DNA ANALYSIS: केरल में गर्भवती हथिनी की हत्या करने से क्या मिला?

अगर किसी देश की महानता का अंदाज़ा लगाना हो तो यह देखिए कि वहां के लोग जानवरों के साथ कैसा बर्ताव करते हैं? 

DNA ANALYSIS: केरल में गर्भवती हथिनी की हत्या करने से क्या मिला?

नई दिल्ली : अगर किसी देश की महानता का अंदाज़ा लगाना हो तो यह देखिए कि वहां के लोग जानवरों के साथ कैसा बर्ताव करते हैं? यह विचार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने दिया था. अगर गांधी जी के इस विचार को पैमाना मान लिया जाए तो क्या आप भारत को एक महान देश कह सकते हैं ? इसी तरह अगर किसी व्यक्ति को आंकना हो तो यह देखिए कि वो अपने से कमज़ोर लोगों के प्रति कैसा व्यवहार करता है.  भारत इन दोनों ही पैमानों पर फेल हो रहा है.

केरल में कुछ इंसानों ने एक भूखी और गर्भवती हथिनी को जलते हुए पटाखों से भरा अनानास खिला दिया और उस हथिनी की तड़प-तड़प कर मृत्यु हो गई. हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि एक गर्भवती महिला या जीव को चोट पहुंचाना सबसे बड़ा पाप है, क्योंकि ऐसा करके आप ना सिर्फ एक मां को चोट पहुंचाते हैं बल्कि उसके अजन्मे बच्चे को भी क्षति पहुंचाते है. केरल में कुछ लोगों ने यह पाप किया और साबित कर दिया कि इंसान, इंसान की योनि में पैदा होकर भी जानवरों जैसा बर्ताव कर सकते हैं.

केरल भारत का सबसे साक्षर राज्य है, जहां 90 प्रतिशत से ज्यादा लोग पढ़ना और लिखना जानते हैं. लेकिन इन पढ़े-लिखे लोगों ने यह प्रमाण दे दिया कि पढ़े-लिखे इंसान भी किस हद तक गिर सकते हैं.

यह विडंबना है कि जब कोई इंसान अमानवीय व्यवहार करता है तो हम उसे जानवर कहते हैं, लेकिन सच यह है कि जानवर क्रूरता नहीं करते वो सिर्फ तभी उग्र होते हैं जब उनके अस्तित्व पर खतरा होता है. लेकिन इंसान अपनी क्रूरता को ही आनंद का जरिया बना लेता है और अपनी सुख सुविधाओं के लिए जानवरों की बलि ले लेता है.

केरल के मल्लपुरम जिले में भी ठीक ऐसा ही हुआ. जहां एक मादा हाथी भोजन की तलाश में भटकते हुए जंगल से एक गांव में आ गई और आरोपों के मुताबिक कुछ लोगों ने उसे जलते हुए पटाखों से भरा अनानास खाने के लिए दे दिया. पटाखे इस मादा हाथी के मुंह में फट गए और वो बुरी तरह घायल हो गई. इंसानों की इस हरकत की वजह से इस गर्भवती हथिनी की जीभ और जबड़ा बुरी तरह जख्मी हो गया और उसके दांत भी टूट गए. इसके बाद दर्द और भूख से तड़पती हथिनी पूरे गांव में भटकती रही, लेकिन किसी ने इसकी मदद नहीं की. हालांकि दर्द से बेहाल होने के बावजूद इस मादा हाथी ने किसी को चोट नहीं पहुंचाई और शांत बनी रही. इस मादा हाथी की गलती सिर्फ इतनी थी कि इसने इंसानों पर विश्वास किया और खाने के लिए इंसानों से वह अनानास ले लिया जिसमें जलते हुए विस्फोटक भरे थे.

