DNA ANALYSIS: बेंगलुरू में दंगा 'संयोग' या 'प्रयोग', 'दंगा कंपनी' के 'प्रायोजक' कौन?

क्या आप आज के भारत में ये कल्पना कर सकते हैं कि बेंगलुरू जैसे आधुनिक शहर में सिर्फ़ इसलिए सांप्रदायिक हिंसा की गई, क्योंकि सोशल मीडिया पर एक व्यक्ति ने किसी धर्म के बारे में कुछ टिप्पणी कर दी. 

DNA ANALYSIS: बेंगलुरू में दंगा 'संयोग' या 'प्रयोग', 'दंगा कंपनी' के 'प्रायोजक' कौन?

नई दिल्ली: बेंगलुरू में कल रात एक धर्म विशेष की भीड़ ने शहर के पुलाकेशी नगर में हिंसा फैलाई. वहां पर एक विधायक के घर पर हमला हुआ, उसके घर में आग लगा दी गई. फिर इस भीड़ ने वहां दो पुलिस थानों पर हमला किया, वहां पर तोड़फोड़ की और पुलिस की गाड़ियों को जला दिया. करीब 60 पुलिसकर्मियों सहित कई लोग इस हिंसा में घायल हुए हैं.

भीड़ को कंट्रोल करने के लिए पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी, जिसमें 3 लोग मारे भी गए और ये सब सिर्फ इसलिए हुआ, क्योंकि बेंगलुरू के इस इलाके में कांग्रेस के विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के भतीजे ने कथित तौर पर फेसबुक पर पैंगबर मोहम्मद साहब के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी थी और इसी के बाद कल रात बेंगलुरू के इस इलाके में हिंसा फैलाई गई.

इन दंगों में इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन PFI की राजनैतिक पार्टी SDPI का नाम आया है. जिसके एक स्थानीय नेता को पुलिस ने गिरफ्तार किया है. PFI पर दिल्ली दंगों में भी शामिल होने और इन दंगों की फंडिंग करने का आरोप हैं. दिल्ली दंगों के छह महीने के अंदर ही बेंगलुरू में दंगे हो गए. यानी शहर और जगह नई है, लेकिन दंगे वही हैं.

कल रात वहां सैकड़ों की संख्या में लोगों को इकट्ठा किया गया. इन लोगों ने पहले कांग्रेस विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के घर पर हमला किया, वहां पर गाड़ियों में आग लगाई, विधायक के घर को तहस-नहस किया. फिर ये लोग और बड़ी संख्या में KG हल्ली और DG हल्ली पुलिस थानों में पहुंचे और विधायक के भतीजे के ख़िलाफ़ तुरंत कार्रवाई की मांग की.

कांग्रेस के विधायक के जिस भतीजे पर धार्मिक टिप्पणी करने का आरोप है, उसे गिरफ़्तार भी कर लिया गया था, और इसने सफाई भी दी कि इसका सोशल मीडिया अकाउंट हैक हो गया था. लेकिन इसके बावजूद इस भीड़ ने पुलिस थानों पर हमला किया. वहां पर तोड़फोड़ की और पुलिस की गाड़ियों को आग लगा दी.

एक डीसीपी की गाड़ी में भी भीड़ ने आग लगा दी. थाने के बाहर एक हज़ार से ज़्यादा लोग इकट्ठा थे. ये लोग वहां पर धार्मिक नारे लगा रहे थे. और ये कह रहे थे कि कुर्बानी देनी है और तब तक ये लोग यहां से जाएंगे नहीं.

बेंगलुरू की हिंसा पर चुप क्यों?
क्या आप आज के भारत में ये कल्पना कर सकते हैं कि बेंगलुरू जैसे आधुनिक शहर में सिर्फ़ इसलिए सांप्रदायिक हिंसा की गई, क्योंकि सोशल मीडिया पर एक व्यक्ति ने किसी धर्म के बारे में कुछ टिप्पणी कर दी. सोशल मीडिया पर विवादित पोस्ट आती ही रहती हैं, इसमें कोई गिरफ़्तार भी हो जाता है, तो लोग ये कहते हैं कि अभिव्यक्ति की आज़ादी छीन ली गई है. लेकिन ये सब कहने वाले लोग बेंगलुरू की हिंसा पर चुप हैं.

हम ये मानते हैं कि सभी धर्मों का सम्मान होना चाहिए, और किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन ये शर्त सभी धर्मों पर लागू क्यों नहीं होती है? हमारे यहां हिंदू परंपराओं और हिंदू देवी देवताओं का कई लोग मज़ाक उड़ाते हैं. और विवादित टिप्पणी करते हैं लेकिन ऐसा कब होता है, जब किसी बात पर किसी शहर को जला दिया जाए.

