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DNA ANALYSIS: न्यायपालिका से 'खेलने' वालों को 'सुप्रीम सबक'

सुप्रीम कोर्ट ने आज वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को अवमानना के मामले का दोषी माना है. प्रशांत भूषण ने दो महीने पहले देश की न्यायपालिका, मौजूदा चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और 4 पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया पर कुछ आपत्तिजनक Tweets किए थे.

DNA ANALYSIS: न्यायपालिका से 'खेलने' वालों को 'सुप्रीम सबक'

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने आज वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण (Prashant bhushan) को अवमानना के मामले का दोषी माना है. प्रशांत भूषण ने दो महीने पहले देश की न्यायपालिका, मौजूदा चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और 4 पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया पर कुछ आपत्तिजनक Tweets किए थे. जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया और उन पर अवमानना का मुकदमा चला. इसी मुकदमे में आज फ़ैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वकील प्रशांत भूषण दोषी ठहराया है.

20 अगस्त को सुनाई जाएगी सजा
प्रशांत भूषण की सज़ा पर अगले हफ़्ते 20 अगस्त को बहस होगी. उन्हें इस मामले में छह महीने तक जेल की सज़ा हो सकती है. लेकिन ये बात सिर्फ़ सज़ा की नहीं है. ये बात उस कड़े संदेश की है, जो संदेश आज सुप्रीम कोर्ट से आया है. प्रशांत भूषण जैसे वकील, जो एक तरफ़ कानून के हिमायती बनते हैं. दूसरी तरफ़ उसी कानून का अपमान करते हैं, ऐसे लोगों को ये सख़्त संदेश मिलना ज़रूरी था.

यहां बात प्रशांत भूषण की नहीं है.प्रशांत भूषण तो बहुत छोटे व्यक्ति हैं. बात प्रशांत भूषण जैसे लोगों को मिलने वाले संदेश की है. प्रशांत भूषण ने जो अपनाजनक Tweet किए थे. उसका हम वर्णन नहीं कर सकते. आपको केवल ये बता सकते हैं कि ये Tweet उन्होंने इसी वर्ष Lock Down के दौरान किए थे.

सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों पर कुछ भी कहने से एक आम आदमी सौ बार सोचता है. लेकिन प्रशांत भूषण जैसे लोग, किसी के भी ख़िलाफ़, कुछ भी बोलकर, बच जाते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इस देश में इनकी मज़बूत लॉबी है और इनकी पहुंच दूर-दूर तक है. इसलिए किसी को कुछ भी कहने, किसी पर भी आरोप लगाने और किसी की भी निष्ठा पर सवाल उठाने में इन्हें किसी प्रकार का डर नहीं हैं. 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कानून सबके लिए बराबर
आज देश की सबसे बड़ी अदालत ने ये बता दिया कि कानून अंधा हो सकता है, असहाय नहीं है. अगर कोई न्यायपालिका की निष्ठा पर सवाल उठाएगा और न्यायिक व्यवस्था पर जनता के विश्वास पर आघात करेगातो ऐसा करके वो बच नहीं सकता. अदालत की अवमानना के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी की बेंच ने प्रशांत भूषण के पक्ष की दलीलें नहीं मानीं.

सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए, अपने फ़ैसले में कहा है कि ऐसा व्यक्ति जो 30 वर्ष से वकालत कर रहा है और जो कई जनहित से जुड़े मामलों को सुप्रीम कोर्ट में लेकर आया. उससे इस तरह के Tweets की उम्मीद नहीं की जा सकती है.इन Tweets में कही गई बातों को न्यायपालिका की स्वस्थ आलोचना नहीं माना जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण की कही बातों को सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की गरिमा को गिराने वाला बताया. कहा कि इस तरह की बातों से न्यायपालिका में जनता के विश्वास को ठेस पहुंचती हैं. बहुत लोग ये भी कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण के खिलाफ सख्त फैसला किया है और जजों को अपनी आलोचना पर उदार होना चाहिए.

आज सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में इस बात को सही बताया कि जजों को अपनी आलोचना में उदारता दिखानी चाहिए. लेकिन इसके साथ ये भी कहा कि ये उदारता एक हद तक हो सकती है. जब गलत नीयत और जान बूझकर न्यायपालिका पर प्रहार होंगे, तो ऐसा नहीं हो सकता कि इस तरह के मामलों में सख़्ती से ना निपटा जाए।

'आलोचना कर सकते हैं लेकिन गरिमा धूमिल नहीं कर सकते'
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने अधिकारों को, किसी जज के मान-सम्मान को बचाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया है. इसके बजाय कानून की मर्यादा और न्याय व्यवस्था की गरिमा को बचाए रखने के लिए अपने अधिकार इस्तेमाल किए हैं.प्रशांत भूषण ने जो बातें कही थी, वो किसी एक या दो जज पर नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की पिछले छह वर्षों की कार्यप्रणाली पर जानबूझ कर हमले किए हैं. इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती है।

हमारे यहां कहावत है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती. प्रशांत भूषण जैसे वकील और इनकी लॉबी, जिसमें बड़े बड़े वकील, नेता, पत्रकार और बुद्धिजीवी शामिल हैं. ये लोग अक्सर अपने राजनैतिक एजेंडे की वजह से जानबूझ कर संवैधानिक संस्थाओं पर हमले करते हैं और उन्हें कमज़ोर करने की कोशिश करते हैं.

