DNA ANALYSIS: अयोध्या पर ओली का ज्ञान 'मेड इन चाइना'?

जो नेपाल कभी भारत का घनिष्ठ मित्र हुआ करता था. वो आज चीन के बहकावे में आकर भारत विरोधी हरकतें कर रहा है और इसके केंद्र में हैं नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली. 

DNA ANALYSIS: अयोध्या पर ओली का ज्ञान 'मेड इन चाइना'?

नई दिल्ली: आज हम आपको हजारों वर्ष पुरानी एक कहानी के बारे में बताते हैं. इस कहानी का वर्णन रामायण में आता है. इस कहानी के दो किरदार हैं. पहला किरदार है राजा दशरथ की तीसरी पत्नी कैकेयी और दूसरा किरदार है कैकेयी की दासी मंथरा. कैकयी भरत की मां थी. वो राम को अयोध्या का राजा बनाए जाने से प्रसन्न भी थी. लेकिन मंथरा के भड़काने पर उन्होंने अपना इरादा बदल दिया और पूर्व में दिए गए एक वचन के मुताबिक राजा दशरथ ने श्री राम को 14 वर्ष के लिए वनवास पर भेज दिया और अयोध्या का राजपाट भरत को सौंप दिया गया. इसके बाद क्या हुआ आप सब जानते हैं. लेकिन आज हम आपको ये कहानी इसलिए बता रहे हैं क्योंकि हजारों वर्ष पहले जिस लालच और धोखे का जिक्र रामायण में किया गया था वो आज के जमाने की भी सच्चाई है.

उदाहरण के लिए जो नेपाल कभी भारत का घनिष्ठ मित्र हुआ करता था. वो आज चीन के बहकावे में आकर भारत विरोधी हरकतें कर रहा है और इसके केंद्र में हैं नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली. सोमवार को केपी शर्मा ओली ने एक अजीबो-गरीब दावा किया था और कहा था कि असली अयोध्या भारत में नहीं बल्कि नेपाल में हैं और भगवान राम भारतीय नहीं बल्कि नेपाली थे. कुछ लोग कह रहे हैं कि ओली कलयुग का ये रामायण चीन के इशारे पर रच रहे हैं. हालांकि अब नेपाल के प्रधानमंत्री की उनके ही घर में आलोचना हो रही है. लेकिन आपको ये समझना चाहिए कि केपी शर्मा ओली ये सब किसके इशारे पर कर रहे हैं. ताजा स्थिति कहती हैं कि केपी शर्मा ओली की कुर्सी चीन की वजह से बची हुई है और इसी का कर्ज चुकाने के लिए वो भारत को भड़काने वाले बयान दे रहे हैं. यानी झूठे तथ्यों पर आधारित जिस इतिहास को केपी शर्मा ओली दुनिया के सामने पेश कर रहे हैं वो चीन द्वारा लिखा गया है.

चीन के अहसानों तले दबे ओली
ओली सिर्फ कुर्सी बचाने को लेकर ही चीन के अहसानों तले नहीं दबे हैं, बल्कि एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन की मदद से केपी शर्मा ओली ने पिछले कई वर्षों में बड़ी मात्रा में काला धन कमाया है और ये रकम स्विटजरलैंड के एक बैंक में जमा है.