आपने देखा होगा कि हमारे देश में फिल्मों में हिंदू देवी देवताओं का अपमान होता है लेकिन कोई दंगा नहीं होता, Standup Comedians भी हिंदू देवताओं का मज़ाक उड़ाते हैं और ऐसा करके रातों रात सोशल मीडिया के स्टार बन जाते हैं और कई लोग इनका समर्थन करके, इन्हें बुद्धिजीवी साबित करने की कोशिश करते हैं. लेकिन इसके बावजूद इनकी टिप्पणियों पर कोई दंगा नहीं होता. पालघर में दो साधुओं की हत्या हो जाने के बाद भी ऐसा नहीं होता. लेकिन अगर कोई वर्ग विशेष के बारे में या उनकी धार्मिक आस्था के बारे में कुछ कह दें तो उसे सांप्रदायिक बता दिया जाता है, असहनशील कहा जाने लगता है. लेकिन जब बहुसंख्य आबादी की आस्था का मज़ाक उड़ता है तो सब खामोश बैठे रहते हैं. इसलिए सीधी सी बात यही है कि ऐसी हिंसा सुनियोजित तरीके से होती है.

बेंगलुरू में भी यही हुआ. क्योंकि सवाल यही है कि एक विवादित पोस्ट के बाद, हिंसा फैलाने के लिए हज़ारों लोगों को कैसे अचानक इकट्ठा कर लिया गया. दो घंटे तक ये भीड़, बेंगलुरू की सड़कों पर उपद्रव करती रही और इनकी हिंसा के सामने सिस्टम की ताकत भी असहाय नज़र आई. क्योंकि जब विधायक के घर पर हमला हो जाए और जब पुलिस थानों में घुसकर आग लगा दी जाए, तो आप सोच सकते हैं कि ये लोग कितने बेख़ौफ़ थे.

इस भीड़ ने कल बेंगलुरू में करीब 300 गाड़ियों को आग लगाई. ये लोग पत्थरबाज़ी कर रहे थे, पेट्रोल बम फेंक रहे थे. और ये सब अचानक नहीं होता, इस तरह की हिंसा प्लान बनाकर की जाती है. आपने फरवरी में हुए दिल्ली दंगों को भी देखा होगा, दिल्ली दंगों में भी इसी तरह से योजना बनाकर दंगे कराए गए थे.

बेंगलुरू की हिंसा के चश्मदीदों ने बताया कि कम से कम पांच बार भीड़ ने हमला किया और हर बार हमला करने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही थी. हिंसा फैलाने वालों में काफ़ी लोग, उस इलाके के बाहर के थे. यानी विधायक के घर और पुलिस थानों पर हमला करने के लिए बाहर से भी लोगों को बुलाया गया था. ताकि इनकी पहचान भी ना हो सके.

कर्नाटक में बीजेपी की सरकार है और बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री हैं. कर्नाटक सरकार ने भी उत्तर प्रदेश के योगी मॉडल की तरह ही दंगाइयों से सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान का हर्जाना वसूलने का फैसला किया है. उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दंगाइयों से हर्जाना वसूलने के लिए इसी वर्ष कानून बनाया है.

दंगे वाली मानसिकता
जो लोग दंगे वाली मानसिकता को समझते हैं, उन्हें पता है कि कोई भी दंगा अचानक नहीं होता. योजना बनाकर ही दंगे किए और कराए जाते हैं. और इस योजना में दंगा करने के लिए अलग-अलग काम बांटे जाते हैं और उन इलाकों की पहचान कर ली जाती है, जहां पर माहौल को बिगाड़ कर दंगा करना होता है. जैसे दिल्ली के दंगे, तीन चरणों में अंजाम दिए गए थे. पहले चरण में नागरिकता कानून और NRC के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किए गए, दूसरे चरण के तहत इलाकों की पहचान करके सड़कों को जाम किया गया और तीसरे चरण के तहत दंगे कराए गए.

