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ZEE जानकारीः राजधानी में क्यों फ्लॉप हो गया Bogota का BRT Corridor?

आपमें से बहुत सारे लोगों को शायद ये बात पता नहीं होगी, कि दिल्ली में BRT सिस्टम दूसरे देशों से प्रेरणा लेकर बनाया गया था. कोलंबिया की राजधानी Bogota में भी एक ऐसा ही bus rapid transit सिस्टम है.

ZEE जानकारीः  राजधानी में क्यों फ्लॉप हो गया Bogota का BRT Corridor?

नकल करने के लिए भी अक्ल की ज़रुरत होती है. और जो लोग अक्लमंद नहीं होते, वो नकल करने के बाद भी परीक्षा में फेल हो जाते हैं. DNA में हमारा अगला विश्लेषण देश की राजधानी दिल्ली के एक ऐसे ही Failed Project, BRT Corridor यानी Bus Rapid Transit Corridor पर आधारित है. इसे वर्ष 2016 में तोड़ दिया गया था. क्योंकि, ये दिल्ली की जनता के लिए सहूलियत नहीं, मुसीबत लेकर आया था. ये प्रोजेक्ट इसलिए फेल हो गया क्योंकि हमारी सरकार, कोलंबिया के सफल BRT Corridor की ठीक से नकल भी नहीं कर पाई. इसे समझने के लिए हमने दो देशों के ट्रांसपोर्ट सिस्टम और उसे चलाने वालों का एक तुलनात्मक अध्ययन किया है. ये देश हैं भारत और कोलंबिया. और इस विश्लेषण में ज़ी न्यूज़ की मदद की है, अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल Wion की टीम ने. जो इस वक्त कोलंबिया की राजधानी Bogota में है.

आपमें से बहुत सारे लोगों को शायद ये बात पता नहीं होगी, कि दिल्ली में BRT सिस्टम दूसरे देशों से प्रेरणा लेकर बनाया गया था. कोलंबिया की राजधानी Bogota में भी एक ऐसा ही bus rapid transit सिस्टम है. इसे सन 2000 में शुरु किया गया था. और इसी सिस्टम से प्रेरित होकर, वर्ष 2008 में शीला दीक्षित की सरकार ने दिल्ली के मूलचंद से आंबेडकर नगर के बीच BRT Corridor का निर्माण करवाया था. इसे बनाने में 150 से 180 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. 

दिल्ली और Bogota के BRT सिस्टम में तीन समानताएं हैं. दोनों ही जगह BRT Corridor की शुरुआत इसलिए की गई थी, ताकि सड़कों पर लम्बे-लम्बे Jam ना लगें. Sub-Ways बनाने की तुलना में ऐसे सिस्टम पर ज़्यादा खर्च नहीं होता. और ये सिस्टम वातावरण को भी फायदा पहुंचाता है. लेकिन दिल्ली में जब BRT Corridor बनाया गया, तो उसकी वजह से लंबे लंबे Traffic Jam लगने लगे. प्रदूषण ख़तरनाक स्तर पर पहुंच जाता था और सड़क दुर्घटनाएं भी होती थी. जबकि दूसरी तरफ, कोलंबिया की राजधानी के BRT सिस्टम ने वहां के लोगों का जीवन बदल दिया. Bogota की ट्रैफिक व्यवस्था सुधर गई. सड़कों पर Jam लगने कम हो गये. और प्रदूषण भी घट गया.

वर्ष 1988 में Bogota के ट्रांसपोर्ट सिस्टम को बहुत धीमा माना जाता था. वहां के ज़्यादातर हिस्सों तक पहुंचने में औसतन 1 घंटा 10 मिनट का वक्त लगता था. सड़कों पर ज़्यादा गाड़ियां होने की वजह से सड़क दुर्घटनाएं होती थीं. और वहां पर 70 फीसदी वायु प्रदूषण गाड़ियों से निकलने वाले धुएं की वजह से फैलता था. इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए, Bogota में BRT Corridor बनाने का फैसला किया गया. 

