Nirbhaya Case: जानिए, जिन दोषियों के लिए सभी रास्ते बंद, उन्हें क्यों नहीं दी जा रही फांसी?

Nirbhaya Case में 4 दोषियों को फांसी की सज़ा हुई है. इनमें से 2 दोषियों के लिए अब फांसी से बचने के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं.

Nirbhaya Case: जानिए, जिन दोषियों के लिए सभी रास्ते बंद, उन्हें क्यों नहीं दी जा रही फांसी?

निर्भया केस (Nirbhaya Case) में 4 दोषियों को फांसी की सज़ा हुई है. इनमें से 2 दोषियों के लिए अब फांसी से बचने के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं. लेकिन, बाकी 2 के पास अभी भी कानूनी विकल्प बचे हुए हैं. अब आपके मन में ये सवाल आ रहा होगा कि जिन 2 के सारे विकल्प खत्म हो चुके हैं, उन्हें फांसी पर क्यों नहीं लटकाया जा रहा है? इस सवाल का जवाब वर्ष 1982 के एक फैसले में छिपा हुआ है, जो 'हरबंस सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार' के नाम से जाना जाता है.

आपको संक्षेप में ये कहानी सुना देते हैं. उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में निचली अदालत ने 3 लोगों को हत्या के एक मामले में फांसी की सज़ा सुनाई थी. जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा. लेकिन इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में Nirbhaya Case के तीनों दोषियों ने अलग-अलग समय में याचिका दाखिल की. सुप्रीम कोर्ट ने पहले दोषी की सज़ा में बदलाव नहीं किया और उसे फांसी दे दी गई.

दूसरा दोषी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो उसकी सुनवाई किसी अलग बेंच ने की और फांसी को उम्र कैद में बदल दिया. तीसरा दोषी यानी हरबंस सिंह जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो उसे फांसी से राहत नहीं मिली. राष्ट्रपति ने भी उसकी दया याचिका को ख़ारिज कर दिया. इसके बाद हरबंस सिंह दोबारा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और उसने सवाल उठाया कि एक ही केस में किसी को उम्रकैद तो किसी को फांसी कैसे हो सकती है?

तब सुप्रीम कोर्ट ने ये माना था कि कहीं न कहीं गलती हुई है. एक अपराध के लिए अलग-अलग सज़ा नहीं हो सकती. तभी से एक केस में, फांसी के सभी दोषियों को एक साथ ही फांसी दी जाती है. केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करके मांग की है कि निर्भया केस के दोषियों को अलग-अलग फांसी दी जाए, जिसपर सुनवाई होनी है.

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लेकिन हम ये सवाल उठा रहे हैं कि जब एक साथ फांसी का प्रावधान है तो एक साथ अपील का प्रावधान क्यों नहीं है? निर्भया के चारों दोषी जान-बूझकर, बड़ी चालाकी से अलग-अलग समय में याचिकाएं दाखिल कर रहे हैं. और निर्भया की मौत के बाद उसकी आत्मा को भी पीड़ा पहुंचा रहे हैं. इसीलिए, न्याय की इस मुहिम में हम सवाल उठा रहे हैं कि हमारे देश की व्यवस्था सिर्फ दोषियों के अधिकारों की रक्षा क्यों करती है?

ऐसे नियम क्यों नहीं बनाए जा सकते, जिसमें ये तय कर दिया जाए कि एक अपराध में फांसी की सज़ा पाने वाले सभी दोषियों को एक साथ याचिका दायर करनी होगी. निर्भया की मां आशा देवी बार-बार ये बात कह रही हैं कि हमारी न्याय-व्यवस्था दोषियों के अधिकार की चिंता तो करती है, लेकिन वो पीड़ित के अधिकारों की फिक्र नहीं करती. ये बड़ी बात है. इस बात पर आक्रोश और आंसू दोनों वाजिब हैं.

खुद सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया पर अपने फैसले में कहा था कि इस क्रूर वारदात के बाद, निर्भया के गुनहगारों का कोई भी आचरण या उनका कोई भी बयान इस केस को rarest of rare cases की श्रेणी से अलग नहीं कर सकता. कोर्ट ने अपने Nibhaya Case के फैसले में पूरी घटना का जिक्र करते हुए ये भी कहा था कि ऐसा लगता है कि ये कहानी किसी दूसरी दुनिया की है, जहां मानवता की कोई कद्र नहीं है.

क्योंकि इन मुजरिमों ने अपनी हवस के लिए एक घिनौना कृत्य किया और संभ्रांत समाज की चेतना को झकझोर दिया. यहां हम एक पंक्ति की ओर आपका फिर से ध्यान दिलाना चाहेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ''ऐसा लगता है ये कहानी किसी दूसरी दुनिया की है, जहां मानवता की कोई कद्र नहीं है.

ज़रा सोचिए खुद सुप्रीम कोर्ट ने इन दोषियों के बारे में कहा कि ये इस दुनिया के नहीं लगते, इन्हें मानवता की कोई कद्र नहीं है. भला ऐसे दरिंदों का कोई मानवाधिकार क्यों होना चाहिए? और इनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए कोई कानून क्यों होना चाहिए ?

लेकिन अफसोस की बात है कि हमारे देश में इतने घिनौने अपराधियों के मानव-अधिकारों की रक्षा करने वाले भी मौजूद हैं. वो निर्भया के मामले में भी दरिंदों को माफ करने की वकालत करते हैं. पापियों के इन पहरेदारों में, बड़े-बड़े वकील, बुद्धिजीवी और डिजाइनर पत्रकार शामिल हैं. लेकिन हम आज आपसे अपील करते हैं कि आपको ऐसे लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए .निर्भया के मामले में आपके आंसू और आपके आक्रोश दोनों खत्म नहीं होने चाहिए .