बेंगलुरू के दंगे में सोशल मीडिया पर विवादित पोस्ट होने के एक घंटे के अंदर ही हज़ारों लोग इकट्ठा हो गए थे. इसी से पता चलता है कि दंगे की पहले से ही तैयारी कर ली गई थी और इन लोगों को सिर्फ़ यही तलाश थी, कि दंगा करने का कोई कारण मिल जाए. बेंगलुरू में पुलिस ने अब तक 150 दंगाइयों को गिरफ़्तार किया है, लेकिन इसमें सबसे बड़ी बात ये है कि पुलिस ने मुज़म्मिल पाशा नाम के एक नेता को भी गिरफ़्तार किया है. मुज़म्मिल पाशा Social Democratic Party of India यानी SDPI का नेता है. और ये इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन PFI की राजनैतिक पार्टी है. PFI पर दिल्ली दंगों में भी शामिल होने और इन दंगों की फंडिंग करने का आरोप है.

कांग्रेस ने खुलकर दंगाइयों का विरोध नहीं किया
मुस्लिम समुदाय में अधिकतर लोग भारत की विविधता को समझते हैं और हिंसा से दूर रहते हैं, इसीलिए कहा जाता है कि भारतीय मुस्लिम दुनिया के दूसरे मुस्लिमों से अलग हैं. लेकिन इन्हीं में कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने हितों के लिए लोगों को कभी धर्म के नाम पर तो कभी दूसरे मुद्दों पर भड़काते हैं। और कई राजनैतिक दल अपने वोट बैंक की राजनीति की वजह से ऐसे लोगों का तुष्टिकरण करती हैं.

इसी तुष्टिकरण की वजह से ये राजनैतिक दल बेंगलुरू के दंगाईयों के ख़िलाफ़ खुलकर बोल नहीं पाए. बेंगलुरू में जिस विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के घर पर हमला किया गया, वो कांग्रेस के विधायक हैं. और पिछले विधानसभा चुनाव में कर्नाटक में सबसे ज़्यादा अंतर से जीतने वाले विधायक थे. लेकिन इसके बावजूद उनकी अपनी ही पार्टी कांग्रेस ने खुलकर दंगाइयों का विरोध नहीं किया.

इन नेताओं ने विवादित टिप्पणी करने वाले व्यक्ति और दंगाइयों के बीच कोई अंतर नहीं किया और ऐसे बयान दिए जिससे इनका वोटबैंक नाराज़ ना हो जाए. जैसे कर्नाटक में कांग्रेस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा कि मुस्लिम नेताओं को मुस्लिम उपद्रवियों को रोकना चाहिए, और हिंदू नेताओं को नफ़रत फैलाने वाले पोस्ट करके, लोगों को उकसाने से बचना चाहिए.

इन लोगों की धर्मनिपरेक्षता की पोल इसी बात से खुल जाती है कि कांग्रेस विधायक पर हमले और बेंगलुरू की हिंसा पर राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. क्योंकि इस घटना पर बोलना इनके राजनैतिक एजेंडे में फिट नहीं बैठता. अगर यही हिंसा दूसरे राज्य या दूसरे समुदाय द्वारा होती तो ये नेता अब तक ना सिर्फ Tweet कर चुके होते बल्कि हो सकता था कि ये नेता अब तक राजनैतिक पर्यटन भी कर चुके होते.

किसी को नाराज़ ना करने के डर से ऐसी बातें करने वाली कांग्रेस को अपने ही विधायक के घर का हाल देख लेना चाहिए, जिसे बेंगलुरू के दंगाइयों ने तहस-नहस कर दिया. विधायक के घर में घुसकर सैकड़ों की संख्या में तोड़फोड़ की. उनके घर में और आसपास खड़ी गाड़ियों में आग लगा दी. हम आपको हिंसा के बाद विधायक के घर की तस्वीरें दिखा रहे हैं.

इस हिंसा की सीसीटीवी फुटेज भी हमें मिली है. कल रात को हिंसक भीड़ कैसे विधायक के घर में घुसी और कैसे वहां पर पथराव किया गया. कैसे वहां पर गाड़ियों में आग लगाई गई. ये सब इन तस्वीरों में दिख रहा है. सबसे बड़ी बात ये है कि कल कृष्ण जन्माष्टमी थी और विधायक का परिवार जन्माष्टमी मनाने के लिए मंदिर गया था. अगर वो लोग घर पर होते तो उनके साथ बड़ी अनहोनी हो सकती थी.

बेंगलुरू के दंगे में दो बातों की जांच होनी चाहिए. पहली बात कि क्या कांग्रेस विधायक के भतीजे का सोशल मीडिया अकाउंट, सच में हैक हुआ था, या फिर जानबूझ कर इस व्यक्ति ने विवादित टिप्पणी की थी, और दूसरी बात, कि इस मामले में खुद कांग्रेस पार्टी की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए.