ये नेटवर्क 100 किलोमीटर से ज्यादा के दायरे में फैला हुआ है. इसे बनाते वक्त Jam की स्थिति पैदा ना हो, इसका खास ख्याल रखा गया. इसके लिए सड़क के बीचों-बीच 2 Lane का एक Closed Corridor बनाया गया. जिसमें हर 500 मीटर की दूरी पर Bus Stops बनाए गए.  Bogota के BRT Corridor ने वहां के प्रदूषण को 40 फीसदी कम कर दिया. सड़क दुर्घटनाओं में 90 प्रतिशत की कमी आ गई. और सबसे बड़ी बात ये है कि लोगों का Average Travel Time 32 फीसदी घट गया. 

अब सवाल ये है, कि जो सिस्टम कोलंबिया की राजधानी में Hit है, वो हमारे देश की राजधानी में Flop क्यों हो गया ? आज हम इस सवाल का भी जवाब आपको देंगे. लेकिन उससे पहले कोलंबिया चलते हैं, वहां Wion की संवाददाता पलकी शर्मा उपाध्याय आपको बताएंगी कि Bogota का BRT कॉरिडोर, पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ क्यों खींचता है ? Bogota के BRT कॉरिडोर की तस्वीरें देखकर आपको दिल्ली पर तरस आ गया होगा. इस वक्त दिल्ली के जितने भी लोग हमें देख रहे हैं, वो भी यही सोच रहे होंगे, कि जब नाम वही था, सिस्टम भी वही था, तो फिर दिल्ली का BRT फेल क्यों हो गया ? 

इसका सिर्फ एक जवाब है. और वो ये कि हमारे सिस्टम ने दूसरे देशों की हूबहू नकल करके BRT Corridor तो बना दिया, लेकिन उसपर ठीक से रिसर्च नहीं किया. खराब डिज़ाइन और मैनेजमेंट की वजह से दिल्ली का BRT Corridor पूरी तरह असफल साबित हो गया. BRT Corridor में बस स्टॉप भी सड़क के बीच में बना दिये गये..जिसकी वजह से बस स्टॉप तक पहुंचने में लोगों को परेशानी होने लगी. एक स्टडी के मुताबिक...दिल्ली में BRT Corridor की वजह से सड़क हादसों की संख्या में 40 फीसदी का इज़ाफा हो गया था. और उस वक्त हर महीने औसतन 150 छोटे बड़े हादसे होते रहते थे. यानी हमने योजना तो कॉपी कर ली लेकिन रिसर्च और मैनेजमेंट की क्षमता कॉपी नहीं की जा सकती. 

हमारे देश के नेता, बिना रिसर्च किये... BRT जैसी योजनाओं पर, आपकी यानी टैक्सपेयर्स के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई बर्बाद कर देते हैं. जब हमारे देश में आज़ादी का ज़िक्र होता है तो स्वराज की बात भी मन में आती है. लेकिन सही मायने में आम जनता आज भी स्वराज से दूर है. आम जनता के जीवन से जुड़े फैसले बिना उनकी राय लिए और लोगों की सहूलियत को नज़रअंदाज़ करके, ले लिए जाते हैं. पांच साल में अपना वोट देने के अलावा आपके पास कोई अधिकार नहीं होता, कोई ताकत नहीं होती. कोई ये नहीं पूछता कि आप क्या चाहते हैं?

जब तक हमारे देश के नेता आपसे जुड़े फैसलों में आपकी भागीदारी नहीं बढ़ाएंगे.. तब तक भारत के लोगों को स्वराज नहीं मिल सकता.. हमारे देश में स्वराज की स्थिति लाने में ख़बरों का भी बड़ा योगदान होगा.. और ज़ी न्यूज़ इसी दिशा में रिपोर्टिंग कर रहा है.. आम जनता से जुड़ी रिपोर्टिंग का चलन ज़ी न्यूज़ के ज़रिए वापस आ रहा है.