DNA ANALYSIS: लोकतंत्र को कुचलने वाली इमरजेंसी का विश्लेषण

आपातकाल के कलंक पर आज समय की धूल पड़ चुकी है. लोग ये भूल चुके हैं कि कैसे उनके ही द्वारा चुनी गई प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनके मौलिक अधिकारों को कुचल कर रख दिया था.

DNA ANALYSIS: लोकतंत्र को कुचलने वाली इमरजेंसी का विश्लेषण

नई दिल्ली: आजकल आप अक्सर ये सुनते होंगे कि लोकतंत्र खतरे में हैं, और लोकतंत्र की हत्या हो गई है. अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर लोकतंत्र की हत्या का एजेंडा चलाने वालों के लिए आज बहुत कुछ सीखने का दिन है.

45 वर्ष पहले 25 जून की आधी रात को पूरे देश में आपातकाल लगा दिया गया था. उस दौर में जिन लोगों ने अपनी आंखों से आपातकाल को देखा था, उनमें से बहुत सारे लोग शायद अब जिंदा नहीं होंगे. भारत के जिन नागरिकों का जन्म आपातकाल के दौरान हुआ. उनकी उम्र भी अब 45 वर्ष के करीब होगी. भारत की 70 साल की राजनीति के इतिहास में ये एक बहुत लंबा वक्त है. आपातकाल के कलंक पर आज समय की धूल पड़ चुकी है. लोग ये भूल चुके हैं कि कैसे उनके ही द्वारा चुनी गई प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनके मौलिक अधिकारों को कुचल कर रख दिया था.

डॉक्टर भीम राव अंबेडकर के संविधान की कीमत उस वक्त एक साधारण किताब जैसी हो गई थी. गांधीवाद की माला जपने वाली कांग्रेस पार्टी ने महात्मा गांधी के आदर्शों और उसूलों की हत्या कर दी थी. देश एक ऐसे अंधेरे में डूब गया था, जहां सरकार के विरोध का मतलब था कारावास. ये वो दौर था जब अपने अधिकारों को मांगने के लिए भी जनता के पास कोई रास्ता नहीं बचा था. क्योंकि अखबारों में वही छपता था, जो सरकार चाहती थी. रेडियो में वही समाचार सुनाई देते थे, जो सरकार के आदेशों पर लिखे जाते थे.

उस दौर में कहा जाता था कि इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा (Indira is India, India is Indira). तब पूरा भारत आयरन लेडी (Iron Lady) इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की जंजीरों में सिसक रहा था. बॉलीवुड के कई बड़े-बड़े अभिनेता और गायक, इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी के दरबारी बन गए थे और फिल्मों की स्क्रिप्ट और कहानी सरकार के प्रतिनिधि फाइनल करते थे. और अगर न्यायपालिका की बात करें तो इंदिरा गांधी कहती थीं कि उन्हें Committed Judiciary चाहिए, यानी ऐसी न्यायपालिका जो उनकी सेवा करती रहे.

आज युवा पीढ़ी के बहुत से ऐसे लोग होंगे जो आपातकाल की इस तस्वीर को देखकर बहुत डर गए होंगे. बहुत से लोग कंफ्यूज भी हो रहे होंगे क्योंकि आजकल हमारे देश में बुद्धिजीवी वर्ग लगातार ये प्रोपगेंडा चला रहा है कि अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है.

नए जमाने के क्रांतिकारियों को अक्सर आपने ये कहते हुए भी सुना होगा कि लोकतंत्र खतरे में है. बीते कुछ वर्षों में आजादी, बुद्धिजीवी वर्ग का एक बहुत बड़ा नारा बन गई है. कई बार आपने बुद्धिजीवियों को ये कहते सुना होगा कि देश बहुत बुरे दौर से गुजर रहा है और कुछ भी बोल पाना बहुत मुश्किल है. कुछ लोग तो आज के समय की तुलना आपातकाल से भी करते हैं.