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े खुलासे करने वाली एक संस्था ग्लोबल वॉच एनालिसिस (Global Watch Analysis) के मुताबिक वर्ष 2015-16 में जब केपी शर्मा ओली पहली बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने कंबोडिया के टेलीकॉम सेक्टर में निवेश किया था और इसमें नेपाल में चीन के तत्कालीन राजदूत और नेपाल छोड़कर जा चुके व्यापारी आंग शेरिंग शेरपा ने उनकी मदद की थी.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री के तौर पर दूसरे कार्यकाल के दौरान भी केपी शर्मा ओली चीन की मदद करते रहे और उसके बदले में ओली के करीबियों को पैसा मिलता रहा. दावा है कि वर्ष 2018 में नेपाल की सरकारी दूरसंचार कंपनी को नजर अंदाज करके चाइना सर्विस कम्युनिकेशन नामक कंपनी को प्रधानमंत्री कार्यालय में एक डिजटल एक्शन रूम बनाने का ठेका दे दिया गया था. इस रिपोर्ट में ये भी दावा है कि ओली ने चीन के दबाव में कई सरकारी प्रोजेक्ट्स चीन की कंपनियों को दे दिए थे और उन्होंने ये सब नियमों को ताक पर रख कर किया. हालांकि नियमों के इन उल्लंघनों का खुलासा होने के बाद नेपाल को अपने कुछ फैसले वापस लेने पड़े थे. इस रिपोर्ट में नेपाल सरकार द्वारा भ्रष्टाचार के कई और मामलों का जिक्र करते हुए कहा गया है कि पिछले कुछ वर्षों में नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की संपत्ति में काफी इजाफा हुआ है और स्विटजरलैंड के एक बैंक की जेनेवा ब्रांच में केपी शर्मा ओली और उनकी पत्नी राधिका शाक्य के नाम पर करीब 41 करोड़ रुपये जमा हैं. शेयर और लॉन्ग टर्म बॉन्ड्स के रूप में जमा इस रकम के जरिए केपी शर्मा ओली और उनकी पत्नी को हर साल 2 से तीन करोड़ रुपये का रिटर्न हासिल होता है.

लेकिन यहां हम एक बात साफ कर देना चाहते हैं कि हम इस रिपोर्ट में किए गए दावों की पुष्टि नहीं कर सकते. लेकिन जब हमने इस रिपोर्ट के अलावा दूसरी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स का भी विश्लेषण किया तो एक बात साफ हो गई कि चीन आर्थिक रूप से कमजोर ऐसे देशों का फायदा उठाता है जहां सत्ता में बैठे लोग भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं और इन्हीं के जरिए चीन धीरे-धीरे उस देश की अर्थव्यवस्था पर पूरी तरह से कब्जा कर लेता है.

सारी लक्ष्मण रेखाएं पार कर रहा नेपाल
अब लौटकर एक बार फिर से रामायण पर आते हैं. रामायण का एक मशहूर प्रकरण है जिसके मुताबिक रावण का साथी मारीच एक सुंदर हिरण का रूप धारण कर लेता है और सीता उसका रूप देकर मंत्र मुग्ध हो जाती हैं. सीता के कहने पर श्री राम उस हिरण को पकड़ने चले जाते हैं, इसके बाद लक्ष्मण राम की खोज में निकल जाते हैं और रावण भेष बदलर सीता को लक्ष्मण रेखा पार करने पर मजबूर कर देता है. इसके बाद रावण सीता का अपहरण कर लेता है और यही घटना राम और रावण के बीच युद्ध की वजह बनती है. कुछ इसी तरह नेपाल भी चीन के लालच में फंस गया है और वो भारत के साथ रिश्तों की सारी लक्ष्मण रेखाएं पार करने लगा है.

कैसे नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली भारत और नेपाल के बीच मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा लांघ रहे हैं और दो देशों के लोगों के बीच संबंधों को खराब कर रहे हैं इसे इस उदाहरण से समझ सकते हैं. केपी शर्मा ओली का वो बयान जिसमें वो ना सिर्फ ये कह रहे हैं कि असली अयोध्या नेपाल के बीरगंज में थोरी गांव में हैं बल्कि वो ये भी कह रहे हैं कि भगवान राम खुद नेपाली थे.

ये बात सही है कि रामायाण और राम के जीवन के तार नेपाल से भी जुड़े हैं. क्योंकि सीता का जन्म जिस जनकपुर में हुआ था वो आज नेपाल में है. लेकिन केपी शर्मा ओली को ये नहीं भूलना चाहिए कि हजारों वर्ष पहले भारत की संस्कृति का प्रभाव दुनिया के कई देशों तक फैला था और नेपाल भी उन्हीं में से एक है. हालांकि अच्छी बात ये है कि एक वामपंथी होने के बावजूद ओली ने भगवान राम के अस्तित्व को मान लिया है क्योंकि अक्सर वामपंथी ईश्वर को मानने से इनकार कर देते हैं.

