DNA ANALYSIS: पहले त्योहार अब कोरोना की मार, देश के 50% से ज्यादा केस अकेले इस राज्य में

Coronavirus: देश की कुल आबादी में इस राज्य की हिस्सेदारी सिर्फ 2.76 प्रतिशत की है, लेकिन सोचने वाली बात ये है कि लगभग ढाई प्रतिशत आबादी वाले राज्य में देश के 50 प्रतिशत से ज्यादा संक्रमण के मामले हैं.

DNA ANALYSIS: पहले त्योहार अब कोरोना की मार, देश के 50% से ज्यादा केस अकेले इस राज्य में

नई दिल्ली: पिछले कई दिनों से देश के लोगों ने कोरोना वायरस के बारे में अब बात करना बंद कर दिया है. हमारे देश के लोग हर बार यही भूल करते हैं. जैसे ही कोरोना के मामले कम होते हैं. वैसे ही हम ये मान लेते हैं कि अब स्थिति सामान्य हो गई है, लेकिन सबसे चिंताजनक और निराशाजनक खबर केरल से आई है, जहां कोविड का जबरदस्त विस्फोट हुआ है.

केरल सरकार की सबसे बड़ी भूल

आपको याद होगा हमने ईद के समय कई बार सरकार और सुप्रीम कोर्ट को सावधान किया था और कहा था कि ईद के मौके पर लॉकडाउन को खोलना केरल सरकार की सबसे बड़ी भूल होगी, लेकिन केरल सरकार ने 27 प्रतिशत मुस्लिम वोट बैंक के लिए देश के 50 प्रतिशत कोरोना मामलों को भी स्वीकार कर लिया.

27 जुलाई को पूरे देश में कोरोना वायरस के 43 हजार 654 नए मामले दर्ज हुए, लेकिन इनमें से 50 प्रतिशत से ज्यादा मामले अकेले केरल में मिले. केरल में 28 जुलाई को पिछले 24 घंटे में संक्रमण के 22 हजार 129 नए मामले दर्ज हुए. 29 मई यानी 59 दिनों के बाद केरल में कोरोना का ये अब तक सबसे बड़ा विस्फोट है और इस विस्फोट में तुष्टिकरण और सांप्रदायिकता का बारूद भी भरा हुआ है.

देश के 50 प्रतिशत से ज्यादा संक्रमण के मामले

केरल की कुल आबादी 3 करोड़ 34 लाख है यानी इस हिसाब से देश की कुल आबादी में केरल की हिस्सेदारी सिर्फ 2.76 प्रतिशत की है, लेकिन सोचने वाली बात ये है कि लगभग ढाई प्रतिशत आबादी वाले राज्य में देश के 50 प्रतिशत से ज्यादा संक्रमण के मामले हैं.

यूपी का स्कोर केरल से बेहतर

उत्तर प्रदेश की बात करें तो 2011 की जनगणना के मुताबिक यूपी की कुल आबादी लगभग 20 करोड़ है और देश की कुल आबादी में यूपी की हिस्सेदारी लगभग साढ़े 16 प्रतिशत की है, लेकिन इसके बावजूद 27 जुलाई को यूपी में संक्रमण के केवल 18 नए मामले ही मिले.

यानी यूपी का स्कोर केरल के स्कोर से न सिर्फ बेहतर है, बल्कि यूपी में संक्रमण अब लगभग खत्म हो गया है, लेकिन इसके बावजूद हमारे देश का सुप्रीम कोर्ट उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा के आयोजन पर तो रोक लगवा देता है, लेकिन वो केरल में ईद के मौके पर दी गई छूट पर स्वत: संज्ञान नहीं लेता. धर्मनिरपेक्ष देश में तुष्टिकरण वाला ये डिस्काउंट सिर्फ आप भारत में ही देख सकते हैं.

मल्लपुरम में सबसे ज्यादा नए मामले

अगर कश्मीर के जिलों को छोड़ दें तो भारत में केरल का मल्लपुरम जिला सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले जिलों में दूसरे स्थान पर है. पहले स्थान पर असम का धुबरी जिला है और उसके बाद मल्लपुरम का नंबर आता है. यहां लगभग 70 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं और ईद पर केरल सरकार ने लॉकडाउन में जो छूट दी थी, उस दौरान इसी जिले में सबसे ज्यादा भीड़ जुटी थी और अब कोरोना के मामले भी यहां सबसे ज्यादा मिल रहे हैं.

27 जुलाई को मल्लपुरम जिले में चार हजार से ज्यादा नए मामले दर्ज हुए  यानी उत्तर प्रदेश राज्य से 224 गुना मामले अकेले मल्लपुरम में मिले हैं और ये सब तुष्टिकरण की वजह से हुआ है.

तुष्टिकरण शब्द तुष्ट से मिलकर बनता है और तुष्ट का हिन्दी में अर्थ होता है किसी को खुश करना और केरल की सरकार ने ईद के मौके पर ऐसा ही किया. अब सवाल है कि क्या केरल की सरकार और देश की अदालतें इसकी जिम्मेदारी लेंगी?

सुप्रीम कोर्ट कांवड़ यात्रा की तरह इस पर रोक नहीं लगवा सका

सुप्रीम कोर्ट ने इसी महीने की 14 जुलाई को कांवड़ यात्रा पर स्वत: संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को कहा था कि अगर सरकार ने इस यात्रा को रद्द नहीं किया तो अदालत खुद इस पर फैसले लेने के लिए मजबूर हो जाएगी, लेकिन जब बात ईद पर लॉकडाउन में छूट की आई, तो सुप्रीम कोर्ट कांवड़ यात्रा की तरह इस पर रोक नहीं लगवा सका.

 कोरोना की तीसरी लहर का खतरा

हालांकि 20 जुलाई को सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने ये जरूर कहा था कि अगर इस फैसले की वजह से केरल में कोरोना के मामले बढ़े और लोगों की जानें गईं तो वो उचित कार्रवाई करेगा. इसलिए हम केरल की ये स्थिति सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में भी लाना चाहते हैं और आपको ये भी बताना चाहते हैं कि केरल सरकार के एक फैसले की वजह से भारत कोरोना की तीसरी लहर की तरफ जा सकता है. 6 जून के बाद ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी राज्य में 20 हजार से ज्यादा नए मामले दर्ज हुए हैं.

आज ये खबर आपके लिए एक केस स्टडी भी है कि कैसे हमारे देश में कुंभ की भीड़ को अलग चश्मे से देखा जाता है और ईद की भीड़ को अलग चश्मे से देखा जाता है और हमें लगता है कि धर्मनिरपेक्षता के नजरिए में ये विरोधाभास इस विचार को कहीं न कहीं अपाहिज बना रहा है.

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