DNA ANALYSIS: पीएम मोदी ने लद्दाख दौरे के लिए निम्मू पोस्ट को ही क्यों चुना?

निम्मू फॉरवर्ड पोस्ट के एक तरफ लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी LAC है और दूसरी तरफ लाइन ऑफ कंट्रोल यानी LOC है. यहां से एक तरफ द्रास और करगिल पर सीधी नजर रखी जा सकती है तो वहीं पेंगॉन्ग लेक और चुशुल की भी सेना आसानी से निगरानी कर सकती है.

DNA ANALYSIS: पीएम मोदी ने लद्दाख दौरे के लिए निम्मू पोस्ट को ही क्यों चुना?

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) अक्सर लोगों को सरप्राइज कर देते हैं. शुक्रवार को भी ऐसा ही हुआ, जब वो सुबह अचानक लद्दाख में भारतीय सेना (Indian Army) की फॉरवर्ड पोस्ट पर पहुंच गए. किसी ने सोचा भी नहीं था कि सीमा पर चीन से तनाव के बीच खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लद्दाख पहुंच जाएंगे. लेकिन प्रधानमंत्री ना सिर्फ लद्दाख गए बल्कि वहां पर तैनात सैनिकों से मिलकर जिस तरह की भाषा और जिस तरह के जोश में उन्होंने चीन को ललकारा है, उस तरह से सीमा पर खड़े होकर अब तक शायद ही किसी प्रधानमंत्री ने दुश्मन को साफ-साफ संदेश दिया हो.

इसलिए देश के लोग ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस दौरे से चीन भी चौंक गया होगा. चीन को बिल्कुल अंदाजा नहीं होगा कि लद्दाख में दो महीने से जो सीमा विवाद चल रहा है, उसमें अब भारत आर या पार के मूड में आ चुका है और ये बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लद्दाख दौरे से बिल्कुल स्पष्ट हो चुकी है. शुक्रवार को प्रधानमंत्री लद्दाख के निम्मू पोस्ट पर गए और वहां पर भारतीय सेना, वायुसेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस यानी ITBP के सैनिकों से मिले. प्रधानमंत्री ने भारतीय सेना के कमांडर्स से बात की और लद्दाख की मौजूदा सैन्य स्थितियों और तैयारियों के बारे में पूरी जानकारी ली.

प्रधानमंत्री के साथ चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत (Bipin Rawat) और सेना अध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे भी थे. प्रधानमंत्री लद्दाख में इसी जगह पर क्यों गए, इसे भी समझना जरूरी है. भारतीय सेना की 14वीं कोर के लद्दाख में दो सैन्य बेस हैं, एक लेह में है और दूसरा निम्मू में है. लेह से 35 किलोमीटर दूर निम्मू सैन्य बेस भारतीय सेना के लिए रणनीतिक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण है. क्योंकि यहां से चीन और पाकिस्तान, दोनों तरफ से हमला किया जा सकता है.

वैसे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सीमा पर जाकर सैनिकों से मिलना बहुत आम बात है. वो अक्सर ऐसा करते रहे हैं. लेकिन जब सीमा पर तनाव हो और जब बातचीत भी चल रही हो तब खुद प्रधानमंत्री का 11 हजार फीट की ऊंचाई पर बने निम्मू पोस्ट पर पहुंच जाना और वहां पर तैनात जवानों से मुलाकात करके उनका जोश बढ़ाना, ये अपने आप में बहुत बड़ा संदेश है. जवानों के बीच जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहुंचे तो भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारे गूंज उठे.

इस संदेश को चीन भी समझ रहा होगा, और इसको दुनिया भी समझ रही होगी कि भारत किसी के भी सामने झुकने वाला देश नहीं है.

प्रधानमंत्री ने लेह के शहीद स्मारक में उन 20 वीर जवानों को श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने गलवान घाटी में देश की एक एक इंच जमीन की रक्षा करते हुए अपनी जान दे दी थी. प्रधानमंत्री पहले ही कह चुके हैं कि हमारे जवान, दुश्मन को मारते-मारते मरे हैं और इन 20 शहीद जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, लेह के आर्मी हॉस्पिटल में भर्ती गलवान घाटी के वीर जवानों से भी मिले. ये वही जवान हैं जिन्होंने 15 जून को गलवान घाटी में हुई लड़ाई में ऐसा पराक्रम दिखाया था जिसे चीन की सेना वर्षों तक याद रखेगी. इन्हीं वीरों ने गलवान घाटी में चीन के हमलावर सैनिकों को बिना बंदूक की लड़ाई में ही ऐसा सबक सिखाया कि इस पर आज भी चीन की बोलती बंद है और वो अपने मारे गए जवानों की संख्या तक नहीं बताना चाहता, जबकि सच ये है कि उस रात चीन के 40 से 50 जवान मारे गए थे. गलवान की लड़ाई में भारतीय सेना के घायल हुए 18 जवानों का इलाज लेह के इसी अस्पताल में चल रहा है. प्रधानमंत्री इन वीर जवानों के बीच गए और इनके साहस और पराक्रम को देश के लिए प्रेरणा बताया. 

अब आपको ये समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी अचानक LAC के पास इस फॉर्वर्ड पोस्ट पर क्यों पहुंचे और इसका मतलब क्या है. 