भगवान राम किसी देश की सीमा से नहीं बंधे
लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि असली अयोध्या नेपाल में है. हालांकि भगवान राम किसी देश की सीमा, संस्कृति या उसके इतिहास के दायरों में नहीं बंधे हैं. और नेपाल ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों पर रामायण और भगवान राम के जीवन का गहरा प्रभाव पड़ा है. इसलिए दुनिया का कोई भी व्यक्ति चाहे तो वो श्री राम को अपना मान सकता है और उनके जीवन से बहुत कुछ सीख सकता है. लेकिन चीन के इशारे पर भारत के साथ कूटनीतिक महाभारत छेड़ने वाले केपी शर्मा ओली को आज रामायण से जुड़े कुछ तथ्य जान लेने चाहिए.

राम के जीवन पर लिखे गए महा काव्य का नाम रामायण है और पूरी दुनिया में रामायण के 300 से ज्यादा संस्करण उपलब्ध हैं.

महर्षि वाल्मिकी द्वारा लिखी गई रामायण इनमें सबसे प्राचीन है. जो भारत में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है. लेकिन इसके अलावा म्यांमार, इंडोनेशिया, कंबोडिया, लाओस, फिलीपींस, श्रीलंका, थाईलैंड, मलेशिया, जापान, मंगोलिया, वियतनाम और यहां तक चीन में भी रामायण की व्याख्या अलग-अलग तरीके से की जाती है. इसके अलावा बौद्ध और जैन धर्म में भी अपने अपने तरीके से रामायण की व्याख्या की गई है.

थाईलैंड में रामायण को रामाकिन कहा जाता है. थाईलैंड की रामायण में हनुमान के चरित्र को ज्यादा महत्व दिया गया है. रामायण को थाईलैंड में राष्ट्रीय महाकाव्य का दर्जा प्राप्त है. इतना ही नहीं थाइलैंड की संस्कृति हिंदू और बौद्ध संस्कृति का मिश्रण मानी जाती है और थाईलैंड में इंद्र और कुबेर की पूजा की जाती है और वहां इन दोनों को समर्पित कई मंदिर भी हैं.

इसी तरह दक्षिण पूर्वी एशिया में एक और देश है जिसका नाम है लाओस. लाओस में भी रामायण का एक जातक संस्करण प्रसिद्ध है. बौद्ध धर्म में जातक कथाएं वो कथाएं होती है जिनमें भगवान बुद्ध के पिछले जन्मों के बारे में बताया जाता है. लाओस में भी रामायण को राष्ट्रीय महाकाव्य माना जाता है.

मलेशिया की मलेय भाषा में रामायण हिकायत सेरी रामा के नाम से प्रसिद्ध है. इस रामायण में लक्ष्मण के किरदार को केंद्रीय किरदार के तौर पर दिखाया गया है.

म्यांमार में भी रामायण को अघोषित रूप से महाकाव्य का दर्जा प्राप्त है. म्यांमार की रामायण मूल से भारत की रामायण की तरह ही है. लेकिन स्थानीय संस्कृति के मुताबिक इसके चरित्र बदल दिए जाते हैं.

कंबोडिया में रामायण को रामाकीर्ति के नाम से जाना जाता है. अंग्रेजी में ग्लोरी ऑफ रामा कहा जाता है. इस रामायण में हिंदू धर्म के विचारों को बौद्ध धर्म के सिद्धांतों के साथ जोड़कर दिखाया गया है.

भारतीय संस्कृति की जड़ें इंडोनेशिया तक फैली हैं और जनसंख्या के हिसाब से दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश इंडोनेशिया में तो हर साल बड़े पैमाने पर रामायण का मंचन होता है. इंडोनेशिया में इसे काकाविन रामायण कहा जाता है. जावा भाषा में काकाविन का अर्थ काव्य होता है.

