DNA Analysis: युद्ध की मंशा और संयम की बातें, आखिर क्या हैं चीन के इरादे?

  दोनों देशों के बीच सैन्य स्तर की बातचीत के बाद ये तय हुआ था कि इन स्थानों पर दोनों देशों के सैनिक disengage होंगे, जिसका मतलब है कि आमने-सामने की स्थिति से दोनों पक्ष पीछे हटेंगे.   

DNA Analysis: युद्ध की मंशा और संयम की बातें, आखिर क्या हैं चीन के इरादे?

नई दिल्ली: गलवान घाटी में इस वक्त तीन स्थानों पर भारत और चीन के सैनिक आमने-सामने हैं. ये तीन स्थान, भारतीय सेना के पेट्रोलिंग प्वाइंट्स 14, 15 और 17 हैं. ये स्थान भारतीय सीमा के अंदर हैं और LAC से बहुत करीब हैं. दोनों देशों के बीच सैन्य स्तर की बातचीत के बाद ये तय हुआ था कि इन स्थानों पर दोनों देशों के सैनिक disengage होंगे, जिसका मतलब है कि आमने-सामने की स्थिति से दोनों पक्ष पीछे हटेंगे. लेकिन कहां बात disengage होने की हो रही थी, कहां अब हिंसक टकराव हो गया. 

दरअसल, गलवान घाटी एक ऐसा इलाका है, जहां बहुत तीखी चोटियों और सीधी ढलान वाले पहाड़ हैं. यानी यहां पर संतुलन बनाना बहुत कठिन होता है. अब सोचिए अगर इन पहाड़ियों पर झड़प हो जाए तो फिर क्या होगा, सीधे आप खाईं में या फिर नदी में गिर जाएंगे. भारतीय सेना के लिए ये बहुत ही महत्वपूर्ण इलाका है. इसलिए पहले दिन से भारत की पहली शर्त यही है कि चीन के सैनिकों को यहां से वापस जाना होगा. क्योंकि गलवान इलाके में चीन के सैनिक यहां की पहाड़ियों से भारतीय सेना की गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं. इन पहाड़ियों के सामने ही भारतीय सुरक्षा बलों के अलग-अलग जगह पर कैंप हैं, यहां से ही भारत की रणनीतिक तौर पर सबसे महत्वपूर्ण सड़क गुजरती है, जिसके निर्माण का कार्य पिछले वर्ष ही पूरा हो गया था. ये सड़क लेह से दौलत बेग ओल्डी को जोड़ती है. जहां इस इलाके में भारतीय सेना का आखिरी सैन्य ठिकाना है.

चीन ने सिर्फ एक जगह पर नहीं, बल्कि एक साथ कई जगहों पर विवाद को बढ़ाया. ये चीन की रणनीति थी कि भारत को कई जगहों पर उलझा दिया जाए. गलवान घाटी के अलावा हॉट स्प्रिंग्स इलाका, पेंगांग झील में फिंगर 4 से फिंगर 8 तक का इलाका, इन सब जगहों पर चीन पिछले डेढ़ महीने से आक्रामक रवैया दिखा रहा है. चीन के सैनिक पेंगांग झील के फिंगर 4 तक आ गए. भारत का दावा फिंगर 8 तक है, जहां भारतीय सैनिक गश्त के लिए जाते थे. इस वक्त भारत और चीन के सैनिक फिंगर 4 के पास आमने सामने हैं.

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वैसे तो भारत और चीन के बीच LAC पर झड़प होती रही है. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि चीन ने एक साथ इतनी जगहों पर घुसपैठ की और फिर बड़ी संख्या में अपने सैनिक तैनात कर दिए और सैन्य साजोसामान लेकर आ गया. भारत और चीन के बीच सीमा पर झड़प इसलिए होती है, क्योंकि सीमा पर दोनों देशों की अपनी-अपनी मान्यता है.

भारत और चीन के बीच करीब साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी LAC है. इसे तीन सेक्टर में बांटा गया है. इसके ईस्टर्न सेक्टर यानी पूर्वी क्षेत्र में अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम है. मिडल सेक्टर में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश है और वेस्टर्न सेक्टर यानी पश्चिमी क्षेत्र में लद्दाख का इलाका है. इसमें अक्सर सीमा विवाद खासतौर पर लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में होते रहे हैं. लेकिन इस बार चीन ने सिक्किम के नाकू ला इलाके में भी टकराव की स्थितियां बना दी हैं. अरुणाचल प्रदेश पर तो वो पहले से दावा करता रहा है कि ये तिब्बत का हिस्सा है.