धर्मनिरपेक्षता के नाम पर दंगाइयों का बचाव 
ये हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यहां धर्मनिरपेक्षता के नाम पर दंगाइयों का भी बचाव किया जाता है लेकिन बेंगलुरू की हिंसा से नकली धर्मनिपरेक्षता के गिरोह का एक बार फिर पर्दाफ़ाश हो गया है. इस गिरोह में बड़े बड़े नेता, बुद्धिजीवी और पत्रकार शामिल हैं, जो अक्सर भारत में धार्मिक असहनशीलता की बात करके नकली आंसू बहाते हैं और पूरे देश को असहनशील बता देते हैं, लेकिन असली असहनशीलता क्या होती है, ये बेंगलुरू की घटना से पता चल गया है.

आज ऐसे लोगों का भी पर्दाफाश हो गया, जो दलित-मुस्लिम एकता का एजेंडा चलाते हैं और इसके नाम पर राजनीति करते हैं. कांग्रेस के जिन विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के घर पर हमला किया गया, वो दलित समुदाय के हैं. अक्सर दलितों के ख़िलाफ़ कोई अपराध होता है, तो ये लोग राजनैतिक पर्यटन में जुट जाते हैं, लेकिन एक दलित विधायक पर हमले के बाद इन लोगों से पूछा जा रहा है कि आख़िर दलित-मुस्लिम एकता अब कहां चली गई? और क्यों ये लोग अब एक दलित विधायक के पक्ष में बोलने से डर रहे हैं.

अभिव्यक्ति की आजादी पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए
भारत में जब एक वर्ग विशेष के लोगों की भावनाएं आहत होती हैं तो लोग हिंसा पर उतारू हो जाते है. सोशल मीडिया पर की गई एक पोस्ट दंगों की वजह बन जाती है. लेकिन जब बहुसंख्यक आबादी के प्रतीक चिन्हों पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की जाती हैं तो लोगों से सहनशील बने रहने की अपील की जाती है और कहा जाता है कि भारत में सबको अभिव्यक्ति की आजादी है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत का संविधान बनने के कुछ समय बाद ही इस अभिव्यक्ति की आजादी पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए थे.

इसके लिए वर्ष 1951 में संविधान में पहला संशोधन किया गया था. इसका मक़सद ये था कि किसी के बयान से किसी की जातीय या धार्मिक भावना को ठेस ना पहुंचे इसके तहत नागरिकों को मिली आज़ादी को कम कर दिया गया था और उन्हें सिर्फ़ एक संख्या के तौर पर देखा जाने लगा, फिर इस संख्या का इस्तेमाल कभी तुष्टिकरण के लिए किया गया तो कभी लोगों को भड़काने के लिए. लेकिन ये कौन तय करेगा कि किस व्यक्ति की भावना किस बात से आहत होती है. हालांकि भारत के नीति निर्माता चाहते थे कि भारत में लोगों को अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी मिले ताकि समाज में अलग-अलग विचारों को जगह मिल पाए. लेकिन पहले संशोधन के साथ ही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में संपूर्ण अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कुछ शर्ते लगा दी गईं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र यानी अमेरिका में पहला संविधान संशोधन हुआ था तो क्या बदलाव किए गए थे. वर्ष 1791 में अमेरिका के पहले संविधान संशोधन में लोगों को अभिव्यक्ति की आज़ादी दी गई थी. दो देशों के संविधान में हुए पहले संशोधनों के ज़रिए आप ये समझ सकते हैं कि दोनों देशों के शुरुआती राजनेताओं की सोच और इरादों में कितना फ़र्क था.

सहनशीलता की ज़िम्मेदारी बहुसंख्यक आबादी के कंधों पर 
बैंगलुरू जैसी घटनाएं होने के बाद अक्सर भारत में धर्म निरपेक्षता की दुहाई दी जाती है, और कहा जाता है कि धर्मनिरपेक्ष और सहनशील देश होने की वजह से भारत को सहनशीलता दिखानी चाहिए. लेकिन आख़िर में इस धर्मनिरपेक्षता और सहनशीलता की सारी ज़िम्मेदारी बहुसंख्यक आबादी के कंधों पर डाल दी जाती है. इसलिए आज आपको समझना चाहिए कि क्या भारत हमेशा से धर्मनिरपेक्ष था या फिर समय के साथ इस शब्द ने पहले भारत के संविधान में और फिर भारत की राजनीति में एक जगह बना ली ?

