किसान आंदोलन: सरकार ने किसानों को भेजे प्रस्‍ताव, फिर भी क्‍यों है तनाव?
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किसान आंदोलन: सरकार ने किसानों को भेजे प्रस्‍ताव, फिर भी क्‍यों है तनाव?

किसानों की इन मांगों से ऐसा लगता है कि किसान संगठन किसी भी तरह इस आन्दोलन को समाप्त नहीं होने देना चाहते और यही बात आज आपको समझनी है. 

किसान आंदोलन: सरकार ने किसानों को भेजे प्रस्‍ताव, फिर भी क्‍यों है तनाव?

पॉडकास्ट सुनें-

नई दिल्ली: कृषि कानूनों के बाद केन्द्र सरकार ने किसानों की बाकी की कई शर्तें भी मान ली है. सरकार ने MSP पर एक कमेटी बनाने की घोषणा की है, आंदोलन के दौरान किसानों पर दर्ज हुए मुकदमे वापस लेने के लिए भी वो तैयार है. आंदोलन के दौरान जो किसान मारे गए थे, उन्हें मुआवजा देने को लेकर भी सरकार राजी हो गई. लेकिन इसके बावजूद किसान अब भी आंदोलन समाप्त करने के लिए तैयार नहीं है और किसानों ने अब नई शर्तें लगा दी हैं.

सरकार ने किसानों को भेजे प्रस्ताव

किसानों ने कहा है कि MSP के लिए बनी कमेटी में सिर्फ एक ही किसान संगठन यानी संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य होने चाहिए. कुल मिलाकर ये बात एक बार फिर से स्पष्ट हो गई है कि ये आंदोलन एक चुनावी आंदोलन है जिसका मकसद सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी का विरोध करना है. ये बात हम आपको शुरुआत से बता रहे हैं और इस पर आज खुद किसानों ने मुहर लगा दी है. सबसे पहले आपको केन्द्र सरकार के इस प्रस्ताव के बारे में बताते हैं, जो किसान संगठनों को भेजा गया है.

प्रस्ताव में केन्द्र सरकार ने फसलों के Minimum Support Price यानी MSP पर कानून बनाने के लिए एक कमेटी बनाने की बात कही है. इस कमेटी में केन्द्र और राज्य सरकारें, कृषि वैज्ञानिक और किसान संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे. पिछले एक साल में किसान आन्दोलन के दौरान जो आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं, उन्हें भी सरकार वापस लेने के लिए तैयार है. उत्तर प्रदेश और हरियाणा सरकार ने इसकी सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है और ये भी कहा है कि जैसे ही आन्दोलन समाप्त होगा, सारे मामले तत्काल वापस हो जाएंगे.

ज्यादातर मांगों पर सरकार राजी

इसके अलावा आन्दोलन के दौरान मारे गए किसानों को मुआवजा देने की मांग भी सरकार ने मान ली है. केन्द्र ने कहा है कि पंजाब सरकार पहले ही इसकी घोषणा कर चुकी है. अब हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सरकारें भी इसके लिए राजी हो गई हैं. Electricity Amendment Bill पर भी सरकार ने अपना रुख बदला है. उसने भरोसा दिलाया है कि वो इस बिल को संसद में पेश करने से पहले सभी किसानों संगठनों और इससे जुड़े लोगों की राय लेगी.

इसके अलावा पराली के मुद्दे पर केन्द्र सरकार ने जो कानून पारित किया है, इसमें धारा 14 और 15 में आपराधिक जवाबदेही से किसानों को अलग कर दिया गया है. यानी पराली जलाने पर किसानों पर कोई मुकदमा दर्ज नहीं होगा.

कुल मिलाकर कृषि कानूनों की वापसी के बाद केन्द्र सरकार ने लगभग वो सारी बातें मान ली हैं, जो किसानों की तरफ से रखी गई थीं. लेकिन सोचिए इसके बावजूद ये आन्दोलन अब भी जारी है और शायद ये इसी तरह से चलता रहेगा.

किसानों ने सरकार के सामने रखीं शर्तें

आज केन्द्र सरकार के इस प्रस्ताव पर चर्चा के लिए सिंघु बॉर्डर पर संयुक्त किसान मोर्चा की एक लम्बी बैठक हुई. इस बैठक को लेकर ये उम्मीद थी कि इसमें आन्दोलन समाप्ति का ऐलान हो सकता है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. संयुक्त किसान मोर्चा ने खुद केन्द्र सरकार के इस प्रस्ताव को मीडिया में रखते हुए ये बताया कि उसकी अभी कुछ और मांगें हैं, जिन्हें अगर नहीं माना गया तो ये आन्दोलन ऐसे ही चलता रहेगा. ये शर्तें क्या हैं, वो भी हम आपको बताते हैं.

किसानों की शर्त है कि MSP पर जो कमेटी बनेगी, उसमें केवल संयुक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए. आन्दोलन वापसी से पहले किसानों पर दर्ज आपराधिक मुकदमे समाप्त किए जाएं. आन्दोलन में मारे गए प्रत्येक किसान के परिवार को मुआवजे में 5 लाख रुपये और एक सरकारी नौकरी मिलनी चाहिए. Electricity Amendment Bill को संसद में पेश ही ना किया जाए और पराली जलाने पर किसी भी स्थिति में किसानों पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, इसका भरोसा भी किसानों ने मांगा है.

आंदोलन खत्म नहीं करना चाहते किसान

इन मांगों से ऐसा लगता है कि किसान संगठन किसी भी तरह इस आन्दोलन को समाप्त नहीं होने देना चाहते और यही बात आज आपको समझनी है. आज राहुल गांधी ने भी इस आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों के परिवार वालों को मुआवजा देने का मुद्दा लोक सभा में उठाया. राहुल गांधी ने कहा कि कृषि मंत्री ने किसान आंदोलन में मारे गए किसानों का डेटा नहीं होने की बात कही थी. लेकिन उनके पास उन सभी किसानों की लिस्ट है, जो आन्दोलन में मारे गए हैं.

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