DNA ANALYSIS: चीन को भारत देगा सख्‍त सजा, सड़क से सोशल मीडिया तक 'स्‍ट्राइक'

भारत ने चीन को पहले ही ये संदेश दे दिया था कि भारत दोस्ती निभाना जानता है, तो आंखों में आंखें डाल कर बात करना भी जानता है. 

DNA ANALYSIS: चीन को भारत देगा सख्‍त सजा, सड़क से सोशल मीडिया तक 'स्‍ट्राइक'

नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच सीमा विवाद सुलझने में अभी लंबा समय लग सकता है. यानी दोनों देशों की सेनाएं अभी काफी समय तक ऐसे ही एक दूसरे के सामने तैनात रहेंगी और हो सकता है कि सर्दियों से पहले इस विवाद का कोई हल ना निकले.

30 जून को भारत और चीन के बीच कोर-कमांडर स्तर की बैठक हुई थी ये बैठक भारत की तरफ स्थिति चुशुल में हुई जो करीब 12 घंटे तक चली. ये कोर कमांडर स्तर के बीच हुई तीसरी बैठक थी, इससे पहले 22 जून और 6 जून को भी दोनों सेनाओं के बीच बातचीत हुई थी.

6 जून की बैठक में ये तय हुआ था कि LAC पर तनाव को दूर करने के लिए दोनों सेनाएं पीछे हटेंगी. लेकिन बैठकों के दौर के बावजूद, तनाव कम होने के बजाय बढ़ता ही गया. सूत्रों के मुताबिक 30 जून को हुई बैठक में सैनिकों को पीछे हटाने पर सहमति तो बनी है मगर इसकी प्रक्रिया में अभी और वक्त लगेगा.

सूत्रों ने कहा है कि LAC पर सेनाओं को पीछे हटाने की प्रक्रिया जटिल है और ऐसे में अटकलों वाली और अपुष्ट रिपोर्ट्स से बचने की जरूरत है. सूत्रों ने बताया कि बैठक में दोनों देशों की सेनाएं इस बात पर सहमत हुईं कि LAC पर तनाव घटाने के लिए सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर कई और बैठकों की जरूरत है. यानी स्थितियां ऐसी नहीं लग रही कि भारत और चीन की सेना जल्द ही अपनी-अपनी पोजिशन से पीछे हटने वाली हैं और इस स्थिति के सामन्य होते होते ये पूरा साल बीत सकता है.

भारत ने चीन को पहले ही ये संदेश दे दिया था कि भारत दोस्ती निभाना जानता है, तो आंखों में आंखें डाल कर बात करना भी जानता है. चीन को ये सीधी बात अगर समझ में नहीं आई थी, तो उसे अब, भारत के एक के बाद एक फैसलों से ये बात समझ में आ चुकी होगी. भारत ने 59 चाइनीज ऐप्स बैन करके चीन पर पहले डिजिटल स्ट्राइक की, अब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा संदेश दे दिया है.

और इस बार ये संदेश, प्रधानमंत्री ने चीन की जनता के बीच दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के Weibo पर अपना अकाउंट छोड़ दिया है. आपको Weibo के बारे में बता दें, कि ये चीन का अपना ट्विटर है, जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2015 में अपना अकाउंट बनाया था, उस वक्त वो प्रधानमंत्री के तौर पर चीन के पहले दौरे पर गए थे.

Weibo पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीब ढाई लाख फॉलोअर्स थे, लेकिन चीन के साथ सीमा पर टकराव के बीच अब Weibo डिप्लोमेसी का भी अंत हो गया है. Weibo पर अपने इस अकाउंट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन की भाषा में संदेश देते थे. प्रधानमंत्री मोदी Weibo पर हर वर्ष 15 जून को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को उनके जन्मदिन पर बधाई संदेश देते थे. लेकिन इस वर्ष ऐसा नहीं हुआ.

अब Weibo से अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हट गए हैं, तो इसे आप चीन के बहिष्कार का सबसे बड़ा संदेश समझिए. बताया जा रहा है कि जिस दिन भारत ने 59 चाइनीज ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था, उसी दिन प्रधानमंत्री मोदी के Weibo अकाउंट छोड़ने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई थी.

