DNA ANALYSIS: पीएम रिलीफ फंड पर सियासत का 'ऐतिहासिक विश्लेषण'

कोरोना वायरस से लड़ने के लिए भारत में PM Cares Fund की स्थापना की गई है लेकिन आजकल हमारे ही देश के बहुत सारे लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं. हाल ही में कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियों और बुद्धिजीवियों ने इस फंड पर सवाल उठाए हैं.  

DNA ANALYSIS: पीएम रिलीफ फंड पर सियासत का 'ऐतिहासिक विश्लेषण'

अब हम PM Cares Fund और PM National Relief Fund को लेकर छिड़े विवाद का विश्लेषण करेंगे. कोरोना वायरस से लड़ने के लिए भारत में PM Cares Fund की स्थापना की गई है लेकिन आजकल हमारे ही देश के बहुत सारे लोग इस पर सवाल उठा रहे हैं. हाल ही में कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियों और बुद्धिजीवियों ने इस फंड पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि PM Cares Fund पारदर्शी नहीं है और इसका सारा पैसा PM National Relief Fund यानी PM NRF में ट्रांसफर कर देना चाहिए. जबकि कांग्रेस के विरोधियों का तर्क है कि PM NRF कांग्रेस ने बनाया था और कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष इसका सदस्य हुआ करता था. इसलिए कांग्रेस Pm National Relief Fund को PM Cares Fund से बेहतर मानती है. आज जब हमने तथ्यों की जांच की तो हमें इन दोनों Funds से जुड़ी कुछ अहम जानकारिया और तथ्य मिले . ये तथ्य हम आपके सामने रखें उससे पहले आप दो तस्वीरें देखिए .

एक तस्वीर 1947-48 के उस दौर की है जब देश के बंटवारे के बाद लाखों की संख्या में लोग पाकिस्तान से भारत आ रहे थे . इन्हीं लोगों की मदद के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने Prime Minister's National Relief Fund यानी प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष की स्थापना की थी .

74 वर्षों के बाद देश ने एक बार फिर पलायन की कुछ ऐसी ही तस्वीरें देखीं लेकिन ये पलायन बंटवारे की वजह से नहीं बल्कि कोरोना वायरस की वजह से हो रहा था. लॉकडाउन के बाद देश के तमाम शहरों से लाखों की संख्या में मजदूर पलायन कर रहे थे. पलायन की इन्हीं तस्वीरों के बीच 28 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में PM Cares Fund का गठन किया गया. PM Cares Fund यानी Prime Minister's Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations Fund के गठन के पीछे एक बड़ा उद्देश्य पलायन को मजबूर लोगों की मदद करना भी था. यानी एक Fund धर्म के नाम पर सताए गए लोगों को राहत देने के लिए बनाया गया था जबकि दूसरा एक वायरस से प्रभावित लोगों को बचाने के लिए बनाया गया है. 

कुल मिलाकर 74 साल पहले बनाए गए प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष और 2020 में बनाए गए PM Cares Fund का मकसद मोटे तौर पर एक जैसा ही था लेकिन जिस कांग्रेस ने कभी प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष पर सवाल नहीं उठाया वो कांग्रेस आज PM Cares Fund पर सवाल उठा रही है.

कुछ दिनों पहले कांग्रेस की अंतिरम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को एक चिट्ठी लिखकर कहा था कि PM Cares Fund में आने वाली रकम को PM National Relief Fund में ट्रांसफर कर दिया जाए ताकि इसकी पार्दर्शिता बनी रहे लेकिन 1948 में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने प्रधानमंत्री राहत कोष की स्थापनी की थी..तब कांग्रेस की डिक्शनरी में पार्दर्शिता जैसे शब्द नहीं हुआ करते थे .

हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इससे जुड़ा 73 साल पुराना एक सबूत इस समय मेरे हाथ में है . ये भारत सरकार के Press Information Bureau की एक प्रेस रिलीज़ है जो 24 जनवरी 1948 को जारी की गई थी .