इसके बाद घायल हालत में यह हथिनी गांव में मौजूद एक नदी के पास पहुंची और अपने सिर और मुंह को नदी में डुबोकर खड़ी हो गई. ऐसा करने से इस गर्भवती मादा हाथी को शायद थोड़ा आराम मिला होगा. बाद में इस हथिनी की 27 मई को नदी में खड़े-खड़े ही मौत हो गई. कहा जा रहा है कि यह मादा हाथी करीब एक हफ्ते तक भूखी प्यासी तड़पती रही, क्योंकि इस हथिनी के पेट में एक बच्चा भी था इसलिए ये बार-बार खाने की तलाश कर रही थी. लेकिन मुंह में लगी चोट की वजह से वह कुछ भी खाने-पीने में असमर्थ थी.

इस घटना की सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम ने घायल हथिनी को नदी से बाहर निकालने की कोशिश भी की, लेकिन उसकी जान नहीं बचाई जा सकी. केरल के वन विभाग के मुताबिक इस हथिनी की उम्र करीब 15 वर्ष थी.

इस मादा हाथी का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर के मुताबिक उन्हें नहीं पता था कि इसके पेट में एक बच्चा भी है. लेकिन जब उन्होंने इसका पोस्टमार्टम किया तो उन्हें इस मादा हाथी के पेट में एक महीने का भ्रूण भी मिला. नदी में असहाय खड़ी हथिनी की तस्वीरें आपने भी देखी होंगी. वह अपने दर्द को कम करने के लिए पानी में डूबकर खड़ी थी, लेकिन इसकी और इसके अजन्मे बच्चे की मौत ने इंसानियत को शर्म के समुद्र में डूबो दिया है. इस मादा हाथी का पोस्ट मार्टम करने वाले डॉक्टर का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में 250 से ज्यादा हाथियों के पोस्टमार्टम किए हैं, लेकिन यह पहली बार है जब पोस्टमार्टम के दौरान उन्होंने एक हथिनी के पेट में पल रहे भ्रूण को अपने हाथ में उठाया.

यह घटना लोगों के सामने तब आई जब रैपिड रेस्पॉन्स टीम (Rapid Response Team) के एक अधिकारी ने इस बारे में सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट लिखा. उन्होंने लिखा कि घायल होने के बाद हथिनी एक गांव से भागते हुए निकली, लेकिन उसने किसी को भी चोट नहीं पहुंचाई. इस अधिकारी ने यह भी लिखा कि घायल होने के बावजूद यह हथिनी भलाई से भरी हुई थी.

लेकिन इस भूखी-प्यासी गर्भवती मादा हाथी को जो इंसान मिले वह भलाई से भरे हुए नहीं थे बल्कि उनमें हैवानियत भरी थी. अब केरल पुलिस ने इस मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या कुछ महीनों की जेल और कुछ हजार रुपयों के जुर्माने से इस मादा हाथी और इसके अजन्मे बच्चे को न्याय मिल जाएगा ?

एक मादा हाथी को बच्चे को जन्म देने के लिए करीब 22 महीने की गर्भ अवस्था से गुजरना होता है. अगर कुछ इंसानों ने यह अमानवीय हरकत ना की होती तो करीब 2 वर्षों बाद यह बच्चा इस दुनिया में आ जाता.

जब कोई हाथी अपनी मां के गर्भ में होता है तो उसके मस्तिष्क का आकार इंसानों के मस्तिष्क के बराबर होता है. एक वयस्क इंसान के मस्तिष्क का वजन करीब 1400 ग्राम होता है. जन्म लेने के फौरन बाद हाथी रोज़ाना करीब 11 लीटर दूध पीता है. आश्चर्यजनक बात यह है कि जब कोई हाथी अपनी मां के गर्भ में होता है तो उसके नाखूनों पर त्वचा की एक परत चढ़ी होती है ताकि गर्भ में हिलते-डुलते समय वह अपनी मां को चोट ना पहुंचाए । यानी प्रकृति जन्म के साथ ही इस बात की व्यवस्था कर देती है कि कोई किसी को अंजाने में चोट ना पहुंचाए, लेकिन इंसान ऐसा नहीं करता और वह जानवरों को चोट पहुंचाकर भी आनंदित महसूस कर सकता है.