दुनिया भर में पढ़ी जाती है रामायण
दुनिया के जिन देशों में रामायण पढ़ी जाती है या उसका मंचन होता है उन देशों की लिस्ट बहुत लंबी है. कहते हैं कि राम लोगों के रोम-रोम में बसते हैं. लेकिन सच ये है कि राम और उनके जीवन से जुड़े चिन्ह भारत से लेकर इटली के रोम तक फैले हैं. इटली में खुदाई के दौरान कई ऐसी प्राचीन पेंटिग्स मिलीं, जिनमें राम के जीवन का चित्रण किया गया था. रूस और मंगोलिया में रामायण बहुत लोकप्रिय है और नेपाल को भारत के खिलाफ भड़काने वाले चीन के प्राचीन धार्मिक दस्तावेजों में रामायण का जिक्र मिलता है. चीन में एक लोक कथा बहुत लोकप्रिय है जिसका नाम है सुन वुकोंग. कहा जाता है कि ये कथा हनुमान के जीवन पर ही आधारित है.

कहा जाता है कि महर्षि वाल्मिकी ने रामायण की रचना भगवान राम के जीवन काल में यानी 7 हजार वर्ष पूर्व की थी और इसमें अयोध्या को लेकर वर्णन किया गया है कि ये सरयू नदी के किनारे बसी है और इसके दक्षिण में गंगा नदी है. जाहिर है ये दोनों नदियां भारत में हैं और इनका नेपाल से कोई कनेक्शन नहीं है. इसलिए नेपाल के प्रधानमंत्री के तमाम दावे हास्यास्पद हैं. कई लोग तो सोशल मीडिया पर ओली की आलोचना करते हुए ये भी लिख रहे हैं कि वो अगर चाहें तो सौरमंडल के सारे ग्रहों का नाम भी नेपाल रख सकते हैं. 

कहा जाता है कि लंका पहुंचने से पहले श्री राम भारत के 16 स्थानों से होकर गुजरे थे और ये सभी स्थान भारत में हैं. इसलिए नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को अपने दावे पर फिर से विचार करना चाहिए. 

राम-जानकी मार्ग
इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 2018 में नेपाल के जनकपुर से भारत के अयोध्या तक चलने वाली एक बस सेवा का उद्घाटन भी किया था. इस उद्घाटन के समय केपी शर्मा ओली भी मौजूद थे. उन्होंने भी बस सेवा को हरी झंडी दिखाई थी. इस रूट को रामायण काल से ही राम-जानकी मार्ग कहा जाता है. इस विषय पर शोध करते हुए हमें आज एक लेख मिला. जिसमें रामायण काल का एक नक्शा दिया गया है. जिसमें वो जगहें दिखाई गई हैं, जहां से होकर श्रीराम, लक्ष्मण और महर्षि विश्वमित्र जनकपुर पहुंचे थे.

विश्वमित्र सहित कई ऋषि-मुनियों के यज्ञ को राक्षस भंग कर देते थे. इसलिए विश्वमित्र राम और लक्ष्मण को अपने साथ ले गए. ताकि राक्षसों का संहार किया जा सके और इसी उद्धेश्य को पूरा करने के लिए भगवान राम ने जनकपुर तक की ये यात्रा की थी. नक्शे पर दिख रहे रास्तों से होते हुए श्री राम फुलहर नामक गांव पहुंचे. जहां सीता के पिता राजा जनक का एक उपवन था. इसी उपवन में सीता जी खेलने के लिए आती थीं. सीता ने पहली बार श्रीराम को इसी उपवन में देखा था.

जनकपुर, राजा जनक के राज्य की राजधानी थी. वहां रंगभूमि में धनुष यज्ञ यानी सीता स्वयंवर हुआ था और यहीं पर भगवान राम ने शिव धनुष को तोड़कर ये स्वयंवर जीता था और फिर भगवान राम का सीता जी के साथ विवाह हुआ था.

यानी आज के आधुनिक मार्ग और पौराणिक राम-जानकी मार्ग के बीच में भले ही कुछ असमानताएं हों लेकिन ये रूट साबित करता है कि श्री राम भारत से जनकपुर पहुंचे थे. इसलिए अयोध्या के नेपाल में होने का सवाल ही नहीं उठता.

