनकी जान जाएगी तो आप भी नहीं बचेंगे . आप भी इस हवा में जिंदा नहीं पाएंगे. अगर आपको जिंदा रहना है तो आपको कुछ करना पड़ेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने आज पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के मुख्य सचिव को पेश होने का आदेश दिया था. सुनवाई शुरु होते ही जस्टिस अरुण मिश्रा ने दिल्ली के मुख्य सचिव से सवाल किया- अगर आप धूल, कचरे और निर्माण कार्यों की समस्या ही नहीं सुलझा पा रहे, आप इस पद पर क्यों बने हुए हैं?नाराज जस्टिस मिश्रा ने राज्यों के मुख्य सचिवों से कहा, ‘‘सब जानते हैं कि हर साल पराली जलाई जाएगी. सरकारें इसके लिए पहले से तैयारी क्यों नहीं रखतीं? लोगों को मशीनें मुहैया क्यों नहीं कराई जाती हैं? इससे पता चलता है कि पूरे साल प्रदूषण को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए.’’

इसके बाद पंजाब के मुख्य सचिव को फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा ... आप अपने कर्तव्यों का पालन करने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं.पंजाब के मुख्य सचिव ने जब मामला केंद्र सरकार पर डालने की कोशिश की तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा - अगर आपका जवाब यही है कि... केंद्र सरकार को इस मामले में कुछ करना चाहिए, तो आप अपनी ड्यूटी नहीं कर रहे हैं. और हम आपको सस्पेंड करके पंजाब भेजेंगे . कोर्ट ने ये भी कहा - कि किसानों को देने के लिए अगर आपके पास फंड नहीं हैं तो आप कुर्सी छोड़ दीजिए... क्योंकि आपको प्राथमिकता पता नहीं है.

केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल को सुप्रीम कोर्ट ने कहा - पराली का जलना आपकी नाकामी है. अदालत ने ये भी सवाल उठाया कि - क्या अटॉर्नी जनरल ये कहना चाहते हैं कि इस समस्या का कोई समाधान नहीं है. एक लोकतांत्रिक सरकार से हम बेहतर जवाब की उम्मीद करते हैं .सुप्रीम कोर्ट ने इन राज्यों की सरकारों से कहा है, ‘‘आखिर सरकारें किसानों से पराली खरीदकर इकट्ठा क्यों नहीं कर लेती हैं. कोर्ट ने कहा कि हम प्रदूषण रोकने और पराली जलाने की समस्या के हल के लिए लोकतांत्रिक सरकार से ज्यादा उम्मीद रखते हैं. 

अगर किसी ने भी नियम-कानून तोड़े तो उसे बख्शा नहीं जाएगा. सरकार कल्याण की अवधारणा भूल चुकी है. उसे गरीबों की कोई चिंता नहीं है.’’नाराज जजों ने ये भी कहा, ‘‘यह करोड़ों लोगों की जिंदगी और मौत से जुड़ा का मामला है. हमें इसके लिए सरकार को जिम्मेदार बनाना होगा. क्या आपको शर्म नहीं आती कि फ्लाइटों को डायवर्ट करना पड़ रहा है और लोग अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं. हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि लोगों को इस प्रदूषण की वजह से कौन-कौन सी बीमारियां झेलनी पड़ती हैं. कोर्ट ने कहा कि सरकार अब जनकल्याण की भावना भूल चुकी है. उसे अब गरीबों की कोई चिंता नहीं. ये दुर्भाग्यपूर्ण है.’’

करीब ढाई घंटे सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि दिल्ली सरकार सड़कों के सभी गड्ढे... 3 हफ़्ते में भरने का काम पूरा करे. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक दिल्ली के 7 इलाकों में यदि सड़कों के गड्ढे ठीक कर दिए जाएं तो प्रदूषण में 17 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है.अदालत ने यूपी, हरियाणा और पंजाब सरकार को पराली नहीं जलाने वाले किसानों को 100 रुपए प्रति क्विंटल प्रोत्साहन राशि देने का ऑर्डर भी दिया है.