भारत में इंसानों ने एक मादा हाथी की जान ले ली, लेकिन थाइलैंड में एक मादा हाथी ने एक व्यक्ति की जान बचाई. छोटी मादा हाथी खाम ला थाइलैंड के एलिफैंट नेचुरल पार्क में रहती है और जैसे ही इस हथिनी ने देखा कि डेरेक नाम का इसका दोस्त पानी में डूब रहा है यह हथिनी उसे बचाने के लिए पानी में कूद गई. दरअसल डेरेक ने वर्ष 2015 में खाम ला को बचाया था। खाम ला यह बात कभी नहीं भूली और अपने प्रिय इंसान को बचाने के लिए बिना सोचे-समझे नदी में कूद गई. हालांकि डेरेक सिर्फ डूबने का नाटक कर रहे थे. 

अफसोस यह है कि भारत में कानून भी जानवरों की ज्यादा मदद नहीं कर पाते. हालांकि किसी जानवर को नुकसान पहुंचाना या उसे मार डालना अपराध की श्रेणी में आता है, लेकिन ऐसा करने वाले बहुत कम लोगों को सजा हो पाती है. वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 के तहत जानवरों को मारने पर 3 साल तक की सजा और 25 हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है और दोबारा ऐसा करने पर सात साल तक की सजा हो सकती है.

भारतीय संविधान के आर्टिकल 51ए(जी) में लिखा है कि जानवरों के प्रति दया दिखाना भारत के लोगों का मूल कर्तव्य है, लेकिन सोचिए कि भारत में कितने लोग अपने इस मूल कर्तव्य को निभाते हैं. हाथी दल बनाकर रहने वाले जानवर हैं और पूरा जीवन समुदायिक भावना के साथ ही जीते हैं. चाहे दल में किसी नए बच्चे के जन्म का मौका हो या दल के किसी सदस्य की मृत्यु, हाथी अपने समुदाय का साथ नहीं छोड़ते और इतने शक्तिशाली होने के बावजूद तब तक किसी पर हमला नहीं करते जब तक इन्हें उकसाया या डराया ना जाए. 

 

एक मां भूखी-प्यासी होने बावजूद हर तरह की तड़प को बर्दाश्त करने में सक्षम होती है, लेकिन जब उसका अजन्मा बच्चा भूखा होता है तो उसका दर्द मां के अस्तित्व को झकझोर देता है. नदी में सिर डुबोकर खड़ी हथिनी ने दर्द की वजह से अपना चेहरा पानी में डुबो लिया या इंसानों के विश्वासघात ने इसे इस स्थिति में पहुंचा दिया. इसका फैसला तो आप ही करें, लेकिन एरावत के इस देश में हिकारत भरी इस घटना ने पूरी इंसानियत को शर्मसार कर दिया है.

हाथी इंसानों की तरह बेदिल नहीं होते. हाथियों के दल में कोई नया बच्चा पैदा हो तो उसे दूसरे हाथी कई दिनों तक सुरक्षा घेरे में रखते हैं. इसी तरह दल के किसी सदस्य की मौत हो जाने पर पूरा झुंड उस पर अफसोस जाहिर करता है. लेकिन इंसान शायद ही किसी जानवर की मौत पर अफसोस जाहिर करता है. वह जानवरों का इस्तेमाल अपने मनोरंजन, अपने एशोआराम और अपनी खुशी के लिए करता है.

हाथी ही क्या कोई भी जानवर तब तक हमारा साथी नहीं बन सकता. जब तक हम उसे सिर्फ उसके बेजुबान और कमजोर होने की सजा देते रहेंगे. अगर आपको भी किसी जानवर को तड़पे हुए देखकर खुशी होती है तो आज आप अपने आप से ये पूछिगा जरूर की आखिर जानवर कौन है ?