जब 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया तब भारत Secular, यानी धर्मनिरपेक्ष देश नहीं था. वर्ष 1976 में संविधान के 42वें संशोधन के बाद भारत एक Secular देश बन गया. इसलिए इससे दो सवाल उठते हैं, पहला ये कि भारत में धर्मनिरपेक्षता निभाने की ज़िम्मेदारी आख़िर किसकी है? और दूसरा ये कि क्या संविधान में 42वें संशोधन के बाद भी भारत Secular हो पाया है?

Secular शब्द यूरोप की देन 
असल में Secular शब्द यूरोप की देन है. यूरोप में RELIGION यानी पंथ और सरकार को अलग किया गया था ताकि साम्प्रदायिक झगड़े बंद हो सकें और इसी व्यवस्था को SECULARISM कहा गया. यानी वहां की सरकारें ना तो किसी पंथ विशेष को समर्थन देती हैं और ना ही उसका विरोध करती हैं.

आपने ध्यान दिया होगा कि यहां हमने RELIGION शब्द का प्रयोग किया है. ऐसा इसलिए है क्योंकि RELIGION और धर्म एक नहीं हैं. RELIGION को अक्सर आप धर्म के नाम से जानते हैं. लेकिन ये सही परिभाषा नहीं है. धर्म शब्द भारतीय सभ्यता की देन है और इसका अर्थ होता है, धारण करना यानी जीवन जीने की ऐसी शैली जो आपको मुक्ति के रास्ते पर लेकर जाती है. वहीं RELIGION शब्द को हिंदी में पंथ कहां जा सकता है. RELIGION में धर्म हो सकता है. लेकिन RELIGION ही धर्म नहीं हो सकता है. RELIGION यानी पंथ को भारत में धर्म से जोड़ना एक ग़लती है.

इन दो शब्दों में फर्क़ ना कर पाने की वजह से ही भारत में पंथनिरपेक्षता को धर्मनिरपेक्षता समझ लिया जाता है. धर्मनिरपेक्षता की अपने आप में कोई परिभाषा नहीं है क्योंकि भारत में धर्म को और खासकर हिंदू धर्म को जीवन शैली माना जाता है और बिना शैली के जीवन संभव नहीं है. हिंदू हमेशा से भारत में बहुसंख्यक रहे हैं और इसलिए इस धर्मनिरपेक्षता की सारी ज़िम्मेदारी हिंदुओं के कंधों पर आ गई है.

अलग-अलग संस्कृतियों वाला देश
अब सवाल ये है कि फिर होना क्या चाहिए. विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के सामाजिक ताने बाने के लिए धर्मनिरपेक्ष से ज़्यादा अच्छा शब्द Plura-lism..यानी बहुलवाद है. Plura-lism को मानने वाला देश वो देश होता है जहां लोग अलग-अलग संस्कृतियों का पालन करते हैं, अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं, जहां लोगों के जीवन जीने का शैली अलग-अलग है और इसी विविधता को उस देश की ताकत मान लिया जाता है. इन पैमानों पर भारत को Pluralist और अलग-अलग संस्कृतियों वाला देश कहना ज़्यादा ठीक लगता है. इसी बहुलवाद की वजह से भारत आज एक लोकतांत्रिक देश है और यही विविधता भारत की असली पहचान है. जबकि धर्मनिरपेक्षता की बात होते ही लोग सिर्फ़ धर्म को बीच में ले आते हैं और भारत की इस विविधिता को भूल जाते हैं.

जो लोग धर्म और पंथ को एक दूसरे से जोड़ते हैं और धर्मनिपरेक्षता की बात करते हैं, उन्हें धर्म शब्द की सही व्याख्या पता होनी चाहिए और ये भी पता होना चाहिए कि इसी व्याख्या के आधार पर हमारे संविधान और संसद में भी जगह जगह इसी धर्म का ज़िक्र है. जैसे लोकसभा में स्पीकर की कुर्सी के ऊपर वाक्य लिखा है- 'धर्मचक्र-प्रवर्तनाय'. इसका मतलब ये है कि भारत में प्राचीन काल से ही शासन करने वाले, धर्म के रास्ते को आदर्श मानकर चलते रहे हैं और इसी धर्म के मार्ग का प्रतीक धर्मचक्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज और भारत के राज-चिन्ह पर भी है. इसके अलावा संसद में कई और स्थानों पर धर्म की ये व्याख्या करते हुए श्लोक लिखे हैं, कि जहां सत्य ना हो, वो धर्म नहीं है. यानी धर्म का मतलब हमारे यहां किसी विशेष पद्धति का पूजा-पाठ या धार्मिक कर्मकांड नहीं है. हमारे यहां धर्म की व्यापक परिभाषा है.

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