ऐसे में आज की स्थितियों का सही आंकलन करने के लिए ये बहुत जरूरी है कि हम एक बार फिर ये समझने की कोशिश करें कि आज से 45 वर्ष पहले देश में क्या हुआ था? आज हमने आपके लिए आपातकाल का एक DNA टेस्ट तैयार किया है जिसके बाद आप अभिव्यक्ति की आजादी की कीमत को समझ पाएंगे. आपको ये समझ में आएगा कि लोकतंत्र में मौलिक अधिकारों का महत्व कितना बड़ा होता है?

लोकतंत्र में आजादी की कीमत क्या होती है. इसका जिक्र गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट में किया. आपातकाल को याद करते हुए प्रधानमंत्री ने उन लोगें को नमन किया जिन्होंने लोकतंत्र को बचाने के लिए संघर्ष किया था.

इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं. लेकिन कहा जाता है कि असली ताकत संजय गांधी के पास थी. PMO की बजाय प्रधानमंत्री के घर से देश चलाया जाने लगा. आपातकाल के इस फैसले का दोष इन्हीं दोनों को दिया जाता है. लेकिन आज हम आपको बताएंगे कि कैसे राष्ट्रपति से लेकर इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल, संसद और न्यायालय ने इस पर कोई सवाल नहीं उठाया. संवैधानिक संस्थाओं के रूप में ये सब अपने कर्तव्य का पालन करने में ये कैसे चूक गए.

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25 जून की रात 11 बजकर 45 मिनट पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने इमरजेंसी के अध्यादेश पर दस्तखत किए. राष्ट्रपति के सचिव ने उनसे कहा- कैबिनेट से पास हुए बिना अध्यादेश पर हस्ताक्षर नहीं करने चाहिए. राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अगर चाहते तो वाकई वो इंदिरा गांधी को लौटा सकते थे. लेकिन उन्होंने इंदिरा गांधी के पीछे चलना पसंद किया. फखरुद्दीन अली अहमद की इस मजबूरी को उनके एक बयान से समझा जा सकता है. आपातकाल के दौरान एक बार कुछ लोग संजय गांधी की शिकायत लेकर राष्ट्रपति के पास पहुंचे. फखरुद्दीन अली अहमद ने उनसे कहा- ये लड़का कांग्रेस का बंटाधार कर देगा. लेकिन मेरी मजबूरी को आप लोग समझ सकते हैं. मेरे हाथ में कुछ नहीं है. आप 1 सफदरजंग रोड जाएं. 1 सफदरजंग रोड उन दिनों प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास हुआ करता था.

आपातकाल के फैसले पर इंदिरा गांधी की कैबिनेट को राष्ट्रपति के दस्तखत होने तक कुछ मालूम ही नहीं था. सूचना और प्रसारण मंत्री इंदर कुमार गुजराल को कैबिनेट सचिव ने आधी रात को फोन कर सुबह 6 बजे कैबिनेट की बैठक में आने के लिए कहा. गुजराल ने सोचा कि शायद इंदिरा गांधी ने इस्तीफा देने का मन बना लिया. गुजराल समय पर पहुंचे तो वहां वरिष्ठ मंत्री- K C पंत और स्वर्ण सिंह, यशवंत राव चव्हाण मौजूद थे. मीटिंग में इंदिरा गांधी ने कहा- जेंटलमेन, इमरजेंसी का ऐलान कर दिया गया. जेपी, मोरारजी भाई और दूसरे नेता गिरफ्तार कर लिए गए हैं. सभी अवाक रह गए. सिर झुकाकर सभी मंत्रियों ने अध्यादेश पर कैबिनेट की बाकी औपचारिकता पूरी की. केवल स्वर्ण सिंह ने सवाल किया- ये गिरफ्तारियां किस कानून के तहत हुई हैं.