यहां आपके मन में यह सवाल भी उठ रहा होगा कि इस हथिनी की हत्या के लिए कौन जिम्मेदार है. केरल पुलिस अभी इस मामले के आरोपियों को अभी तक गिरफ्तार नहीं कर पाई है. यानी केरल की पुलिस भी इसके लिए जिम्मेदार है. इसके अलावा जिस इलाके में यह घटना हुई वहां के वन्य अधिकारी भी इसके लिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि वह समय रहते इस हथिनी के बारे में पता नहीं लगा सके.

इसके अलावा वो लोग भी इसके लिए जिम्मेदार हैं जो इस इलाके के लोगों को प्रतिनिधित्व देश की संसद में या राज्य की विधानसभा में करते हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी वायनाड की जिस संसदीय सीट से जीतकर संसद में पहुंचे हैं वह भी मल्लपुरम का हिस्सा है. यानी राहुल गांधी भी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते. इसके अलावा केरल के मुख्यमंत्री की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, क्योंकि वो राज्य के मुख्यमंत्री हैं और केरल हाथियों पर अत्याचार के लिए बदनाम है. इसलिए उन्हें भी हाथियों के बचाने के लिए सख्त कानून लाने पर विचार करना चाहिए. लेकिन बहुत सारे लोगों के लिए यह घटना न्यूज बनने की योग्यता नहीं रखती. हमारे देश में किसी व्यक्ति की मौत भी खबर तब बनती है जब उसके धर्म और जाति के बारे में पता लगा लिया जाता है. ऐसे में एक जानवर की मौत तो हमारे देश के पत्रकारों के लिए खबर बन ही नहीं सकती. लेकिन यह खबर देश के चरित्र के बारे में भी बताती है.

करीब एक दशक पहले तक भारत में हाथियों की संख्या 10 लाख से ज्यादा हुआ करती थी, लेकिन अब इनकी संख्या घटते-घटते 27 हजार से भी कम रह गई है. हाथियों की मौत के मामले में केरल भारत का सबसे बदनाम राज्य है, जहां हर तीन दिन में एक हाथी मारा जाता है.
हैरानी की बात यह है कि केरल में हाथियों की यह दुर्दशा तब है जब वहां धर्म और राजनीति में इसे सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है.
केरल में आयोजित होने वाले ज्यादातर बड़े धार्मिक कार्यक्रम बिना हाथियों के पूरे नहीं होते. यहां तक कि चुनावी रैलियों में भीड़ को आकर्षित करने के लिए भी हाथियों का इस्तेमाल होता है. इसके अलावा बंधक बनाए गए हाथियों का इस्तेमाल लकड़ियों की ढुलाई में भी किया जाता है. पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा था कि केरल में बंधक बनाकर रखे गए हाथियों की गिनती की जाए और सबका रजिस्ट्रेशन कराया जाए.

इस आदेश का उद्देश्य हाथियों के साथ होने वाली क्रूरता को रोकना था, लेकिन अफसोस जंगल से आए एक हाथी को अंदाजा भी नहीं था कि इंसान उसका ये हश्र कर देंगे. भारत में इस समय करीब ढाई हज़ार हाथी ऐसे हैं, जिन्हें बंधक बनाकर रखा गया है. करीब 1800 हाथी ऐसे हैं, जो मंदिरों में बंधक बनाकर रखे गए हैं या फिर किसी व्यक्ति ने इन्हें अपनी कस्टडी में रखा है. केरल में करीब 500 हाथी ऐसे हैं, जो बंधक बनाकर रखे गए हैं. दावा किया जाता है कि भारत में करीब 6 हजार वर्ष पहले इंसानों ने हाथियों को पालना शुरू किया था. हज़ारों वर्ष पहले सिंधु घाटी सभ्यता से मिले निशान और मोहरें भी बताती हैं कि उस जमाने में भी हाथी पाले जाते थे.