इसका पहला मतलब ये है कि प्रधानमंत्री मोदी ने चीन को बहुत बड़ा और कड़ा संदेश दिया है और चीन को समझा दिया है कि भारत इस सीमा विवाद को लेकर बहुत गंभीर है और भारत इसे ना तो हल्के में लेगा और ना ही चीन के सामने झुकेगा.

इसका दूसरा मतलब ये है कि प्रधानमंत्री मोदी को भारत की जीत का पूरा यकीन है और जब किसी बड़े नेता को जीत का पूरा भरोसा होता है तभी वो इतना बड़ा कदम उठाता है. आप ऐसा भी कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के खिलाफ इस लड़ाई को अपनी खुद की लड़ाई बना लिया है और इसलिए वो खुद फ्रंट पर जाकर सेना के साथ खड़े हो गए हैं.

मोदी के इस कदम का तीसरा मतलब ये है कि इससे चीन और चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी यानी PLA पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ेगा. प्रधानमंत्री मोदी ऐसे नेता हैं जो अपने सैनिकों को सम्मान देना नहीं भूलते और उनकी शहादत और शौर्य की हमेशा सराहना करते हैं सम्मान करते हैं. जबकि चीन के राष्ट्रपति और वहां की सरकार अपने सैनिकों को सम्मान ना देने के लिए कुख्यात है. गलवान में मारे गए सैनिकों पर चीन ने जो झूठ बोला उसने चीन की सेना का मनोबल तोड़ दिया है और प्रधानमंत्री मोदी का लद्दाख जाकर भारत के सैनिकों से मिलना चीन के सैनिकों के मनोबल को और गहरी चोट पहुंचाएगा. चीन के लिए भी ये किसी झटके से कम नहीं है और इससे सैनिकों की नाराजगी झेल रहे शी जिनपिंग की मुश्किलें बढ़ना तय हैं. 

कुल मिलाकर ये लड़ाई सैनिकों और हथियारों से भी आगे की लड़ाई है. ये लड़ाई पुरुषार्थ और हिम्मत की है. ये लड़ाई सच और झूठ की है. इसलिए इस लड़ाई को आप सिर्फ दो देशों के बीच जमीन पर हुए युद्ध की तरह मत देखिए जिसमें न सिर्फ सैनिक लड़ेंगे और हथियारों का इस्तेमाल होगा बल्कि अच्छाई और बुराई की ये लड़ाई आगे चलकर धर्म युद्ध में बदल जाएगी.

जवानों के बीच खड़े होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को जो भाषण दिया, वो भाषण इतिहास में दर्ज होगा. क्योंकि सीमा पर खड़े होकर चीन जैसे देश को एक तरह से चेतावनी देना, ये ना तो किसी दूसरे देश के बस की बात है और ना ही कोई दूसरा ग्लोबल लीडर इस तरह से कह सकता था. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की तीन मुख्य बातें थीं.

पहली बात ये कि उन्होंने चीन को भारत की पहचान याद दिलाई. उन्होंने भगवान कृष्ण की बात की और ये कहा कि भारत वो देश है, जो बांसुरी धारी कृष्ण की पूजा करता है तो सुदर्शन चक्र धारी कृष्ण को अपना आदर्श भी मानता है.

इससे आपको शिशुपाल और भगवान कृष्ण का प्रसंग याद आ गया होगा. कृष्ण ने वचन दिया था कि वो शिशुपाल के 100 अपराध माफ कर देंगे. इसके बाद ही उसे दंडित करेंगे. जब शिशुपाल 100 अपराधों की मर्यादा लांघ गया तो भगवान कृष्ण ने सुदर्शन चक्र चलाकर उसका वध कर दिया था.

दूसरी बात ये है कि प्रधानमंत्री ने वीरता की व्याख्या की. उन्होंने ये कहा कि शांति वीरता से ही आती है. निर्बल व्यक्ति कभी शांति की पहल नहीं कर सकता. इसका मतलब ये है कि दुश्मन को अपनी ताकत दिखाना बहुत जरूरी होता है. ये दुनिया के लिए भी संदेश है कि चीन से डर कर नहीं लड़ा जा सकता.

तीसरी बात ये है कि प्रधानमंत्री ने चीन के विस्तारवाद को सीधी चुनौती दी है. उन्होंने कहा कि ये विस्तारवाद का नहीं, विकासवाद का युग है. और जो विस्तारवाद पर चलेंगे, वो मिट जाएंगे या फिर पीछे हटने को मजबूर होंगे.

निम्मू फॉरवर्ड पोस्ट के एक तरफ लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी LAC है और दूसरी तरफ लाइन ऑफ कंट्रोल यानी LOC है. यहां से एक तरफ द्रास और करगिल पर सीधी नजर रखी जा सकती है तो वहीं पेंगॉन्ग लेक और चुशुल की भी सेना आसानी से निगरानी कर सकती है.

लेह से करीब 35 किलोमीटर दूर निम्मू फॉरवर्ड पोस्ट की गलवान घाटी से दूरी करीब ढाई सौ किलोमीटर है. जबकि अक्साई चिन 190 किलोमीटर की दूरी पर है. निम्मू से इस्लामाबाद की दूरी करीब 400 किलोमीटर है. यानी निम्मू फॉरवर्ड पोस्ट पर पहुंचकर प्रधानमंत्री मोदी ने अक्साई चिन से लेकर इस्लामाबाद तक अपना संदेश पहुंचा दिया है.