इस प्रेस रिलीज में पंडित नेहरू ने एक केंद्रीय फंड की जरूरत बताते हुए लिखा था कि- बहुत सारे लोगों ने अलग-अलग फंड में दान दिया है. मुझे लगता है कि इसके लिए एक केंद्रीय फंड बनाना अच्छा रहेगा. इस फंड का इस्तेमाल किसी भी तरह की विपदा से निपटने के लिए किया जा सकता है लेकिन फिलहाल इसका इस्तेमाल पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को बसाने के लिए किया जाना चाहिए.

पंडित नेहरू ने इस राहत कोष की स्थापना. संविधान की स्थापना से भी पहले कर दी थी . जाहिर है इसका मकसद संकट की घड़ी में जरूरत मंदों की मदद करना था लेकिन अब आपको ये भी देखना चाहिए कि गठन के समय Pm National Relief Fund का सदस्य किन्हें बनाया गया था. इसमे सबसे ऊपर थे देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री. दूसरे नंबर पर थे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष, तीसरे नंबर पर तत्कालीन उप प्रधानमंत्री, चौथे नंबर पर वित्तमंत्री, पांचवे नंबर पर टाटा ट्रस्ट के एक प्रतिनिधि और छठे नंबर पर उद्योग और व्यापार जगत के एक प्रतिनिधी को रखा गया था.

यानी 74 वर्ष पहले देश के लिए बनाए गए सबसे जरूरी राहत कोष में प्रधानमंत्री के साथ साथ कांग्रेस के अध्यक्ष को भी जगह दी गई थी लेकिन तब कांग्रेस को इसमें पारदर्शिता की कमी दिखाई नहीं दी. आपको बता दें कि 1948 में कांग्रेस के अध्यक्ष पट्टाभी सीता रमैया थे.

इसके बाद 1985 तक कांग्रेस के अध्यक्ष को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष का सदस्य बनाया जाता रहा लेकिन 1985 में राजीव गांधी के कार्यकाल में नियमों में बदलाव किया और सारे अधिकार प्रधानमंत्री कार्यालय को ट्रांसफर कर दिए गए. यानी 1985 के बाद से ये राहत कोष सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री की देखरेख में काम करने लगा. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ना सिर्फ 1984 से लेकर 1989 तक देश के प्रधानमंत्री रहे..बल्कि वो 1985 से लेकर 1991 तक कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे.

हालांकि यहां हम ये साफ कर देना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष देश के काफी काम भी आया है. खासकर बाढ़, तूफान और भूकंप जैसी विपदाओं के बाद इस फंड से हज़ारों लोगों को मदद भी पहुंची है. इसके अलावा गंभीर रूप से बीमार लोगों को भी इस फंड से काफी फायदा हुआ है लेकिन फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि देश के लिए जरूरी एक फंड में कांग्रेस अध्यक्ष को जगह देकर खुद कांग्रेस ने इसकी पारदर्शिता से समझौता किया था . अब आप सोचिए कि अगर आज प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष या फिर PM Cares Fund का सदस्य बीजेपी के अध्यक्ष को बना दिया जाए..तो क्या कांग्रेस समेत तमाम बुद्धिजीवियों और डिजाइनर पत्रकारों को ये बर्दाश्त होगा?

इस विवाद पर अलग अलग राजनैतिक पार्टियों के प्रतिनिधि क्या कहते हैं ये भी आप सुन लीजिए . फिर हम अपने विश्लेषण को आगे बढ़ाएंगे. आज सुप्रीम कोर्ट ने भी PM Cares Fund पर सवाल उठाने वाली एक याचिका को खारिज कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले वकील ने इस फंड को गैरकानूनी बताया था. जो लोग PM Cares Fund और इसके गठन की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं. उन्हे अब ये समझना चाहिए कि कैसे ये फंड ज्यादा पारदर्शी और ज्यादा लोकतांत्रिक है.

PM Cares Fund में पिछले करीब 2 हफ्तों में हज़ारों करोड़ रुपये जमा हो चुके हैं . जबकि PM National Relief Fund यानी PM NRF में इस समय करीब 3 हज़ार 800 करोड़ रुपये का बैलेंस है.