ऋग्वेद और उपनिषदों में भी अलग-अलग उद्देश्यों से हाथी पाले जाने का उल्लेख मिलता है । कहा जाता है कि जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था तो वह यह देखकर हैरान रह गया था कि भारत के सैनिक कितने कुशल तरीके से इतने विशालकाय जानवर को नियंत्रित कर लेते हैं. सिकंदर के खिलाफ लड़ाई में राजा पोरस ने करीब 200 हाथियों को उतारा था और इन हाथियों ने सिकंदर की सेना को काफी नुकसान पहुंचाया था. लेकिन अब इन हाथियों को या तो इनके दांतों के लालच में मार दिया जाता है या फिर इन पर अत्याचार करके इनसे वह काम कराए जाते हैं जो इंसानों के लिए बहुत मुश्किल होते हैं. भारत में एक मशहूर कहावत है कि मरा हुआ हाथी भी सवा लाख का होता है, लेकिन इंसानों के हाथों मारा गया हाथी करोड़ों रुपये का ही क्यों ना हो वह इंसानों की क्रूरता के अलावा कुछ साबित नहीं करता.

भारत को हाथियों का देश भी कहा जाता है और यही वजह है कि कूटनीति की भाषा में भी कई देश भारत को हाथी कहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे चीन को ड्रैगन कहा जाता है या अमेरिका की तुलना ईगल से की जाती है. कुछ दिनों पहले चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद के दौरान भारत में चीन के राजदूत ने भी कहा था कि - Dragon and Elephant can Dance Together. यानी भारत और चीन सामंजस्य बना कर चल सकते हैं.

हाथी जमीन पर रहने वाले सबसे बड़े जानवर हैं. एक वयस्क अफ्रीकन हाथी का वजन साढे 5 हजार किलो तक हो सकता है. हाथियों की सूंड उनके शरीर का सबसे संवेदनशील और सबसे ताकतवर अंग होता है. हाथी की सूड में डेढ़ लाख से ज्यादा मांसपेशियां होती हैं और एशियाई हाथी तो अपनी सूंड से मूगफली का छिलका तोड़कर उसमें से मूंगफली तक निकाल सकते हैं. यानी बड़ी और ताकतवर सूंड के बावजूद हाथी इससे महीन से महीन काम भी लेने में सक्षम होते हैं. हाथी अपने बाहरी दांतों की वजह से सबको आकर्षित करते हैं. इन्हें अंग्रेजी में टस्क (Tusk) कहा जाता है, लेकिन शिकारी हाथियों का शिकार इन्हीं दांतों की वजह से सबसे ज्यादा करते हैं क्योंकि हाथी के ये दांत बेशकीमती होते हैं. हाथी. दिन भर में 150 किलो खाना खा लेते हैं. हाथी इतना ज्यादा खाते हैं कि उनका 67 प्रतिशत समय भोजन करते हुए ही निकलता है. हाथी बहुत ताकतवर जानवर हैं, लेकिन ये पूरी तरह से शाकाहारी होते हैं. यानी इन्हें यह ताकत किसी दूसरे जीव को खाकर हासिल नहीं होती.
हाथी का एक नवजात बच्चा पैदा होने के 20 मिनट बाद ही अपने पैर पर खड़ा हो जाता है और एक घंटे में चलने में सक्षम हो जाता है. कहते हैं कि हाथियों को सबकुछ याद रहता है. यानी वह कोई बात नहीं भूलते. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हाथियों के मस्तिष्क का टेम्परल लोब (Temporal lobe) आकार में बहुत बड़ा होता है. टेम्परल लोब ही मस्तिष्क की वह जगह है, जहां स्मृतियां यानी यादें जमा होती हैं. पूरी दुनिया में हाथियों को उनके दांतों के लिए मारा जाता है और यही वजह है कि अफ्रीका में जितने हाथी रोज पैदा नहीं होते उससे ज्यादा मार दिए जाते हैं.

