DNA ANALYSIS: कृषि विधेयकों पर विरोध क्यों, जानिए इससे जुड़े भ्रम और सवाल क्या हैं?

ऐसा नहीं है कि राजनीतिक दलों को नहीं पता है कि सरकारी मंडियों में किसानों के साथ क्या हो रहा है. आज भी वही नीति चल रही है जो अंग्रेजों के समय शुरू हुई थी. लेकिन नए भारत में ऐसी किसी नीति की छूट नहीं दी जा सकती. 

DNA ANALYSIS: कृषि विधेयकों पर विरोध क्यों, जानिए इससे जुड़े भ्रम और सवाल क्या हैं?
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नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद जो सबसे बड़े वादे किए थे उनमें से एक था 2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुना करना. देश में खेती की जो हालत है उसे देखते हुए ये लक्ष्य असंभव मालूम होता है. लेकिन मोदी सरकार कह रही है कि अगर खेती से जुड़े कुछ पुराने कानूनों में बदलाव कर दिए जाएं तो किसानों की आमदनी दोगुनी की जा सकती है. इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि किसानों को देश में कहीं भी अपनी उपज बेचने की छूट दी जाए. इसे ही One Nation, One Market कहा जा रहा है. यानी एक देश एक बाजार.

मोदी सरकार ने ये काम शुरू किया तो विपक्ष ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है. विपक्ष का कहना है कि इससे किसान बर्बाद हो जाएंगे और खेती पर प्राइवेट कंपनियों का कब्जा हो जाएगा. विपक्ष ही नहीं, NDA में BJP की सबसे भरोसेमंद सहयोगी अकाली दल भी इन बिलों के विरोध में है. अकाली दल की हरसिमरत कौर बादल ने गुरुवार को इस मुद्दे पर केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया.

क्यों महंगी हो जाती हैं सब्जियां
आपने देखा होगा कि जब दिल्ली में आप 100 रुपये किलो प्याज खरीद रहे होते हैं, उसी समय यूपी, हरियाणा या पंजाब के खेतों में प्याज पड़ी सड़ रही होती है और उन्हें कोई खरीदार नहीं मिलता. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यूपी के सहारनपुर का कोई किसान अपने पड़ोसी राज्य हरियाणा के यमुनानगर में जाकर फसल नहीं बेच सकता. उसे अपनी फसल को अपने ही जिले की मंडी समिति को बेचना पड़ता है. मंडियों में बिचौलियों का एक जाल होता है जिसमें किसान फंस जाता है. इसके कारण कई बार उसकी फसल नहीं बिक पाती और कई बार बिकती भी है तो बहुत कम दाम में. ये बिचौलिए ही किसानों के मालिक बन जाते हैं और कई बार किसानों को कर्ज देते हैं. इस कर्ज से बाहर निकलना किसानों के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है. किसानों की आत्महत्या के जो मामले हम सुनते हैं, उनमें कई कर्ज की वजह से होती हैं. मोदी सरकार ने इसी व्यवस्था को खत्म कर दिया है. इसके लिए सरकार ने 3 नए विधेयक बनाए हैं, जिन्हें लेकर अब राजनीतिक विवाद हो रहा है.

किसानों के लिए विधेयक
- पहला बिल एग्रीकल्चर मार्केट के बारे में है, यह बिल किसानों को छूट देता है कि वो अपनी फसल जहां चाहें, वहां बेचें.
- दूसरा बिल कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के बारे में है. यह किसानों को छूट देता है कि वो एग्री-बिजनेस कंपनियों के साथ कॉन्ट्रैक्ट करके अपनी फसल उन्हें बेच सकें.
- तीसरा बिल है आवश्यक वस्तु अधिनियम यानी Essential Commodities Act, जिसमें अनाज, दालों, प्याज और आलू जैसी चीजों को आवश्यक वस्तु की श्रेणी से बाहर करने की बात है.

किसान बिल पर राजनीति क्यों? 
ये तीनों बिल लोक सभा में पास हो चुके हैं. अब इन्हें राज्य सभा में पेश किया जाना है. वहां से पास होने के बाद ये कानून की शक्ल ले लेंगे. कांग्रेस समेत लगभग पूरा विपक्ष और अकाली दल इसका विरोध कर रही है. अकाली दल की नेता हरसिमरत कौर का कहना है कि इससे पंजाब के किसानों के लिए नई समस्याएं पैदा हो जाएंगी.