लेकिन Weibo में किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति को अपना अकाउंट डिलीट करने के लिए चीन की सरकार से मंजूरी लेनी होती है. और ये प्रक्रिया बहुत जटिल है, यानी आसानी से इसकी मंजूरी नहीं मिलती. इसलिए पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अकाउंट से उनसे जुड़ी जानकारी हटा ली गई, फिर उनकी प्रोफाइल फोटो हट गई.

फिर एक-एक करके इस अकाउंट की पोस्ट डिलीट की गई. 115 पोस्ट में 113 पोस्ट हटा लिए गए थे. सिर्फ 2 पोस्ट बचे थे, जो इसलिए डिलीट नहीं हुए थे कि इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रपति शी के साथ फोटो थी और चीन में राष्ट्रपति के साथ खींची गई फोटो को हटाना बहुत मुश्किल है. लेकिन बाद में ये दोनों पोस्ट भी हटा लिए गए.

अब आप सोचिए कि चीन कैसा देश है, जहां सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाने से लेकर उसे डिलीट करने तक, सरकार की मंजूरी के बिना कुछ नहीं हो सकता. जो चीन अपनी कंपनियों के ऐप्स पर लगे प्रतिबंध पर भारत को उपदेश दे रहा है, उस चीन को अपने ही देश का हाल नहीं दिखता.

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इसी बीच चाइनीज ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने के भारत के फैसले पर पहली बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया आई है. ये प्रतिक्रिया अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो की है, जिन्होंने चीन के खिलाफ भारत की कार्रवाई का समर्थन किया है. माइक पोम्पियो ने कहा है कि साफ सुथरे ऐप्स पर भारत की जो सोच है, वो सोच, भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और एकता को मजबूत करेगी. भारत ने जो राह दिखाई है, उस पर चलकर अमेरिका ने भी चीन की कुछ कंपनियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है.

जब 59 चाइनीज ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने का फैसला हुआ था, उस वक्त ही हमने कहा था कि ये चीन को बहुत बड़ा संदेश है और ये बात दूर तक जाएगी. सीमा पर दो महीने से टकराव के बीच, चीन को आर्थिक चोट देने वाले दो और फैसले हुए हैं. पहला फैसला ये हुआ है कि भारत अपने हाईवे प्रोजेक्ट्स में अब चीन की कंपनियों को एंट्री नहीं देगा. दूसरा फैसला ये हुआ है कि संचार मंत्रालय ने सरकारी टेलीकॉम कंपनी BSNL के 4G अपग्रेडेशन टेंडर को रद्द कर दिया है. नया टेंडर अगले दो हफ्ते में जारी होगा और इस नए टेंडर में उन चाइनीज कंपनियों को बाहर रखा जाएगा, जो चाइनीज कंपनियां नेटवर्क अपग्रेडेशन के लिए उपकरण मुहैया कराती हैं.

सबसे पहले उस फैसले के बारे में आपको विस्तार से समझाते हैं, जो फैसला हाईवे प्रोजेक्ट्स को लेकर हुआ है. सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने बुधवार को स्पष्ट तौर पर कह दिया कि भारत, हाईवे प्रोजेक्ट्स में चाइनीज कंपनियों को हिस्सा लेने की मंजूरी नहीं देगा. सिर्फ यही नहीं, अगर कोई चाइनीज कंपनी, भारत की किसी कंपनी के साथ मिलकर कोई ज्वाइंट वेंचर बनाती है और सड़क निर्माण के किसी कॉन्ट्रैक्ट को हासिल करना चाहती है, तो उसकी इजाजत भी अब भारत नहीं देगा. सड़क परिवहन मंत्रालय बहुत जल्द ही एक नई नीति बनाएगा, जिसमें चाइनीज कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने वाले नियम होंगे और देशी कंपनियों के लिए नियमों में रियायत दी जाएगी, जिससे बड़े प्रोजेक्ट्स में भी देशी कंपनियों को ज्यादा मौके मिलें.