विपक्ष की आवाज को दबाने के बाद इंदिरा गांधी ने संसद के दोनों सदनों में प्रश्नकाल पर भी रोक लगा दी. आपको बता दें कि संसद के दोनों सदन यानी लोकसभा और राज्यसभा में कार्यवाही के पहला घंटे में संसद सदस्य कोई भी प्रश्न पूछ सकते हैं. इसे प्रश्नकाल बोलते हैं. लेकिन इंदिरा गांधी को उस दौर में प्रश्न पूछना भी बर्दाश्त नहीं था. इंदिरा गांधी के इस फैसले पर तब के लोकसभा अध्यक्ष जीएस ढिल्लों आंखें बंद किए रहे. इसके बाद इंदिरा गांधी ने संविधान में अपने हिसाब से संशोधन करने शुरू किए. इंदिरा गांधी के आपातकाल के फैसले के खिलाफ कई लोगों ने कोर्ट में अपील की. तो 22 जुलाई 1975 को इंदिरा गांधी ने संविधान में संशोधन कर न्यायपालिका यानी कोर्ट से आपातकाल के फैसले पर सुनवाई का अधिकार ही छीन लिया. इसे 38वां संशोधन कहा जाता है. इसके बाद 39वां संविधान संशोधन कर कोर्ट से प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त व्यक्ति के चुनाव की जांच करने का अधिकार ही छीन लिया गया. यानी इंदिरा गांधी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट अब चुनाव में धांधली के मामले की सुनवाई कर ही नहीं सकता था.

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इमरजेंसी में अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंट दिया गया था. सरकार अपने खिलाफ कोई भी आवाज नहीं सुनना चाहती थी. अब हम आपको बताते हैं कि किस तरह इमरजेंसी के रोड-रोलर से प्रेस की आजादी को कुचला गया. 25 जून 1975 की आधी रात को इमरजेंसी लगाई गई और अखबारों के दफ्तरों में उसी रात को पावर सप्लाई जानबूझकर काट दी गई ताकि ज्यादातर अखबार अगले दिन आपातकाल का समाचार ना छाप सकें. अखबारों के दफ्तरों को दो दिन बाद पावर सप्लाई की गई. 

संजय गांधी ने इमरजेंसी के दो दिन बाद ही सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल को हटाकर अपने करीबी विद्याचरण शुक्ल को मंत्री बना दिया और विद्याचरण शुक्ल के जरिए सरकार ने मीडिया पर मनमानी की.

उस वक्त प्रेस की सर्वोच्च संस्था प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया एक तरह से सिस्टम का हिस्सा बनकर रह गई थी. इस संस्था ने इमरजेंसी का विरोध तक नहीं किया. यहां तक कि इमरजेंसी के विरोध में आने वाले प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया.

कड़ी सेंसरशिप की वजह से कई अखबारों का प्रकाशन बंद हो गया. पत्रकारों के लिए सरकार ने कोड ऑफ कंडक्ट बना दिया. अखबारों के बोर्ड में सरकारी अफसर बैठा दिए गए. जो हर खबर पर नजर रखते थे.

अखबारों के दफ्तरों में खबरों को सेंसर करने वाले लोग हर खबर, कार्टून और तस्वीर को देखते थे और ये सुनिश्चित करते थे कि कोई भी खबर सरकार की नीतियों का विरोध करने वाली ना हो.

देश की चार बड़ी न्यूज एजेंसियों - PTI, UNI, हिंदुस्तान समाचार और समाचार भारती का विलय करके सरकार ने एक समाचार एजेंसी बना दी थी. ताकि खबर का हर स्रोत पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में रहे. The Hindu के संपादक G कस्तूरी को इसका प्रमुख बनाया गया. खुशवंत सिंह ने आपातकाल का समर्थन किया था. जब उन पर सवाल उठे तो उन्होंने एक किताब लिखकर स्पष्टीकरण भी दिया, जिसका शीर्षक था... Why I Supported Emergency?
हिंदुस्तान टाइम्स के प्रसिद्ध संपादक B G वर्गीज को मालिक k k बिड़ला ने इंदिरा गांधी को खुश करने के लिए बर्खास्त कर दिया था. उस वक्त द टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक शाम लाल थे. और गिरीलाल जैन दिल्ली के रेजिडेंट एडिटर थे. ये दोनों ही पत्रकार इंदिरा गांधी के समर्थक थे. लेकिन प्रेस पर सेंसरशिप लगाने के फैसले के विरोधी थे. लेकिन वो अखबार के प्रबंधन के सामने मजबूर थे. खुशवंत सिंह ने अंग्रेजी की एक प्रसिद्ध पत्रिका में लिखा था कि द टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक शाम लाल, आपातकाल का समर्थन करने वाले पत्रकारों के नेता थे. शाम लाल के बाद अखबार के नंबर दो संपादक गिरीलाल जैन थे. वो आपातकाल के दौरान देश के नए नेता के तौर पर संजय गांधी की ब्रांडिंग कर रहे थे.