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गलवान घाटी में जिस तरह का हिंसक टकराव हुआ है. ऐसा 1962 के युद्ध के बाद पहली बार हुआ है. 1962 का युद्ध भी गलवान घाटी से ही शुरू हुआ था. लेकिन आज ऐसी स्थिति इसलिए बन गई, क्योंकि गलवान घाटी में दबदबे के लिए चीन फिर आक्रामक है. चीन के उग्र रवैये ने तब सीमा पार कर दी, जब पिछले महीने चीन के सैनिक LAC से आगे बढ़कर गलवान घाटी तक आ गए और उन्होंने आसपास की पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया. चीन ने ऐसा क्यों किया, इसे समझना बहुत जरूरी है.

भारत ने जब से लद्दाख में दुरबुक, श्योक और दौलत बेग ओल्डी को जोड़ने वाली DBO रोड बनाई, तब से चीन को अंदर ही अंदर ये बात खाए जा रही थी, कि रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण इस इलाके में वो भारत के सामने कमजोर ना पड़ जाए. इस सड़क पर तो चीन ने कोई आपत्ति नहीं की क्योंकि ये सड़क LAC से करीब 9 से 10 किलोमीटर दूर है. लेकिन जब भारत ने इस इलाके में अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को और ज्यादा मजबूत करना शुरू किया तो चीन को भारत के इरादों से डर लगने लगा.

भारत ने इस इलाके की दूसरी महत्वपूर्ण जगहों को DBO रोड से कनेक्ट करना शुरू किया. गलवान घाटी के इलाके में गलवान नदी पर एक पुल बनाने का काम शुरू किया जो LAC से करीब 7 से 8 किलोमीटर दूर है. जब ये सब चीन ने देखा तो उससे रहा नहीं गया. पुल निर्माण पर आपत्ति करने के बहाने वो LAC को पार करके गलवान घाटी में आ गया और वहां की पहाड़ियों पर बैठ गया. चीन ने यहां पर अपने सैनिक बढ़ा दिए और सैन्य साजोसामान इकट्ठा कर लिया.

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यानी समस्या चीन के दिमाग में है क्योंकि वो सोचता है कि अगर भारत ने लद्दाख के इलाके में इंफ्रास्ट्रक्चर अच्छा कर लिया तो फिर वो LAC पर भारत के सामने टिक नहीं पाएगा और आगे से उसकी कोई मनमानी नहीं चल पाएगी. चीन ने अपने इलाकों में तो खूब सड़कें और पुल बनाए, लेकिन जब भारत ऐसा कर रहा है तो उसे ये बात पसंद नहीं आ रही है.

गलवान घाटी में चीन वही हरकतें कर रहा है जो उसने 1962 का युद्ध होने से पहले की थीं. हम आपको गलवान नदी से जुड़े इस इलाके के बारे में और भी विस्तार से बताते हैं.

गलवान नदी काराकोरम के पहाड़ों से निकलकर उस अक्साइ चिन के मैदानों से होकर बहती है, जिसपर चीन का अवैध कब्जा है. चीन पहले ये मानता था कि उसका इलाका इस नदी के पूर्वी किनारे तक ही है लेकिन वर्ष 1960 से उसने इस दावे को नदी के पश्चिमी किनारे तक बढ़ा दिया. वर्ष 1962 में जब भारतीय सेना की एक टुकड़ी ने गलवान घाटी में अपना कैंप लगाया, तो चीन की सेना ने इस कैंप को घेर लिया.

ये 1962 के युद्ध की सबसे लंबी घेराबंदी थी, जो उस वर्ष 22 अक्टूबर तक जारी रही. बाद में चीन की सेना ने गोलाबारी करके इस पोस्ट को तबाह कर दिया. इस युद्ध के बाद चीन की सेना उसी इलाके तक वापस गई, जहां उसका 1960 तक दावा था. यानी चीन ने युद्ध के जरिए अपनी मनमानी कर ली.

अब गलवान घाटी में चीन दोबारा यही कर रहा है. पहले भारत के इलाके में घुसपैठ करना और फिर उस इलाके को अपना साबित करने के लिए सैन्य ताकत दिखाना. यही चीन का जमीन हड़पने का फॉर्मूला है. चीन सोचता है कि जहां तक आकर वो बैठ गया, वहीं अब नया बॉर्डर बन जाएगा.

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