नॉर्थ ईस्ट में आतंक का दूसरा नाम था उल्फा, सेना ने इस रणनीति से खत्म किया वजूद

भारतीय सेना के इंटेलीजेंस विंग ने एक ऐसा ऑपरेशन चलाया जो कि नौ साल तक चला और उसका नतीजा दृष्टि राजखोवा के आत्मसमर्पण के रूप में आया.

नॉर्थ ईस्ट में आतंक का दूसरा नाम था उल्फा, सेना ने इस रणनीति से खत्म किया वजूद

नई दिल्ली: नब्बे के दशक में नॉर्थ इस्ट में उल्फा आतंक का दूसरा नाम था लेकिन समय के साथ साथ सुरक्षाबलों ने इस संगठन पर ऐसी नकेल कसी कि उसकी न सिर्फ गतिविधियां बल्कि वजूद ही खत्म हो गया. अब उल्फा भारत सरकार के साथ बातचीत के मेज पर बैठा है. हालांकि जब उल्फा के कमांडरों ने भारत सरकार के साथ बातचीत शुरू करने की शुरुआत की तो उसी समय एक धड़ा परेश बरुआ के साथ अलग हो गया और एक नया संगठन उल्फा (आई) बना लिया था. 

मोस्ट वॉन्टेड परेश भारत से भागकर चीन चला गया और उसके पीछे बागडोर उसके डिप्टी कमॉडर इन चीफ दृष्टि राजखोवा ने संभाली. भारतीय सेना के इंटेलीजेंस विंग ने एक ऐसा ऑपरेशन चलाया जो कि नौ साल तक चला और उसका नतीजा दृष्टि राजखोवा के आत्मसमर्पण के रूप में आया. बुधवार को मेघालय में राजखोवा ने अपने चार बॉडीगार्ड के साथ सेना के सामने सरेंडर कर दिया. 

सरेंडर के पीछे की कहानी और भी दिलचस्प है. मिलेट्री इंटेलीजेंस ने इस ऑपरेशन को साल 2011 में तब शुरू किया जब उल्फा कमांडर इन-चीफ परेश बरुआ ने 2011 में डिप्टी कमांडर इन चीफ बनाया था. इससे पहले राजखोवा 2011 तक उल्फा (आई) के 109 बटालियन का कमांडर था. सेना के एक कैप्टन ने राजखोवा के साथ संपर्क बनाया और पिछले 9 सालों में अलग-अलग जगह पोस्टिंग के बावाजूद उससे लगातार संपर्क बनाए रखा और सरेंडर करके मुख्य धारा में आने का दबाव बनाए रखा. 

चूंकि ये एक बडा ऑपरेशन था तो खुद दिल्ली में सेना मुख्यालय में मिलेट्री इंटेलिंजेस के डीजी की सरपरस्ती में इस सरेंडर प्लान की रूपरेखा तैयार की गई और उसके मुताबिक 11 नवंबर को आधी रात को एक ऑपरेशन लॉन्च किया गया. तकरीबन 2 बजे राजखोवा ने अपने चार बॉडीगार्ड के साथ सेना के रेड हॉर्न डिविजन के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और एक AK-81 और 2 पिस्टल भी सेना को सौंप दिए. 

फिलहाल सेना राजखोवा को किसी अन्य स्थान पर ले गई है. राजखोवा सुरक्षाबलों के रडार पर वो काफी दिनों से था लेकिन कई बार ये सुरक्षाबलों के साथ हुए मुठभेड़ में बच निकला था. इसी साल 20 अक्टूबर को ही राजखोवा एक एनकाउंटर में बच निकला था. राजखोवा एक आरपीजी एक्सपर्ट है जिसे उल्फा कमांडर इन चीफ परेश बरुआ ने 2011 में डिप्टी कमांडर इन चीफ बनाया था. नार्थ ईस्ट में कई हमलों को राजखोवा ने अंजाम दिया है और नॉर्थ इस्ट के राज्यों यहा तक कि बांग्लादेश में गन रनिंग का मास्टर माइंड माना जाता है और उत्तर पूर्व के राज्यों में सक्रिय उग्रवादी संगठनों को हथियार मुहैया कराता है. 

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