भारत अब ये सुनिश्चित करने जा रहा है कि उसके इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में चाइनीज कंपनियों को कोई मौका ना मिले. विदेशी निवेश का तो स्वागत किया जाएगा, लेकिन चीन के निवेश के लिए हर तरफ से दरवाजे बंद किए जाएंगे. आपको ये ध्यान रखना होगा कि भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में चाइनीज कंपनियों की बहुत दिलचस्पी रही है. हाईवे हो या रेलवे, इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में 2020 तक चीन ने करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजना बनाई थी. इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी चीन की कई बड़ी-बड़ी कंपनियां भारत को एक बड़े बाजार की तरह देखती रही हैं. 

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इसका मतलब यही है कि अगर चीन की दादागीरी चलती रहेगी, तो उसे हर तरफ से करारा जवाब मिलेगा, फिर चाहे वो बॉर्डर पर भारत का जवाब हो या फिर व्यापार में भारत का जवाब हो. जब कुछ ऐप्स पर प्रतिबंध से ही चीन परेशान हो गया है, तो सोचिए अब चीन का हाल क्या होगा, जब भारत व्यापार के मामले में एक के बाद एक कड़े फैसले कर रहा है. भारत ने ये भी साफ कह दिया है कि देश के छोटे उद्योगों की क्षमता बढ़ाने के लिए वो दूसरे देशों के निवेशकों से तकनीक और रिसर्च पर सहयोग तो लेगा, लेकिन चीन के निवेशकों को इस क्षेत्र से भी भारत दूर ही रखेगा.

आपको ये ध्यान रखना चाहिए कि पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 2024 तक 100 लाख करोड़ रुपये सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर पर ही खर्च किए जाएंगे. अब आप सोचिए कि ये कितना बड़ा बाजार है, खासतौर पर विदेशी निवेशकों के लिए जिसमें अब चीन के रास्ते एक तरह से बंद हो चुके हैं. सीमा पर चीन ने जो किया है, उसका जवाब अब तक भारत ने आर्थिक तौर पर कैसे दिया है, वो आपको बताते हैं. 

रेलवे और टेलीकॉम के क्षेत्रों में चीन की कंपनियों का व्यापार छीन लेने वाले फैसले हुए हैं. जैसे सरकारी टेलीकॉम कंपनियों को पहले ही ये कह दिया गया था कि वो नेटवर्क को अपग्रेड करने के लिए चाइनीज कंपनियों से उपकरण ना खरीदें. देश की प्राइवेट टेलीकॉम कंपनियों को भी कहा गया था कि वो चाइनीज कंपनियों पर निर्भरता कम करें.

रेलवे के कई प्रोजेक्ट्स में सिग्नलिंग सिस्टम्स और अंडरग्राउंड कॉरिडोर बनाने के लिए कई बड़ी चाइनीज कंपनियों को मिले कॉन्ट्रैक्ट्स की समीक्षा करके इन्हें रद्द करने के संकेत मिल चुके हैं. जैसे दिल्ली और मेरठ के बीच रैपिड रेल प्रोजेक्ट के अंडरग्राउंड हिस्से को बनाने के लिए चीन की कंपनी शंघाई टनल इंजीनियरिंग को करीब साढ़े 11 सौ करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट मिला था.

इसके अलावा सरकार ने अपने E-Marketplace यानी GEM के लिए नया नियम बना दिया था, जिसमें किसी भी विक्रेता को E-Marketplace पर सामान बेचने के लिए उस सामान का Country of Origin बताना होगा. इस फैसले का असर ये होगा कि जो लोग चीन से सामान आयात करते थे और इसे सरकार के E-Marketplace- GEM पर बेचते थे, वो लोग हतोत्साहित होंगे और इससे मेक इन इंडिया को बढ़ावा मिलेगा.

