DNA ANALYSIS: कोरोना का हॉट स्पॉट बनता जा रहा ग्रामीण भारत, गांवों की मुश्किलें बढ़ीं

क्या भारत के ग्रामीण इलाके अब कोरोना वायरस का नया हॉट स्पॉट बन गए हैं? आज हम इस मुद्दे पर विश्लेषण करेंगे. भारत में अब तक कोरोना वायरस के करीब 1 लाख 58 हजार मामले सामने आ चुके हैं. इनमें से 6 हजार 566 मामले सिर्फ पिछले 24 घंटों में ही सामने आए हैं.

DNA ANALYSIS: कोरोना का हॉट स्पॉट बनता जा रहा ग्रामीण भारत, गांवों की मुश्किलें बढ़ीं

नई दिल्ली: क्या भारत के ग्रामीण इलाके अब कोरोना वायरस का नया हॉट स्पॉट बन गए हैं? आज हम इस मुद्दे पर विश्लेषण करेंगे. भारत में अब तक कोरोना वायरस के करीब 1 लाख 58 हजार मामले सामने आ चुके हैं. इनमें से 6 हजार 566 मामले सिर्फ पिछले 24 घंटों में ही सामने आए हैं. पहले ज्यादातर नए मामले देश के शहरों से ही सामने आ रहे थे लेकिन अब इसमें ग्रामीण इलाकों की हिस्सेदारी भी बढ़ने लगी है जो चिंता का विषय है, और आज हम इसी चिंता का विश्लेषण करेंगे. 

भारत इस समय चौथे लॉकडाउन में है. हालांकि इस लॉकडाउन में बहुत सारी रियायतें दी गई हैं ताकि लोगों के जीवन और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके. लेकिन इस दौरान लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर भी अब ग्रामीण इलाकों की तरफ लौट रहे हैं. लेकिन इस पलायन ने अब इन ग्रामीण इलाकों में भी संक्रमण का खतरा पैदा कर दिया है. 

आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बैंगलुरू चेन्नई, और हैदराबाद की कुल आबादी में इन प्रवासी मजदूरों की हिस्सेदारी 48 प्रतिशत है. इनमें से ज्यादातर मजदूर उत्तर प्रदेश , बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से आते हैं. 

भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि अब इन राज्यों में कोरोना वायरस के मामले तेजी से बढ़ने लगे हैं. इसलिए राज्यों से कहा गया है कि वो स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने की तैयारी शुरू कर दें. 

स्वास्थ्य मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में 1 मई के बाद से अब तक 2 हजार 45 प्रवासी मजदूरों में कोरोना वायरस के संक्रमण की पुष्टि हो चुकी है. राजस्थान में संक्रमित होने वाले नए मरीजों में से 60 प्रतिशत प्रवासी मजदूर हैं. बिहार में भी अब संक्रमण के मामले 2800 से ज्यादा हो चुके हैं और इनमें ग्रामीण इलाकों की हिस्सेदारी ज्यादा है. 

इसी तरह अब उत्तर प्रदेश के कई ग्रामीण इलाकों में भी कोरोना वायरस के नए हॉट स्पॉट बन रहे हैं. उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के इटावा में संक्रमण के जिन नए मामलों की पुष्टि हुई है उनमें से 20 प्रतिशत प्रवासी मजदूर हैं. 

केरल में कोरोना वायरस के 445 एक्टिव केस हैं और इनमें से 85 प्रतिशत मरीज वो हैं, जो हाल ही में दूसरे राज्यों से लौटे हैं.
आंकड़े बताते हैं कि करीब 2 से ढाई करोड़ मजदूर शहरों से गांवों की तरफ लौट रहे हैं. फिलहाल भारत में औसतन 10 लाख लोगों में से 120 लोग ही कोरोना पॉजिटिव हो रहे हैं, लेकिन इस हिसाब से ग्रामीण इलाकों की तरफ लौट रहे लोगों में से कम से कम तीन हजार लोगों के संक्रमिक होने की आशंका है. 

इस समय भारत के 740 जिलों में से 550 जिले कोरोना वायरस के संकट का सामना कर रहे हैं. इनमें से 180 जिलों में ये संक्रमण पिछले 15 दिनों में ही पहुंचा है. 

इस शनिवार तक भारत में कोरोना संक्रमण के कुल मामलों में ग्रामीण जिलों की हिस्सेदारी 21 प्रतिशत थी.  सरकारों को आशंका है कि जैसे जैसे और मजदूर अपने घरों की तरफ लौटेंगे वैसे वैसे संक्रमण के मामलों में वृद्धि होगी. 

उदाहरण के लिए बिहार से दूसरे राज्यों में गए कुल 20 प्रतिशत मजदूर ही अब तक वापस लौटे हैं. लेकिन अब कोरोना वायरस बिहार के लगभग सभी जिलों में फैल चुका है. 