प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में पहले प्रधानमंत्री के अलावा कांग्रेस अध्यक्ष समेत कई सदस्य हुआ करते थे लेकिन 1985 में इसकी सारी शक्तियां प्रधानमंत्री कार्यालय को ट्रांसफर कर दी गईं . जबकि PM Cares Fund में प्रधानमंत्री के अलावा रक्षा मंत्री, गृहमंत्री और वित्त मंत्री को भी सदस्य बनाया गया है और इसमें विज्ञान, स्वास्थ्य, कानून और समाज के दूसरे हिस्सों से आने वाले लोगों को भी जगह दी जाएगी.

PM NRF में सारी शक्तियां प्रधानमंत्री के पास होती है जबकि PM Cares Fund लोकतांत्रिक ढांचे पर आधारित है. यानी Pm Cares Fund के पैसे का इस्तेमाल कैसे करना है इसका अंतिम फैसला सिर्फ प्रधानमंत्री के हाथ में नहीं होगा, बल्कि इसमें सभी की सहमती जरूरी होगी.

यानी प्रधानमंत्री ने इसका गठन करते हुए खुद अपनी शक्तियों को दूसरों के साथ बांटा है. जहां तक पारदर्शिता की बात है तो आपको बता दें कि PM National Relief Fund का ऑडिट Comptroller and Auditor General Of India यानी CAG द्वारा नहीं किया जाता बल्कि इसका ऑडिट किसी तीसरा संस्था द्वारा होता है. हालांकि PM Cares Fund के ऑडिट को लेकर भी स्थिति अभी साफ नहीं है लेकिन ये माना जा रहा है कि इसका ऑडिट भी किसी स्वतंत्र संस्था द्वारा ही कराया जाएगा.

PM Cares Fund और PM National Relief Fund में एक बड़ा अंतर ये है कि PM NRF में आप 100 रुपये से कम की राशि दान नहीं कर सकते जबकि PM Cares Fund के साथ ऐसी कोई बंदिश नहीं है. यानी इसमें आप छोटी से छोटी रकम भी दान कर सकते हैं. ज़ाहिर है दोनो ही फंड की स्थापना का मकसद देश को विपदाओं से उबारना है लेकिन कोरोना वायरस के खिलाफ एक ऐसे फंड की जरूरत थी जो पूरी तरह इसी लड़ाई को समर्पित हो और Pm Cares Fund को लेकर जिस तरह का उत्साह पूरे देश ने दिखाया है. उससे ऐसा लगता है कि ये फंड अपने उद्देश्य में ज्यादा बेहतर तरीके से कामयाब हो सकता है.

ज़ाहिर है दोनों ही फंड की स्थापना का मकसद देश को विपदाओं से उबारना है लेकिन कोरोना वायरस के खिलाफ एक ऐसे फंड की जरूरत थी जो पूरी तरह इसी लड़ाई को समर्पित हो . और विवादों को बावजूद ये फंड अपने उद्देश्य की तरफ आगे बढ़ रहा है.

DNA वीडियो:

PM Cares Fund से जुड़ा एक विवाद Corporate Social Responsibility यानी CSR को लेकर भी है . Companies Act 2013 के मुताबिक Pm Cares Fund यानी Pm National Relief Fund में दान देती है तो उसे CSR का हिस्सा माना जाता है. CSR किसी भी कंपनी की कमाई का वो हिस्सा होता है जो उसे सामाजिक कार्यों पर खर्च करना होता है और इस पर कंपनियों को टैक्स से छूट भी मिलती है.

अब विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि जो कंपनियां CM Relief Fund में दान कर रही हैं उन्हें CSR के तहत छूट नहीं मिल रही . कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री इस संदर्भ में कई बार शिकायत दर्ज करा चुके हैं लेकिन इस कंपनीज एक्ट को वर्ष 2013 में यूपीए सरकार ने ही पास किया था जिसके तहत राज्य सरकारों द्वारा बनाए गए फंड में दिए गए दान को CSR में नहीं रखा जाता. यानी यहां भी कांग्रेस द्वारा बनाया गया एक कानून ही आड़े आ रहा है . और कांग्रेस को लग रहा है कि बीजेपी ये सब विरोध की राजनीति के तहत कर रही है.