जानवरों पर अत्याचार सिर्फ भारत में नहीं होता बल्कि पूरी दुनिया में लाखों करोड़ों जानवर इंसानों के लालच की सजा भुगत रहे हैं. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (World Economic Forum) के मुताबिक पूरी दुनिया में इंसान हर साल 5 हजार करोड़ चिकेन खा जाते हैं. इंसानों की भूख शांत करने के लिए हर साल 150 करोड़ सुअरों को मार दिया जाता है. हर साल 50 करोड़ भेड़ें कसाईघरों में पहुंचा दी जाती हैं. इंसानों की भूख शांत करने के लिए हर साल 30 करोड़ गायों, भैंसों और बछड़ों की हत्या कर दी जाती है. यानी इंसान अपना पेट पालने के लिए हर साल 5 हजार 200 करोड़ जानवरों को हजम कर जाता है. हर दिन दुनिया में 14 करोड़ 25 लाख जानवरों की हत्या इंसानों की भूख मिटाने के लिए कर दी जाती है. विश्व के इस सबसे बड़े संहार में दुनिया का लगभग हर देश भागीदार है.

4 हजार 500 हाथियों पर किए गए एक सर्वे के मुताबिक ज़ू (Zoo) में रहने वाले हाथियों की औसत आयु घटकर करीब 19 वर्ष रह जाती है. जबकि अपने प्राकृतिक परिवेश में एक हाथी 56 साल तक जिंदा रह सकता है.  ब्रिटेन की Oxford University की एक रिसर्च के मुताबिक कैद में रखे गए भालू, शेर, बाघ और चीता जैसे जानवर अक्सर तनाव में चले जाते हैं और इनमें से कुछ जानवर तो पागल भी हो जाते हैं. जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था People For Ethical Treatment Of Animals यानी PETA के मुताबिक कैद में रखे गए जानवर अक्सर अपने बाड़े में ही गोल-गोल घूमते रहते हैं. अपना सिर हिलाते रहते हैं और उनकी ये हरकतें बताती हैं कि जानवर अपने जीवन से खुश नहीं हैं.

भारत की संस्कृति में जानवरों की रक्षा करने को बहुत महत्व दिया गया है. हिंदू शास्त्रों में भी जानवरों का महत्व बताया गया है. गाय, हाथी, बंदर और मोर जैसे जानवरों को तो पवित्र माना जाता है. मशहूर लेखक देवदत्त पटनायक अपनी पुस्तक पशु में जानवरों की उत्पत्ति के बारे में एक दिलचस्प बात लिखते हैं. वह लिखते हैं कि ब्रह्मांड की रचना करने वाले ब्रह्मा के पुत्र थे कश्यप. कश्यप की कई पत्नियां थीं और मान्यता के मुताबिक कश्यप की इन्हीं पत्नियों ने कई तरह के पशुओं को जन्म दिया था. देवदत्त पटनायक के मुताबिक कश्यप की पत्नी तिमी ने ऐसे पशुओं को जन्म दिया जो तैर सकते थे. विनाता ने ऐसे पशुओं को जन्म दिया जो उड़ने में सक्षम थे. कदरू ने रेंगने वाले पशुओं को, सुरभि ने ऐसे पशुओं को जन्म दिया जिनके खुर थे. इसके अलावा सरमा ने पंजे वाले पशुओं, जबकि सुरसा ने ऐसे पशुओं को जन्म दिया जिनकी श्रेणी का निर्धारण करना असंभव है. यह सारी बातें किवदंतियों पर आधारित हैं, लेकिन यह बातें बताती हैं कि जिस तरह ब्रह्रमा ने सृष्टि की रचना की वैसे ही उनकी संतान ने पशुओं को जन्म दिया और इस लिहाज से जानवर और इंसान दोनों प्रकृति की देन हैं और इंसानों को इस सत्य को स्वीकार करके जानवरों को सम्मान देना सीखना होगा.

केरल में हुई घटना देखकर आप यह कह सकते हैं कि जानवर कम जंगली हैं, जबकि इंसान कम इंसान हैं. यानी प्राकृतिक रूप से हिंसक और जंगली होने के बावजूद जानवर सिर्फ अपनी रक्षा में आक्रामक होते हैं, जबकि इंसान क्रूरता की सारी हदें पार करके इंसानियत के स्तर से नीचे गिर जाता है.