किसानों से जुड़े बिल को लेकर NDA में फूट पड़ने से कांग्रेस खुश है. उसे लग रहा है कि इस मुद्दे पर सरकार को दबाव में लाया जा सकता है. राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि किसानों का विश्वास मोदी सरकार से उठ चुका है.

पैदावार तय करती है किसानों का भविष्य
भारत में खेती का बड़ा हिस्सा मॉनसून पर आधारित है. इसी कारण हमारे देश में खेती को जुआ कहा जाता है. आप कह सकते हैं कि किसान सबसे बड़े बाजीगर हैं क्योंकि फसलों की पैदावार ही उनका भविष्य तय करती है.

कोई किसान जब अपने खेत में फसल उगाता है तो उसकी पैदावार कई जगहों और लोगों से होते हुए आप तक पहुंचती है. ये चेन बहुत लंबी होती है और आढतिये यानी कमीशन एजेंट इस चेन की एक बहुत महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं. खास तौर पर छोटे किसान आढ़तियों के ही भरोसे होते हैं. क्योंकि किसान जब अपनी फसल लेकर मंडियों के पास पहुंचते हैं तो उनका पहला सामना आढ़ती से ही होता है. कई बार ये आढ़ती बिचौलिये का काम करने लगते हैं. वो किसानों की मदद के नाम पर उनको कम दाम पर अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर करने लगते हैं.

कई बार किसान मजबूरी में आकर इन आढ़ती से कर्ज भी ले लेते हैं. यहीं से वो जाल शुरू होता है जिससे बाहर आना किसानों के लिए कई बार नामुमकिन हो जाता है. ये आढ़ती राजनीतिक तौर पर बहुत मजबूत होते हैं. इसलिए किसान उनकी नाराजगी मोल लेने की स्थिति में नहीं होते हैं. कई बार जब किसान कर्ज लौटाने की स्थिति में नहीं होते हैं तो आढ़ती उनकी जमीन भी हड़प लेते हैं.

सत्ता के लिए किसान बिल का विरोध? 
2017 के चुनाव में पंजाब में अकाली दल का सबसे खराब प्रदर्शन हुआ था. 2022 के चुनाव में वो सत्ता में वापस आने की कोशिश में है. पंजाब में 60 हजार के करीब आढ़ती हैं और ये सभी राजनीतिक तौर पर बेहद मजबूत माने जाते हैं. ये बादल परिवार की राजनीतिक ताकत भी हिस्सा हैं. यही कारण है कि बादल परिवार अपने इस वोट बैंक के हितों की चिंता पहले कर रहा है. हम कह सकते हैं कि अकाली दल किसानों की राजनीति के नाम पर अपने वोट बैंक की राजनीति कर रहा है. बादल परिवार का वोट बैंक भले ही आढ़ती हों, लेकिन केंद्र में सरकार चला रही मोदी सरकार का वोट बैंक किसान हैं.

इसलिए वो मोदी सरकार अपनी पुरानी सहयोगी अकाली दल के साथ-साथ आढ़तियों की नाराजगी भी लेने को तैयार है. हालांकि मोदी सरकार के लिए किसानों को समझाना एक बड़ी चुनौती होगा. पंजाब के किसानों के बीच अभी इन तीनों को बिलों को लेकर कई तरह के सवाल हैं.

पूरी दुनिया की थाली तक भोजन पहुंचाने वाले किसान की थाली में छेद कौन करता है? इसकी एक लंबी कड़ी है, जिसमें बिचौलिए, थोक व्यापारी और रिटेलर शामिल होते हैं. लेकिन इसका खामियाजा किसान कैसे भुगत रहा है, अब आप ये समझिए.

खेतों में उगने वाले गेंहू, मक्का, बाजरा को आप बड़े स्टोर से भारी कीमत देकर खरीद रहे हैं. बड़ी दुकानों में इन्हें आप मल्टी ग्रेस फूड के नामों से खरीदते हैं. लेकिन किसान के हाथ उस कीमत का एक हिस्सा ही लगता है.