सच्चाई ये है कि हर वर्ष पराली जलाई जाती है... लेकिन सरकारें पहले से इसकी तैयारी नहीं करती हैं. इसे रोकने के लिए किसानों को समय रहते सब्सिडी और मशीनें नहीं दी जाती हैं. सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद सरकारी अधिकारी एसी दफ्तरों में बैठकर रिपोर्ट तो तैयार कर लेते हैं. लेकिन वो कभी खेतों में जाकर जमीनी स्तर पर समस्याओं को समझने की कोशिश नहीं करते हैं . इसी वजह से ये समस्या उलझती जा रही है .

पंजाब और हरियाणा की बात करें तो इन राज्यों में धान की फसल के अवशेष का 80 प्रतिशत हिस्सा जलाया जाता है . जिससे दिल्ली और आस पास के क्षेत्र में वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है . भारत सरकार के एयर क्वालिटी रेगुलेटर सफर (SAFAR) के मुताबिक पिछले हफ्ते दिल्ली के प्रदूषण में...46 प्रतिशत हिस्सेदारी पराली जलाने से निकले धुएं की थी .

ये सुनकर आपको पराली जलाने वाले किसानों पर बहुत गुस्सा आ रहा होगा... लेकिन इस समस्या के लिए सिर्फ किसान ही ज़िम्मेदार नहीं हैं . पराली जलाना उनका शौक नहीं, मजबूरी है . आखिर किसानों की समस्या क्या है ? ये समझने के लिए आज हमने किसानों से बात की, और उन्होंने हमें ये विस्तार से बताया कि आखिर क्यों... वो पराली जलाने के लिए मजबूर हैं ?

भारत एक कृषिप्रधान देश है... इसके बावजूद भी किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है. किसानों की आर्थिक स्थिति इस बात का प्रमाण है. पराली की समस्या कृषि की अर्थव्यवस्था से जुड़ी हुई है. जिसे आपको जानना चाहिए .किसानों के लिए खेत से पराली को हटाने के तीन तरीके हैं . पहला तरीका है मजदूरों के ज़रिए पराली हटवाना... लेकिन इससे खेती की लागत बढ़ जाती है.अगर किसान खुद मेहनत करे तो मुश्किल ये है कि... उसके पास वक्त की कमी होती है. क्योंकि धान की कटाई के बाद उन्हें 15-20 दिनों के अंदर गेहूं की फसल लगानी होती है . इसलिए मजबूर होकर किसान को पराली जलानी ही पड़ती है. और तीसरा तरीका ये है वो महंगी मशीनों के माध्यम से पराली को नष्ट करे. लेकिन किसानों के इन मशीनों को खरीदने के लिए पैसा नहीं होता है.

अब सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि पराली तो वर्षों से जलाई जा रही है . लेकिन, ऐसा क्या हुआ कि पिछले कुछ ही वर्षों से हम इसकी चर्चा कर रहे हैं ? इस सवाल का जवाब इतिहास में छिपा है .वर्ष 1966 में देश में हरित क्रांति शुरू हुई थी. इस क्रांति से देश को अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य रखा गया था . 1970 के दशक में पंजाब और हरियाणा के किसानों ने परंपरागत फसलों को उगाना छोड़ दिया, जिसमें मक्का..दलहन और तिलहन शामिल थे . इसके बदले किसानों ने चावल और गेहूं की खेती शुरू कर दी .

यहां ये जानना जरुरी है कि पंजाब और हरियाणा की जलवायु और जमीन...चावल और गेहूं के लिए उपयुक्त नहीं थी ..क्योंकि इन फसलों के लिए ज्यादा पानी की जरुरत पड़ती है . इसका असर ये हुआ कि किसानों की निर्भरता भूमिगत जल पर बढ़ गई . चावल और गेहूं की खेती के लिए किसानों ने बड़ी तादाद में ट्यूबवेल लगाना शुरु कर दिया था . नतीजा ये हुआ कि वर्ष 2005 तक पंजाब में भूमिगत जल... खतरनाक स्तर तक पहुंच गया . जिसके बाद पंजाब सरकार ने राज्य किसान आयोग की स्थापना की . और इस आयोग ने पानी बचाओ, पंजाब बचाओ अभियान शुरू किया.