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने दी सफाई
नेपाल के प्रधानमंत्री के दावे पर मंगलवार को नेपाल के विदेश मंत्रालय की सफाई आई. जिसमें कहा गया कि उनके बयान का मकसद अयोध्या के महत्व को कम करना और लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था बल्कि नेपाल के प्रधानमंत्री चाहते हैं कि इसे लेकर और शोध किए जाएं. इसी बयान में 2018 में जनकपुर और अयोध्या के बीच शुरू हुई उस बस सेवा का भी जिक्र है. 

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को ये भी समझना चाहिए कि नेपाल और भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्ते बहुत पुराने हैं और उनके इस तरह के बयान इन रिश्तों के लिए खतरा हैं. भारत में भगवान शिव को मानने वालों के लिए नेपाल का पशुपति नाथ मंदिर बहुत महत्वपूर्ण है और 2014 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले जिन देशों की यात्रा की थी उनमें नेपाल भी था. प्रधानमंत्री मोदी ने खुद पशुपति नाथ मंदिर के दर्शन किए थे.

रामायण जिस दौर में लिखी गई थी उस समय भारत की संस्कृति कई देशों तक फैली थी और तब इसे भारत वर्ष कहा जाता था. उस समय भारत के कई पड़ोसी देश भारत की हिंदू संस्कृति से प्रभावित थे और भारत का असर इन देशों तक फैला था.

भारत के खिलाफ काम कर रहे ओली
हैरानी की बात ये है कि आज केपी शर्मा ओली भारत के खिलाफ काम कर रहे हैं. लेकिन 25 वर्ष पूर्व ओली को भारत और नेपाल के संबंधों को मजबूत करने वाले नेता माना जाता था.

वर्ष 1996 में भारत और नेपाल के बीच महाकाली नदी के जल बंटवारे को लेकर समझौता हो रहा था और इस समझौते में विवाद होने पर ओली ने भारत का पक्ष लिया था. तब ओली अपनी ही राजनीतिक पार्टी से अलग हो गए थे. यानी भारत से मित्रता निभाने के लिए उन्होंने अपना राजनीतिक करियर तक दांव पर लगा दिया था. कहा जाता है कि जब ओली नेपाल के गृह मंत्री थे तो भारत से फरार होकर नेपाल में शरण लेने वाले अपराधियों के मामलों में वो भारतीय अधिकारियों का सहयोग करते थे. इसलिए उनका नाम भारत और नेपाल के संबंधों को मजबूत करने वाले नेताओं में था. लेकिन आज स्थितियां बदल गई हैं और कभी भारत का साथ देने वाले ओली आज भारत के खिलाफ हो गए हैं.   

नेपाल में महायोगी गोरखनाथ को मानने वालों की भी बड़ी संख्या है और कहा जाता है कि नेपाल के गोरखा अपनी पहचान गोरखनाथ से ही जोड़ते हैं. गोरखपुर में स्थित गोरखनाथ मठ भी इन्हीं महायोगी को समर्पित है और उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मठ के महंत हैं.

नेपाल के करीब 40 हजार नागरिक भारतीय सेना में 
इतना ही नहीं नेपाल के करीब 40 हजार नागरिक भारत की सेना की सात गोरखा रेजिमेंट्स में तैनात हैं और इन्हें रिटायरमेंट से जुड़े वो सारे फायदे मिलते हैं जो भारतीय सैनिकों को हासिल हैं. भारत द्वारा करीब 80 हजार नेपालियों को पेंशन दी जाती है और भारत की तरफ से नेपाल की करीब 11 हजार महिलाओं को विधवा पेंशन दी जाती है. इतना ही नहीं भारत हर साल नेपाल के नागरिकों को मिलने वाली पेंशन पर 90 हजार करोड़ रुपये खर्च करता है.

भारत और नेपाल की सीमा 1800 किलोमीटर से ज्यादा है. और इस सीमा पर भारत और नेपाल के बीच करीब 20 ट्रेड प्वाइंट्स हैं. नेपाल अपना 64 प्रतिशत व्यापार भारत के साथ करता है और भारत नेपाल का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. नेपाल भारत से जो चीजें मंगाता है उनमें पेट्रोलियम से लेकर स्टील, सीमेंट, मशीनरी और दवाइयां तक शामिल हैं.