इससे पहले आपको याद होगा कि जब चीन की कंपनियां दुनिया भर में आर्थिक अतिक्रमण कर रही थीं और कोरोना वायरस के दौर में कमजोर हो चुकी कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ा रही थीं, तो इसे देखकर भारत ने FDI के अपने नियमों में भी बदलाव किया था. इसमें फैसला हुआ था कि भारत के साथ जिन देशों का बॉर्डर है, उन देशों की किसी भी कंपनी और व्यक्ति को भारत के किसी भी क्षेत्र में निवेश करने से पहले सरकार की मंजूरी लेनी होगी.

ये फैसला भी उस वक्त चीन को बहुत परेशान कर रहा था और चाइनीज ऐप्स पर बैन का फैसला भी चीन को बहुत चुभ रहा है. 59 चाइनीज ऐप्स पर भारत में प्रतिबंध से चीन क्यों परेशान है, इसकी एक और बड़ी वजह है, जिसके बारे में हम आज आपको बताएंगे. चीन खुद को भविष्य के ग्लोबल टेक पावर के तौर पर देखता है, लेकिन भारत का ये छोटा सा कदम ही चीन के सपने को चूर-चूर कर रहा है.

अगर सिर्फ व्यापार के नजरिए से देखें तो भारत के फैसले से सबसे ज्यादा टिकटॉक की चाइनीज कंपनी ByteDance प्रभावित है, जिसके लिए भारत सबसे बड़ा बाजार है. टिकटॉक के 20 करोड़ यूजर्स भारत में थे. इस ऐप के कुल डाउनलोड्स का 30 प्रतिशत भारत से ही था. पिछले वर्ष जब टिकटॉक पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगा था, उसे करीब 4 करोड़ रुपये प्रति दिन का नुकसान हो रहा था.

टिकटॉक की चाइनीज कंपनी ByteDance ने भारत में करीब साढ़े सात हजार करोड़ रुपये के निवेश की योजना भी बना रखी थी. ByteDance हो या Alibaba Group हो या फिर Tencent हो, चीन की बड़ी-बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों की भारत के बाजार पर सबसे ज्यादा दिलचस्पी रही है, क्योंकि यहां पर करीब 56 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं और वर्ष 2022 तक भारत में करीब 86 करोड़ लोगों के हाथ में स्मार्टफोन होगा.

लेकिन बात सिर्फ इस व्यापार की नहीं है, बात उस बड़े संदेश की है, जो भारत ने दुनिया को दिया है. चीन की टेक्नोलॉजी कंपनियों के खिलाफ पहले से ही दुनियाभर में असुरक्षा का माहौल था. इन चाइनीज कंपनियों पर पहले से आरोप थे कि ये यूजर्स की जानकारियां चीन की सरकार और वहां की कम्यूनिस्ट पार्टी को देती हैं. अब भारत ने जो फैसला किया है, उसने इन आरोपों पर एक तरह से मुहर लगा दी है.

इसी बात का डर चीन को है कि अगर भारत के बाद अमेरिका और यूरोप के देश भी अब उसकी कंपनियों के खिलाफ खुलकर बोलने लगें, और जगह-जगह पर उसकी कंपनियों के कारोबार पर प्रतिबंध लगते रहें, तो फिर भविष्य के ग्लोबल टेक पावर के तौर पर उसका सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा. चीन की टेक्नोलॉजी कंपनियों ने हाल के वर्षों में जो सफलता हासिल की है, भारत के एक फैसले से इस सफलता की चमक फीकी पड़ गई है.

चीन को इस बात की भी चिंता होगी कि भारत के कदम से अमेरिका की कंपनियों को चाइनीज कंपनियों को फिर से बढ़त मिलने लगेगी. जैसे टिकटॉक पर प्रतिबंध लगाने का फायदा भारत में सीधे YouTube को होगा. अगर भारत के मॉडल पर दूसरे देश भी चले, और उन देशों ने भी डेटा प्राइवेसी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर इस तरह के फैसले किए, तो फिर चीन की कंपनियों को बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा.

