सेब नहीं रख पाई, वो व्रत पर थे: दिल्ली हिंसा के शिकार जवान रतनलाल के घर का हाल

जिसने भी देखा, उनकी आंखों से आंसू निकल आए. वंदेमातरम् के नारे और शहीद रतनलाल अमर रहे के नारे लगने लगे.

सेब नहीं रख पाई, वो व्रत पर थे: दिल्ली हिंसा के शिकार जवान रतनलाल के घर का हाल
शहीद रतनलाल और उसका परिवार

नई दिल्ली. दिल्ली हिंसा (Delhi Vilonece) के शिकार हुए पुलिस के जवान रतनलाल दिल्ली के बुराड़ी में एक छोटे से घर में रहते थे. उनके घर सुबह से उनका इंतजार हो रहा था. उनके आने का इंतज़ार हो रहा था. शाम को जब पार्थिव शरीर पहुंचा तो पत्नी पूनम, बड़ी बेटी सिद्धी, छोटी बेटी कनक बेटा राम का बुरा हाल था.

जिसने भी देखा, उनकी आंखों से आंसू निकल आए. वंदेमातरम् के नारे और शहीद रतनलाल अमर रहे के नारे लगने लगे.

थोड़ी देर में ही उनकी पत्नी पूनम बेहोश हो गई, बच्चों का भी बुरा हाल हो गया. तुरंत पार्थिव शरीर को उठा कर एक गाड़ी में रख दिया.

थोड़ी देर बाद जब पूनम जी को होश आया तो बेटी से कहा- अब तुम्हारी पेंसिल कौन लाएगा. बेटी और बेटा रोते रोते चुप कराने लगे.

पूनम जी ने ज़ी न्यूज़ से बात की और कहा उन्हें अफसोस है कि वो उनके साथ एप्पल नहीं रख पाई. वो व्रत पर थे. सुबह मुझसे कहने लगे, तुमने रात को टीवी क्यों नहीं चलाई, देखो दंगा भड़क रहा है, मेरे सर अकेले हैं मैं जाउंगा. उन्होंने कहा कि बच्चों को स्कूल मत भेजो. मैंने कहा एग्जाम चल रहे हैं तो पूछा कि क्या तीनों के चल रहे? मैंने कहा तीनों के चल रहे हैं, भेजना जरूरी है।

इतना कहकर वो फिर से रोने लगीं. रोते रोते वो याद करने लगी कि वो जब जाते थे तो पीछे मुड़कर नहीं देखते थे. मैं देखती थी कि कभी तो देखें पर नहीं देखते थे और आज ऐसे आए. पूनम जी को अब चिंता है कि बच्चों की पढ़ाई कौन करवाएगा.

बच्चों को शाम तक नहीं बताया गया था कि उनके पापा दुनिया में नहीं हैं. वो लोगों को इकट्ठा होते देख रहे थे पर समझ नहीं पा रहे थे. पापा को कांच के ताबूत में बंद देखकर रोने लगे. उनसे गले से लिपटना भी चाहा तो कांच की दीवार से ही लिपटे. रोज की तरह गले नहीं मिल पाए. 

बेटी कनक पांचवीं में पढ़ती है. बोली बोली पापा ने जाने से पहले बोला था कि तैयार हो जाओ. सिद्धी बोली अकसर कहते थे कि बड़ा होकर अच्छे-अच्छे काम करना है. सिद्दी सातवीं क्लास में पढ़ रही है. बेटा राम तीसरी क्लास में पढ़ता है. पापा उसको बाय बोलकर गये थे.

घर पर आज अलग अलग नेता देखने आ रहे हैं. सांत्वना दें रहे हैं और आर्थिक मदद नौकरी देने की बात कर रहे हैं. ये बातें कितनी हकीकत होंगी ये दूर की बात है. नेताओं का क्या वह एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं बशीर बद्र की उस लाइन की तरह कि "बस्तियां किसने जलाई बाजार किसने लूटे मैं चांद पर गया था मुझको पता नहीं."

लेकिन असल समस्या परिवार के दोबारा खड़ा होने की है. क्षति अपूरणीय हुई है और इससे भी बड़ी समस्या की दिल्ली की हवा खराब हुई है. लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में और कुछ लोग तरस नहीं खा रहे बस्तियां जलाने में.