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EXCLUSIVE: कारगिल हीरो के मासूम बेटे से सुनिये, उसके जांबाज पिता की कहानी

एक दिन खेल-खेल में एक फोल्‍डर मासूम के हाथ लग गया. इस फोल्‍डर पर कारगिल लिखा था. फोल्‍डर के अंदर उसके पिता की तस्‍वीरें और अखबारों की कटिंग थी. जिससे उसे पता चला कि उसके पिता भी कारगिल हीरो हैं.

EXCLUSIVE: कारगिल हीरो के मासूम बेटे से सुनिये, उसके जांबाज पिता की कहानी
युद्ध में जाने से पहले मेरे पिता ने कहा था कि वह या तो जंग फतेह करेगे, या फिर वापस नहीं आएंगे.
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नई दिल्‍ली: 19 साल पहले पाक के नापाक इरादों को नाकाम करते हुए भारतीय सेना ने कारगिल युद्ध पर अद्भुत विजय हासिल की थी. कारगिल के इस युद्ध में देश के लिए अपनी प्राणों की बाजी लगाने वाले भारतीय सेना के जाबांजों में एक कैप्‍टन अखिलेश सक्‍सेना भी हैं. कैप्‍टन अखिलेश सक्‍सेना ही वो शख्‍स हैं, जिनकी सूझबूझ और साहस की बदौतल कारगिल की युद्ध में जीत का पहला रास्‍ता भारतीय सेना के लिए खुला था. आइए कैप्‍टन अखिलेश सक्‍सेना के बेटे अक्षय से जानते हैं, उनके पिता की जाबांजी की कहानी ... 

कारगिल युद्ध की कहानी वैसे तो मैंने बहुत बार सुन रखी थी, लेकिन मुझे पता नहीं था कि इस जंग का रियल हीरो मेरे घर में ही मौजूद है. कुछ साल पहले, मैं अपने दादा-दादी के पास मुरादाबाद गया था. वहां खेलते हुए मुझे एक फोल्‍डर मिला. जिसके ऊपर कारगिल लिखा हुआ था. इस फोल्‍डर को खोलने पर मुझे बहुत सारे अखबार की कटिंग और फोटोग्राफ्स देखने को मिले. उन सभी पेपर कटिंग और फोटोग्राफ्स में मेरे पिता जी की मौजूदगी, मेरी उत्‍सुकता बढ़ाने के लिए काफी थी. मैंने उन तस्‍वीरों में अपने पिता की मौजूदगी के बारे में अपने दादा जी से पूछा. उन्‍होंने मुझे बताया कि मेरे पिता जी भी कारगिल युद्ध के एक नायक हैं. देश की रक्षा के लिए मे‍रे पिता जी ने भी कारगिल के युद्ध में अपना खून बहाया था. 

मेरे दादा जी ने मुझे कारगिल के युद्ध से जुड़ी बहुत सारी कहानियां सुनाई, लेकिन मेरा मन का‍रगिल वॉर के रियल हीरो यानी पिता जी के मुंह से ऑपरेशन विजय की कहानियां सुनने के लिए मचल रहा था. मुरादाबाद में अब मुझे एक-एक पल भारी लगने लगा था. अब मुझे जल्‍दी थी दिल्‍ली पहुंचने की, अपने पिता से कारगिल से जुड़ी हर कहानी को सुनने की. आखिर वो दिन आ गया, हम मुरादाबाद से अपने पिता जी के पास दिल्‍ली आ गए. मेरे पिता जी ने मुझे कारगिल युद्ध से जुड़ी हर छोटी से छोटी कहानी सुनाई. देश के प्रति अपने पिता का प्‍यार और जज्‍बात को देखने के बाद मैंने भी ठान लिया कि मैं भी एयरफोर्स में पायलट बनकर अपने देश की सेवा करूंगा. अपने इस लक्ष्‍य को पूरा करने के लिए मैंने काफी पहले से तैयारी शुरू कर दी है.
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दोस्‍त वीडियो गेम से करते हैं कारगिल युद्ध की तुलना 
अक्षत ने बताया कि आजकल बहुत से ऐसे वीडियो गेम हैं जो युद्ध पर आधारित है. जब मैं अपने दोस्‍तों के साथ यह गेम खेलता हूं तो वह पूछते हैं कि क्‍या ऐसा ही कॉरगिल युद्ध में हुआ था. बहुत मजा होगा वॉर में. मैं उनसे कहता हूं, मजे की बात नही है, बहुत सीरियस मैटर होती है जंग. दोस्‍त पूछते हैं कि काफी एक्‍सपीरिय मिलता होगा और डर लगता होगा. 

मैं उन्‍हें बताता हूं कि डर बिल्‍कुल लगता होगा. मैंने कहा, अगर मेरे पापा को डर लग जाता, तो उनके पूरे ट्रुप का मनोबल कम हो जाता, तो डर का बिल्‍कुल सवाल ही नहीं उठता. दोस्‍त पूछते हैं कि एम्‍युनेशन कैसे आर्मी तक पहुंचती थी, मैंने उन्‍हें बताया कि काफी दिनों तक खाना नहीं मिलता था. दुश्‍मन ऊपर बैठा था, इसलिए एम्‍यु‍नेशन भी नहीं पहुंच पाती थी. इस तरह के मुझसे कई सवाल मेरे दोस्‍त मुझसे पूछते हैं और मैं उनको जवाब दे देता था.
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मेरे पापा के पास थे दो विकल्‍प, एक जीत और दूसरी शहादत
अक्षत ने बताया कि मेरे पिता केसरिया बाना पहनकर युद्ध के लिए निकले थे. केसरिया बाना का मतलब होता है कि या तो जीत हासिल करके वापस आएंगे या फिर वापस नहीं आएंगे. तब तक दो प्रयासों के बावजूद कारगिल युद्ध में जीत के विजन पूरा नहीं किया जा सका था. जिसके बाद मेरे पापा को दुश्‍मनों से लड़ने के लिए जाना था. फौज का नियम है कि कमांडिंग आफिसर हमेशा जवानों के बीच में चलते है, लेकिन मेरे पिता जी ने तय किया कि वह सबसे आगे चलेंगे. दुश्‍मनों की पहली गोली का सामना वह खुद करेंगे. मेरे पिता जी किसी से नहीं डरे और वह जीत हासिल करके वापस लौटे.