DNA ANALYSIS: निर्भया केस- ये लोग नहीं चाहते दोषियों को मिले फांसी!

पूरा देश चाहता है कि निर्भया के दोषियों को जल्द से जल्द फांसी होनी चाहिए और 3 मार्च के दिन को निर्भया न्याय दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए. लेकिन...

DNA ANALYSIS: निर्भया केस- ये लोग नहीं चाहते दोषियों को मिले फांसी!

पूरा देश चाहता है कि निर्भया के दोषियों को जल्द से जल्द फांसी होनी चाहिए और 3 मार्च के दिन को निर्भया न्याय दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए. लेकिन फिलहाल तो स्थिति ये है कि निर्भया के लिए सिर्फ मुट्ठी भर लोग आवाज़ उठा रहे हैं जबकि उसके दोषियों को माफी दिलाने की मांग करने वालों की संख्या हर दिन बढ़ती जा रही है. इनमें देश के कई बुद्धीजीवी और वरिष्ठ वकील भी शामिल हैं. और निर्भया विरोधी गैंग के ये सदस्य अब निर्भया की मां का भी लगातार अपमान कर रहे हैं.

इसी महीने की 13 तारीख को जब निर्भया मामले पर सुनवाई हो रही थी और तब अदालत के बाहर दोषियों के परिवार वाले, कुछ संगठन और कुछ मानव-अधिकार कार्यकर्ता इस फांसी के विरोध में नारेबाज़ी कर रहे थे. इन लोगों के हाथ में कुछ पोस्टर्स थे. जिन पर लिखा था कि फांसी देना बंद करो और एक मौत के बदले में 4 लोगों को फांसी नहीं दी जा सकती.

यानी 6 लोग मिलकर एक 23 साल की लड़की को जान से मार सकते हैं. उसके साथ जानवरों जैसा सलूक कर सकते हैं. उसके कपड़ों और चरित्र पर सवाल उठा सकते हैं. लेकिन उन्हें फांसी देना इन लोगों के लिए मानव-अधिकारों का उल्लंघन है. इन लोगों का कहना था कि सरकार एक साथ 4 माओं से उनके बच्चों को नहीं छीन सकती. लेकिन इनके बेटों ने जब एक मां की कोख उजाड़ी तब ये लोग सामने नहीं आए. इन्होंने निर्भया के मानव-अधिकारों की बात नहीं की. हालांकि इसी दौरान निर्भया के दोषियों के खिलाफ भी प्रदर्शन हो रहे थे. लेकिन मीडिया के एक हिस्से की भी ज्यादा दिलचस्पी सिर्फ दोषिय़ों के परिवारों में थी.

यह भी देखें:-

आपमें से शायद बहुत कम लोगों को पता होगा कि पिछले 67 दिनों से निर्भया के घर के पास हर शाम एक कैंडल मार्च निकाला जाता है जिसमें शामिल लोग निर्भया को न्याय दिलाने की मांग उठाते हैं. जबकि पिछले 66 दिनों से दिल्ली के शाहीन बाग में नए नागरिकता कानून के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं. और पूरे देश को इसके बारे में पता है.

शाहीन बाग़ जाकर देश का मीडिया वहां होने वाली हर हलचल की Live Coverage करता है. प्रदर्शनकारियों की बातों को बहुत ध्यान से सुना जाता है और नए कानून को मानव-अधिकारों का उल्लंघन बताया जाता है. बड़े बड़े डिजाइनर पत्रकार और बुद्धिजीवी भी लगभग हर दिन शाहीन बाग़ जाते हैं. वहां इनका स्वागत किया जाता है और मंच पर इनसे भाषण करवाए जाते हैं. बडे-बड़े वकील इन प्रदर्शनकारियों की पैरवी करते हैं और इनकी बात सरकार तक पहुंचाने का ज़रिया भी बन जाते हैं.

लेकिन पिछले 66 दिनों में शायद ही किसी पत्रकार ने निर्भया के घर का रुख किया होगा, और किसी बुद्धिजीवी और वरिष्ठ वकील का निर्भया के घर जाने का तो कोई चांस ही नहीं है. ये लोग शाम को शाहीन बाग़ जाते हैं. वहां संविधान और कानून पर चर्चाएं करते हैं. इसके बाद ये लोग महंगे होटलों में जाकर कैंडल लाइट डिनर करते हैं और फिर चैन की नींद सो जाते हैं. जबकि शाहीन बाग़ से निर्भया के घर की दूरी सिर्फ 28 किलोमीटर है. और उस रूट में इस समय ज्यादा ट्रैफिक भी नहीं है. इसलिए इनमें से कोई चाहे तो वहां जाकर निर्भया की मां को दिलासा दे सकता है और कोई बड़ा वकील उनसे ये भी कह सकता है कि आप चिंता मत कीजिए. मै आपका केस लड़ूंगा और जल्द से जल्द न्याय दिलवाऊंगा.

शाहीन बाग़ में सिर्फ बुद्धिजीवी और बड़े बड़े वकील ही नहीं जा रहे  बल्कि जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी, जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी और देश के दूसरे विश्व विद्यालयों के छात्र भी वहां जाकर इन विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेते हैं लेकिन इनमें से कोई भी निर्भया के घर शायद नहीं जाना चाहता. ये छात्र आजादी के लिए क्रांति तो करना चाहते हैं. लेकिन एक पीड़ित को न्याय दिलाने में इनकी कोई दिलचस्पी नहीं है.