किसान को एक किलो गेहूं के बदले में औसतन 20 रुपए मिलते हैं. इसी गेहूं को होलसेल बाजार में 30 रुपए में बेचा जाता है. लेकिन पैक्ड आटे की शक्ल में आते ही इसकी कीमत 35 से 60 रुपए प्रति किलो हो जाती है. किसान जिस बाजरे को खेत में उगाते हैं उसकी एक किलो का उसे 17 रुपए मिलता है. उसी को थोक बाजार में 23 रुपए के हिसाब से बेचा जाता है. जबकि मार्केट में हेल्थ फूड की ब्रांडिंग के साथ वही बाजरा हमें 80 रुपए किलो में मिलता है.

इसी तरह ज्वार को किसान मंडी में 16 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेचता है. जबकि थोक व्यापारी इसे 30 रुपए में बेचते हैं. वहीं ज्वार डिपार्टमेंटल स्टोर में 120 रुपए किलो के भाव में बिक रही है. किसान जिस जौ को 10 रुपए में बेच देता है वो थोक बाजार में 24 रुपए किलो बिकती है. जबकि मार्केट में यही जौ आपको 120 रुपए किलो से कम पर नहीं मिलेगी.

राजनीति को प्रिय किसान
किसान राजनीति को हमेशा से प्रिय रहे हैं. लेकिन नेताओं ने किसानों को हमेशा वोटबैंक की तरह ही देखा है. इस देश में लाल बहादुर शास्त्री जैसे प्रधानमंत्री भी हुए जिन्होंने जवानों और किसानों का हित सबसे ऊपर रखा. वर्ष 1965 में लाल बहादुर शास्त्री ने 'जय जवान, जय किसान' का नारा दिया था. इस नारे के माध्यम से पहली बार किसानों को देश के नायक के तौर पर पहचान मिली.

उस दौरान कांग्रेस का चुनावी चिन्ह बैलों की एक जोड़ी थी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया का चुनाव चिह्न हंसिया था. उस वक्त भारत में ये दोनों सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियां थीं और ये चुनाव चिह्न दर्शाते हैं कि तब चुनावों में किसानों का कितना महत्व था.

पिछले कुछ वर्षों में किसानों का वोट लेने के लिए राजनीतिक दलों ने कर्जमाफी के चुनावी वायदे का इस्तेमाल किया है. लेकिन कभी भी किसानों की समस्याओं को जड़ से मिटाने की ईमानदार कोशिश नहीं हुई. बड़ी-बड़ी पार्टियों के नेताओं को अपने परिवार से फुर्सत ही नहीं मिली, ताकि वो किसानों की तकलीफ के बारे में भी थोड़ा सा सोच सकें. अब जब हर किसान को परिवार का हिस्सा बनाने की कोशिश हो रही है तो कुछ राजनीतिक परिवार और उनकी पार्टियां परेशान हो गई हैं.

इसके इतिहास को सम​झिए
संकट में कौन है? किसान या वो जो किसानों के नाम पर राजनीति करते हैं? इस बात को समझाने के लिए हम आपको इतिहास में ले जाना चाहेंगे.

- जब अंग्रेज भारत आए तो उन्होंने सबसे पहले एग्रिकल्चर मार्केटिंग बोर्ड का सिस्टम शुरू किया.

- इसके जरिए किसानों को मजबूर कर दिया गया कि वो मार्केटिंग बोर्ड में ही अपनी उपज को बेचें.

- मार्केटिंग बोर्ड बनाने के पीछे अंग्रेजों की चाल यह थी कि किसानों को जानबूझकर गरीब रखा जाए.

- देश आजाद होने के बाद इस बारे में किसी ने सोचा नहीं, बस मार्केटिंग बोर्ड का नाम बदलकर मंडी समिति हो गया.

- यह एक तरह का एकाधिकार यानी Monopoly है कि किसानों की उपज मंडी समिति ही खरीदेगी.

- इसी के कारण जो उपज किसानों से 2-4 रुपए किलो खरीदी जाती है, वही ग्राहकों तक पहुंचते-पहुंचते कई बार 100 गुना तक महंगी हो जाती है.

- मंडी समितियों में अक्सर राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों का ही दबदबा होता है. पंजाब में अधिकतर मंडियों पर आज भी अकाली दल का कब्जा है. यही स्थिति लगभग सभी राज्यों में है.