इसी तरह झारखंड में करीब 80 हजार और ओडिशा में करीब 1 लाख 10 हजार श्रमिकों की वापसी हो चुकी है. ओडिशा के करीब 67 प्रतिशत जिलों में अब कोरोना वायरस फैल चुका है. जबकि मध्य प्रदेश के 80 प्रतिशत जिलों में अब कोरोना वायरस के मरीज हैं. झारखंड के करीब 50 प्रतिशत जिलों में और राजस्थान के करीब 33 प्रतिशत जिलों में कोरोना वायरस फैल चुका है. 

कुल मिलाकर अब ग्रामीण भारत कोरोना वायरस का नया हॉट स्पॉट बनता जा रहा है और अगर ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत नहीं किया गया तो हालात नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं. 

भारत में जितने हॉस्पिटल बेड्स उपलब्ध हैं, उनमें से ग्रामीण इलाकों के हिस्से सिर्फ 33 प्रतिशत बेड्स आते हैं. आंकड़ों के मुताबिक भारत में सरकारी अस्पतालों के पास इस समय करीब 7 लाख बेड्स हैं. 

अगर इसमें प्राइवेट अस्पतालों को भी जोड़ दिया जाए तो ये आंकड़ा 1 करोड़ 90 लाख तक पहुंच जाता है. अनुमान के मुताबिक इनमें से सिर्फ 95 हजार ICU बेड्स हैं जबकि वेंटिलेटर्स की संख्या इससे भी कम है. 

देखें DNA - 

ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और भी ज्यादा है और इसीलिए पलायन के साथ बढ़ता संक्रमण का खतरा राज्य सरकारों के लिए भी चिंता का विषय बन गया है. 

प्रवासी मजदूरों की घर वापसी ने अब ग्रामीण इलाकों में भी कोरोना वायरस के खतरे को बढ़ा दिया है. लेकिन क्या इसके लिए सिर्फ प्रवासी मजदूर ही जिम्मेदार हैं ? इन मजदूरों के पास लॉकडाउन के दौरान अपना सबकुछ गंवाने के बाद, घर लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. या फिर इसके लिए हमारे देश का सिस्टम भी जिम्मेदार है. इस सवाल का जवाब जानने के लिए Zee News की टीम ने एक श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सफर किया है, इन्हीं ट्रेनों के ज़रिए प्रवासी मजदूर अपने अपने राज्यों में लौट रहे हैं. इन ट्रेनों में यात्रा कर रहे प्रवासी मजदूरों की मजबूरी पर आधारित ये रिपोर्ट आपको जरूर देखनी चाहिए. 

उत्तर प्रदेश के दादरी रेलवे स्टेशन की तरह ही देश में जिस भी रेलवे स्टेशन से श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं, वहां प्रवासी मजदूरों की भीड़ दिखाई देगी. और जब आप इन मजदूरों की मजबूरी सुनेंगे तो लगेगा कि ये सिर्फ उसकी नहीं, बल्कि हर उस मजदूर की कहानी है, जो किसी भी तरह अपने घर वापस लौटना चाहता है.

दादरी रेलवे स्टेशन पर बिहार के मुजफ्फरनगर जाने के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलने वाली थी, जिसमें चढ़ने के लिए प्रवासी मजदूरों की लंबी लंबी लाइनें लगी हैं. कोई अकेला घर जा रहा है. किसी के साथ पत्नी और बच्चे हैं. कोई अपने बुजुर्ग मां-बाप को साथ लेकर बिहार जाने के लिए ट्रेन पकड़ने आया है. 

ये भीड़ बता रही है कि कोरोना के इस दौर ने सिर्फ सिस्टम को ही नहीं, आम आदमी की जिंदगी की उस गाड़ी को भी पटरी से उतार दिया है, जो पहले से ही घिसट-घिसटकर आगे बढ़ रही थी. ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी. और उसमें चढ़ना भी कोई पहाड़ चढ़ने से कम नहीं था. सोशल डिस्टेंसिंग का नियम इस भीड़ में कुचला जा रहा था, जैसे तैसे करके ज़ी न्यूज़ की टीम भी उस ट्रेन में सवार हो गई.

भारतीय रेलवे प्रवासी मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाने के लिए रोजाना सैकड़ों ट्रेन चला रहा है. अभी तक 3600 से ज्यादा श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाकर 48 लाख से ज्यादा प्रवासी मजदूरों को उनके गृह राज्यों तक पहुंचाया जा चुका है. लेकिन लंबी यात्रा के दौरान गर्मी और भूख-प्यास की वजह से कई यात्रियों की मौत भी हो चुकी है. लेकिन एक कहावत है - मरता क्या ना करता. ये कहावत ट्रेन में सवार इन मजदूरों पर भी लागू होती है.