इसमें एक और बड़ी बात ये है कि चीन को उसी की भाषा में भारत ने जवाब दिया है. क्योंकि जिस तरह से चीन, अपने यहां पर इंटरनेट की निगरानी करता है और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर दूसरे देशों की कंपनियों के ऐप्स को अपने यहां इजाजत नहीं देता, जैसे गूगल, फेसबुक, ट्विटर पर चीन में प्रतिबंध है, वैसा ही अब चीन के साथ होना शुरू हो चुका है और इसकी शुरुआत भारत ने की है.

चीन का डर यही है कि कहीं दुनिया उसके खिलाफ भारत के मॉडल पर ना चलने लगे. क्योंकि अगर ऐसा होने लगा, तो फिर चीन के लिए बहुत बड़ी मुसीबत आ जाएगी. भारत ने 59 चाइनीज ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया है, तो अमेरिका में भी चीन की कंपनी Huawei Technologies और ZTE Corporation को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा घोषित कर दिया गया है.

चीन की ये कंपनियां टेलीकॉम क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां हैं, जिनका अमेरिका सहित पूरी दुनिया में बहुत प्रभाव है. पूरी दुनिया को ये कंपनियां टेलीकॉम उपकरण मुहैया कराती हैं. यही कंपनियां दुनिया भर के देशों में नेक्स्ट जनरेशन 5G नेटवर्क्स बनाने में जुटी हैं, लेकिन इन पर पहले से ही अमेरिका से लेकर यूरोप तक पिछले कई वर्षों में गंभीर सवाल उठ चुके हैं.

इन कंपनियों पर आरोप है कि ये चीन की सरकार और वहां की सत्ताधारी कम्यूनिस्ट पार्टी की करीबी कंपनियां हैं और दुनिया भर के देशों से नागरिकों की जानकारियां चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी तक पहुंचाती हैं. चीन में बने कानून के तहत ऐसी कंपनियों को यूजर्स से जुटाई हर जानकारी, चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी और वहां की सरकार के साथ साझा करनी पड़ती है. ये इन चाइनीज कंपनियों की कानूनी बाध्यता है.

अमेरिका के फेडलर कम्यूनिकेशन्स कमीशन (FCC) ने Huawei और ZTE के बारे में कहा है कि चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी से इन कंपनियों के जिस तरह के संबंध है, उसे देखते हुए अमेरिकी सरकार को आगाह किया जा रहा है कि चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी, अमेरिका के संचार नेटवर्क में कमियों का फायदा उठा सकती है. अमेरिका में ये कहा जा रहा है कि चीन, Huawei के उपकरणों का इस्तेमाल जासूसी के लिए कर सकता है.

FCC के इस फैसले का मतलब ये है कि अब अमेरिका की छोटी कंपनियां, उन उपकरणों के लिए सरकारी सब्सिडी का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगी, जो उपकरण Huawei और ZTE से उन्हें सस्ते कीमत पर मिलते हैं. एक अनुमान के मुताबिक Huawei और ZTE पर प्रतिबंध लगने से टेलीकॉम उपकरणों की लागत और खर्च 30 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी, खासतौर पर तब जब पूरी दुनिया 5G सेवाओं के लिए नेटवर्क तैयार कर रही है.

ये तो अमेरिका की बात हुई, भारत में भी करीब 75 प्रतिशत टेलीकॉम उपकरण, ZTE और Huawei से ही आते हैं, ये भी बहुत बड़ी चिंता की बात है. 

सरकारी टेलीकॉम कंपनियों के साथ-साथ प्राइवेट टेलीकॉम कंपनियां भी ZTE और Huawei पर निर्भर हैं. एयरटेल हो या फिर वोडाफोन उनके 30 से 40 प्रतिशत उपकरण Huawei से ही आते हैं. अब चीन से टकराव के बीच भारत ने चीन की इन कंपनियों पर निर्भरता कम करने की बात है. भारत में 5G नेटवर्क ट्रायल में Huawei को भी हिस्सा लेना है. लेकिन जिस तरीके अब स्थितियां बदली हैं, उसमें सवाल ये है कि क्या भारत आगे और भी बड़े और कड़े फैसले कर सकता है?

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