किसानों की आत्महत्या
आजादी के बाद से हमारे देश में सरकारों ने किसानों के नाम पर बहुत राजनीति की, लेकिन किसान गरीब के गरीब ही रहे. आज किसानों के मुद्दे पर जब भी बात आती है दो पार्टियों का नाम सबसे पहले आता है, पंजाब की अकाली दल और महाराष्ट्र में शरद पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी. इसके बावजूद आज किसानों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र पूरे देश में पहले स्थान पर है. पंजाब की स्थिति भी कुछ खास अच्छी नहीं है.

ऐसा नहीं है कि राजनीतिक दलों को नहीं पता है कि सरकारी मंडियों में किसानों के साथ क्या हो रहा है. आज भी वही नीति चल रही है जो अंग्रेजों के समय शुरू हुई थी. लेकिन नए भारत में ऐसी किसी नीति की छूट नहीं दी जा सकती. यह बात बिल्कुल सही है कि किसानों को पूरी तरह बाजार के भरोसे छोड़ देना भी समझदारी नहीं है. सरकार को इस बात के इंतजाम करने होंगे कि खुले बाजार के नाम पर किसानों के शोषण की कोई नई व्यवस्था न खड़ी हो जाए.

विधेयकों को लेकर कई तरह के भ्रम और सवाल
किसानों में मोदी सरकार के विधेयकों को लेकर कई तरह के भ्रम और सवाल हैं. यही कारण है कि कई राज्यों में किसानों के विरोध में प्रदर्शन भी शुरू हो चुके हैं. कई जगह किसानों को लग रहा है कि अगर ये कानून लागू हुआ तो न्यूनतम समर्थन मूल्य का सिस्टम समाप्त हो जाएगा और किसानों का अधिकार उनकी जमीनों से छिन जाएगा.

अब भारत के अन्नदाता के बारे में आपको 10 बड़ी बातें बताएंगे-

- वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक भारत में लगभग 52 प्रतिशत लोग कृषि से जुड़े हुए हैं.

इन 52 प्रतिशत किसानों की 365 दिनों की मेहनत के बाद भी GDP में कृषि का योगदान सिर्फ 17 से 18 प्रतिशत है.

वर्ष 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक किसानों की प्रति महीने औसत कमाई सिर्फ 6 हजार 400 रुपए है. यानी इनकी औसत सालाना कमाई सिर्फ 77 हज़ार रुपए है.

- भारत के 52 प्रतिशत किसानों पर औसत कर्ज का बोझ 1 लाख 4 हज़ार रुपए है। यानी किसानों की औसत सालाना कमाई से ज्यादा तो उन पर कर्ज है.

- सिर्फ वर्ष 2019 में 10 हज़ार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की थी और ज्यादातर किसानों की आत्महत्या की वजह उनपर कर्ज का बोझ था.

- हमने आपको बिचौलियों के बारे में अभी बताया है और अक्सर उनकी वजह से हमारे किसानों को किसी भी अनाज के बाज़ार मूल्य का सिर्फ 10 से 23 प्रतिशत ही मिलता है. यानी अगर आप बाजार में चावल की कोई किस्म 100 रुपए प्रति किलो खरीदते हैं तो किसान को अधिकतम 23 रुपए ही मिलते हैं.

- भारत एक कृषि प्रधान देश है. लेकिन दुनिया में कृषि उत्पादों के निर्यात में भारत का हिस्सा सिर्फ ढाई प्रतिशत है.

- एक सर्वे के मुताबिक भारत के गांवों में 72 प्रतिशत युवा कृषि से जुड़े हुए हैं, लेकिन उनमें से सिर्फ 1 प्रतिशत ही किसान बनना चाहते हैं. यानी देश का युवा भी अब किसान नहीं बनना चाहता है.

- देश के 76 प्रतिशत किसान कृषि के अलावा कोई और काम करना चाहते हैं. इसकी एक बड़ी वजह कमाई कम होना है।

- और अब आपको सबसे बड़ी बात बताते हैं. मौजूदा लोकसभा के 38 प्रतिशत सांसद किसान हैं. ये आश्चर्य की बात है कि भारत में हर तीन में से एक सांसद किसान है. इसके बाद भी यहां किसानों की स्थिति इतनी खराब है.