नेपाल का 60 प्रतिशत आयात और निर्यात भारत के बंदरगाहों के जरिए होता है. नेपाल के करीब 80 लाख नागरिक भारत में काम करते हैं. और नेपाल के लोगों को भारत में काम करने के लिए किसी तरह के वर्क परमिट की जरूरत नहीं होती.

विदेश में बसे नेपाली अपने देश में जो पैसा भेजते हैं उसका 15 प्रतिशत हिस्सा भारत से जाता है. इसीलिए नेपाल की 4 से 5 प्रतिशत GDP भारत पर आधारित है. नेपाल के 12 हजार से ज्यादा छात्र भारत की अलग-अलग यूनिवर्सिटीज में पढ़ते हैं.

क्या चीन के लिए भारत से रिश्ते तोड़ेगा नेपाल?
अब सवाल ये है कि क्या नेपाल भारत पर अपनी निर्भरता समाप्त करके चीन की मदद लेने में सक्षम है. इसका जवाह है नहीं. क्योंकि नेपाल अपना 14 प्रतिशत व्यापार चीन के साथ करता है और ये भारत की तुलना में करीब 9 गुना कम है.

चीन का जो बंदरगाह नेपाल के सबसे नजदीक है उसकी दूरी भारत के हल्दिया बंदरगाह के मुकाबले तीन गुना ज्यादा है.

नेपाल के छात्र भी चीन में जाकर पढ़ाई नहीं कर सकते, क्योंकि वहां ज्यादातर यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई मैंडरिन भाषा में होती है.

और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि चीन नेपाल के लोगों को अपनी सेना में भर्ती कर लेगा इसलिए पेंशन की बात करना ही व्यर्थ है.

अगर आप नेपाल का नक्शा ध्यान से देखेंगे तो आप समझ जाएंगे कि नेपाल एक लैंड लॉक्ड देश है जो तीन तरफ से भारत से घिरा है. इसलिए केपी शर्मा ओली को भारत के साथ रिश्ते नहीं बिगाड़ने चाहिए. क्योंकि भारत और नेपाल के बीच रोटी और बेटी का रिश्ता है और सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से भी भारत और नेपाल एक दूसरे के बहुत करीबी रहे हैं. इसलिए केपी शर्मा ओली को दोनों देशों के लोगों के बीच दीवार नहीं बनना चाहिए.

रामायण से हमें ये सीख मिलती है कि अहंकार और लालच में डूबा व्यक्ति कभी ये नहीं समझ पाता कि उसका मित्र कौन है और शत्रु कौन है. उदाहरण के लिए रावण को लगता था कि उसकी पत्नी मंदोदरी सीता से ईर्ष्या करती है जबकि वो भगवान राम से ईर्ष्या करती थी. इसी तरह रावण को लगता था कि विभीषण उसके प्रति वफादार नहीं है लेकिन विभीषण की असली नाराजगी रावण से नहीं बल्कि कुबेर से थी. कथाओं के अनुसार कुबेर रावण के सौतेले भाई थे. विभीषण की तरह कुबेर भी लंका के दावेदार थे और सत्ता की इसी लड़ाई ने पहले विभीषण को कुबेर का शत्रु बनाया और फिर वो श्री राम के साथ मिल गए और रावण की मृत्यु के बाद लंका के राजा बना दिए गए. विभीषण ने भगवान राम को रावण की सेना के सारे राज बता दिए थे और इससे श्री राम की जीत सुनिश्चित हो गई. इसीलिए आज भी एक कहावत बहुत मशहूर है जिसमें कहा जाता है घर का भेदी लंका ढाए. इसलिए केपी शर्मा ओली को समझना चाहिए कि चीन उन्हें जो दिखा रहा है वो सच नहीं बल्कि एक भ्रम है और भ्रम का शिकार होकर वो भारत और नेपाल के रिश्तों का नुकसान कर रहे हैं.