वर्ष 2009 में पंजाब और हरियाणा की सरकारों ने प्रिजर्वेशन ऑफ सब्सॉइल वाटर एक्ट (Preservation of Subsoil Water Act) लागू किया गया. जिसकी वजह से दोनों राज्यों में वर्षों से चली आ रही खेती की परंपरा बदल गई . यानी फसल की बुआई और कटाई के वक्त में बदलाव करवा दिया गया . वर्ष 2009 के पहले किसान धान की बुवाई 15 अप्रैल तक कर लेते थे . चार महीने बाद यानि सितंबर में फसल की कटाई हो जाती थी . और फिर पराली जला दी जाती थी... इस वक्त हवा में नमी कम रहती है. जिसकी वजह से पराली का धुआं वातावरण में इकट्ठा नहीं होता था...और प्रदूषण की समस्या भी नहीं होती थी .

लेकिन, वर्ष 2009 के बाद किसानों ने जून में धान की बुवाई शुरु की . जो अक्टूबर के अंत तक काटी जाने लगी और नवंबर में पराली जलाने की प्रक्रिया शुरु हुई . अक्टूबर के अंत और नवंबर के आरंभ में हवा में नमी बढ़ जाती है . यानी सर्दी का मौसम शुरू हो जाता है . जिसकी वजह से पराली का धुआं दिल्ली और आस पास के शहरों के ऊपर इकट्ठा हो जाता है .ये सुनकर आपको पराली जलाने वाले किसानों पर बहुत गुस्सा आ रहा होगा... लेकिन इस समस्या के लिए सिर्फ किसान ही ज़िम्मेदार नहीं हैं . पराली जलाना उनका शौक नहीं, मजबूरी है . आखिर किसानों की समस्या क्या है ?

ये समझने के लिए आज हमने किसानों से बात की, और उन्होंने हमें ये विस्तार से बताया कि आखिर क्यों... वो पराली जलाने के लिए मजबूर हैं ? यहां ये जानना भी जरूरी है कि हर वर्ष देश में फसलों का कितना अवशेष निकलता है . Indian Agricultural Research Institute ने वर्ष 2012 में अनुमान लगाया था कि...हर साल देश में 50 से 55 करोड़ टन फसलों के अवशेष निकलते हैं. जिसमें 70 प्रतिशत पराली जलाई जाती है.

फसलों के कुल अवशेष का 34 प्रतिशत हिस्सा धान की फसल का होता है. और गेहूं की फसल का हिस्सा 22 प्रतिशत होता है . IIT कानपुर की वर्ष 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक हर साल पंजाब और हरियाणा में 9 करोड़ टन फसलों के अवशेष जला दिए जाते हैं . अब आप समझिए कि इस समस्या का समाधान क्या है ?पंजाब और हरियाणा की सरकारों को सख्ती से पराली जलाने पर रोक लगानी चाहिए . इसके साथ ही किसानों को पराली ना जलाने के लिए और बेहतर तरीकों से जागरुक करना चाहिए .

पराली को उर्वरक में बदलने वाली हैप्पी सीडर मशीन (Happy Seeder Machine) भी एक अच्छा विकल्प है . ये मशीन एक ही वक्त पर पराली को काटकर जमीन में दबाती जाती है और गेहूं की बुआई भी करती है. लेकिन, .ये मशीन महंगी होती है . राज्य सरकार को किसानों का समूह बनाकर ये मशीन देने के प्रयासों में तेजी लानी चाहिए . ताकि ज्यादा किसानों को इसका फायदा मिल सके. वैसे केंद्र सरकार दावा करती है कि वो इस दिशा में बड़ा कदम उठा चुकी है .

लेकिन सच्चाई ये है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच तालमेल की कमी से... बहुत कम किसानों तक हैप्पी सीडर मशीन पहुंच पाई है . साफ हवा में सांस लेना हर नागरिक का अधिकार है . नागरिकों के अधिकार की रक्षा के लिए सरकारों को किसानों के साथ मिलकर पराली की समस्या का ठोस समाधान खोजना चाहिए . अगर ऐसा नहीं हुआ तोदिल्ली और आस-पास के क्षेत्रों के लोगों को कुछ वर्षों में सांस लेने के लिए शुद्ध हवा भी खरीदनी पड़ेगी .