इसके अलावा नवभारत टाइम्स, महाराष्ट्र टाइम्स और धर्मयुग के संपादकों ने भी आपातकाल का विरोध करने वालों से दूरी बना ली थी.

इमरजेंसी के दौरान 3801 अखबारों को जब्त किया गया. 327 पत्रकारों को मीसा कानून के तहत जेल में बंद कर दिया गया. 290 अखबारों में सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए. ब्रिटेन के द टाइम्स और Guardian जैसे अखबारों के 7 संवाददाताओं को भारत से निकाल दिया गया था.

Reuters सहित कई विदेशी न्यूज एजेंसियों के टेलीफोन और दूसरी सुविधाएं खत्म कर दी गईं. 51 विदेशी पत्रकारों की मान्यता छीन ली गई. 29 विदेशी पत्रकारों को भारत में एंट्री देने से मना कर दिया गया. 

उस दौर में संपादकों के एक समूह ने सरकार के सामने घुटने टेक दिए थे. दिल्ली के 47 संपादकों ने 9 जुलाई 1975 को इंदिरा गांधी द्वारा उठाए गए सभी कदमों के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की. यहां तक कि इन संपादकों ने अखबारों पर लगाई गई सेंसरशिप को भी सही ठहरा दिया था.

ऐसे संपादकों के बारे में बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी का वो कथन बहुत मशहूर है, जब उन्होंने कहा था कि-जब उन्हें झुकने के लिए कहा गया था, तो वो रेंगने लगे थे.

हालांकि कुछ अखबार ऐसे थे जिन्होंने इमरजेंसी का खुलकर विरोध किया. उस समय एक राष्ट्रीय अखबार ने इमरजेंसी के विरोध में संपादकीय पन्ने पर खाली जगह छोड़ दी थी और अपना विरोध प्रकट किया था.

ये भी बड़ी हैरानी की बात है कि आज हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के लिए इमरजेंसी वाली कहानी एक सुपरहिट स्क्रिप्ट नहीं है. यानी इमरजेंसी का अनुभव फिल्म इंडस्ट्री के लिए इतना कड़वा रहा कि तमाम फिल्मकार इस विषय को फिल्मों में उठाने से बचते रहे. अभिव्यक्ति की आजादी को जिस तरह इमरजेंसी के दौरान कुचला गया. वैसा आजाद भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ था. लेकिन तब भी फिल्मी दुनिया का एक बहुत बड़ा तबका ऐसा था जो इंदिरा गांधी की अवहेलना नहीं करना चाहता था. 

1975 में आपातकाल के इस काले अध्याय की नींव इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी ने मिलकर रखी थी. ये परिवारवाद का दौर था. तब भी मां-बेटे ही मिलकर सरकार चला रहे थे. और आज भी मां-बेटे मिलकर ही देश की सबसे पुरानी पार्टी यानी कांग्रेस चला रहे हैं.
आपातकाल के दौर में देश में लोकतंत्र की हत्या हुई थी और आज कांग्रेस में भी यही हालत है. कोरोना संक्रमण और चीन के साथ तनाव के बीच जब देश मुश्किल दौर से गुजर रहा है. तब सोनिया गांधी और राहुल गांधी सरकार का साथ देने की बजाय सवाल खड़े कर रहे हैं.