आम लोगों को भी लगने लगा था कि ऐसे लोगों का कोई कुछ बिगाड़ नहीं पाता और अदालतें भी इनके सामने बेबस हो जाती हैं. लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट ने इस भ्रम को तोड़ दिया है और इस देश की जनता के विश्वास की फिर जीत हुई कि यहां कानून से कोई खिलवाड़ नहीं कर सकता. अगर ऐसे लोगों में से किसी एक को भी सज़ा मिलेगी, तो फिर यही लोग भविष्य में अदालतों और संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करना शुरू कर देंगे. और अगर सम्मान नहीं करेंगे तो कम से कम इन संस्थाओं का अपमान करने की हिम्मत नहीं करेंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण के खिलाफ 108 पन्नों का फैसला सुनाया
प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ 108 पन्नों को इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ये भी बताया कि आख़िर न्यायपालिका की निष्ठा पर संदेह करने वाली अपमानजनक टिप्पणियां सिर्फ़ आलोचना नहीं मानी जा सकतीं।. कोर्ट का कहना है कि आलोचना तो की जा सकती है, लेकिन इसका भी एक दायरा है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में ये कहा है कि निष्पक्ष और निर्भीक होकर न्याय देने की क्षमता और लोगों का भरोसा ही न्यायपालिका की बुनियाद है. ये बुनियाद तब हिल जाती है, जब कोर्ट का अनादर किया जाता है और अदालत के प्रति अविश्वास पैदा किया जाता है. इससे पूरे न्याय तंत्र पर सवाल उठने लगते हैं. जानबूझकर और दुर्भावना से कोर्ट पर किए गए हमलों से अदालत की गरिमा कम होती है और इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी होनी चाहिए. लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब, संवैधानिक संस्थाओं का अपमान करना नहीं है. अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब देश के टुकड़े टुकड़े करने वाली सोच का समर्थन करना नहीं है. अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब, अपराधियों, देशविरोधी लोगों और आतंकवादियों की हिमायत करना नहीं है.

आप अगर ध्यान दें तो आपको याद आ जाएगा कि इस देश में जो टुकड़े टुकड़े गैंग सक्रिय है. उसके लोग, किसी भी मामले में तुरंत सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाते हैं. ये लोग अपनी ताकत का इस्तेमाल करके अदालतों का दुरुपयोग करते हैं. इनके पास महंगे महंगे वकील हैं, जो कानूनी दांवपेंच जानते हैं और इसके सहारे अपना एजेंडा चलाते हैं. 

आतंकियों की पैरवी में आगे रहा टुकड़े- टुकड़े गैंग
इसी वजह से करीब 7 वर्षों तक निर्भया केस के दोषियों की फांसी की सज़ा अटकी रही और बाद में फांसी रुकवाने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई.  ऐसे ही लोग याकूब मेमन जैसे आतंकवादियों की फांसी रुकवाने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाते हैं और सुनवाई करा लेते हैं. ऐसी ही सोच वाले लोग, अफज़ल गुरू जैसे आतंकवादियों को सुप्रीम कोर्ट से मिली फांसी को Judicial Murder कहते हैं. यही लोग अर्बन नक्सलियों को गिरफ़्तारी से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाते हैं.

इन्हीं लोगों ने अयोध्या में राम मंदिर के मामले पर वर्षों तक बहाने बनाकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई नहीं होनी दी. इन्हीं लोगों ने कश्मीर में अनुच्छेद 370 और मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक के ऐतिहासिक फ़ैसलों को सुप्रीम कोर्ट से रोकने की कोशिश की थी. यही लोग थे, जिन्होंने देश की सुरक्षा के लिए ज़रूरी रफाल डील को सुप्रीम कोर्ट से रोकने में पूरा ज़ोर लगा दिया था.

आपको याद होगा कि पिछले वर्ष हैदराबाद एनकाउंटर के मामले में भी ऐसे लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए थे. इसी तरह से पिछले महीने विकास दुबे जैसे अपराधियों के एनकाउंटर के ख़िलाफ़ भी ऐसे ही लोग, सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए थे. जिसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार को इस एनकाउंटर पर जवाब देना पड़ा था.

भ्रष्टाचार का आरोप
ये बुद्धिजीवियों और वकीलों का एक ऐसा सिंडिकेट है, जिसका संबंध राजनीतिक दलों से है. इनकी पहुंच न्यायपालिका में बहुत अंदर तक है. आप ये भी कह सकते हैं कि ये लोग न्यायपालिका के अंदर राजनीतिक दलों के Agent की तरह काम करते हैं. ये लोग अपने राजनीतिक एजेंडे पर अदालत की मुहर लगवाने में जुटे रहते हैं. कुल मिलाकर ये लोग अपनी मनमर्ज़ी की न्यायपालिका चाहते हैं. जिसमें हर फ़ैसला उनके मन मुताबिक हो।

सुप्रीम कोर्ट के जजों पर आरोप लगाने का ये सिलसिला नया नहीं है. वर्ष 2007 में पूर्व चीफ जस्टिस Y K सभरवाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर उनके ख़िलाफ़ ज़बरदस्त अभियान चलाया गया था. उन पर एफआईआर दर्ज़ करने की मांग की गई थी. उनके ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले कोई और नहीं, वही प्रशांत भूषण हैं. जो आज अदालत की अवमानना के दोषी पाए गए हैं. इन आरोपों पर जस्टिस सभरवाल लंबे समय तक चुप रहे. लेकिन फिर उऩ्होंने अपनी चुप्पी तोड़ने का फ़ैसला किया.  तब उन्होंने जनता के सामने अपनी बात रखने के लिए देश के सबसे पुराने और सबसे भरोसेमंद News Channel, Zee News को चुना था.