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'बागी' नेता जॉर्ज फर्नांडिस की जंजीरों में जकड़ी वह तस्‍वीर, जो इमरजेंसी की याद दिलाती है...

जब भी आपातकाल के क्रूर दौर का जिक्र होगा, उस दमन के विरोध के प्रतीकस्‍वरूप 'बागी' नेता जॉर्ज फर्नांडिज की उस तस्‍वीर का भी जिक्र होगा.

'बागी' नेता जॉर्ज फर्नांडिस की जंजीरों में जकड़ी वह तस्‍वीर, जो इमरजेंसी की याद दिलाती है...
जॉर्ज फर्नांडिस को ‘अनथक विद्रोही’ (रिबेल विद्आउट ए पॉज़) कहा जाता है. जंजीरों में जकड़ी उनकी तस्वीर इमरजेंसी की पूरी कहानी बयां करती है. (फाइल फोटो)

नई दिल्‍ली: ट्रेड यूनियन लीडर के रूप में सियासी करियर शुरू करने वाले धुर समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस का भले ही निधन हो गया हो लेकिन आजादी के बाद लोकतंत्र पर धब्‍बा माने जाने वाले इमरजेंसी के दौर की उनकी बेडि़यों से जकड़ी तस्‍वीर लोगों के जेहन में अभी भी पैबस्‍त है. जब भी आपातकाल के क्रूर दौर का जिक्र होगा, उस दमन के विरोध के प्रतीकस्‍वरूप 'बागी' नेता जॉर्ज फर्नांडिज की उस तस्‍वीर का भी जिक्र होगा. संभवतया इसी कारण करिश्‍माई नेता जॉर्ज को विद्रोही तेवर का नेता कहा गया.

लालकृष्‍ण आडवाणी ने पिछले साल एक कार्यक्रम में जॉर्ज फर्नांडिस को 'बागी' नेता (Rebel Leader) कहा. आडवाणी ने कहा कि देश की तरक्‍की और विकास के लिए ऐसे नेताओं की जरूरत होती है. आडवाणी ने कहा, ''यदि विद्रोह नहीं होते तो देश को आजादी भी नहीं मिलती. जॉर्ज जैसे बागी नेताओं को आते रहना होगा ताकि देश तरक्‍की और विकास कर सके.'' आडवाणी ने कहा था, 'नई पीढ़ी के लोगों को शायद ही समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस याद होंगे. वही जॉर्ज फर्नांडिस जिनकी एक आवाज पर हजारों गरीब-गुरुबा एकत्र हो जाते थे. इमरजेंसी के दौरान जॉर्ज ने इंदिरा गांधी और संजय गांधी के नाक में दम कर रखा था.'

वाजपेयी सरकार में रक्षामंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडिस का लंबी बीमारी के बाद निधन

इमरजेंसी
1971 के आम चुनाव में 'गरीबी हटाओ' के नारे के साथ प्रचंड बहुमत (518 में से 352 सीटें) हासिल करने वाली इंदिरा गांधी ने जब उसी साल के अंत में पाकिस्‍तान को युद्ध में शिकस्‍त दी और बांग्‍लादेश दुनिया के नक्‍शे पर आया तो किसी दौर में 'गूंगी गुडि़या' कही जाने वाली इंदिरा गांधी को 'मां दुर्गा' कहा गया. उनको 'आयरन लेडी' कहा गया. उसी साल उनको भारत रत्‍न से भी नवाजा गया. लेकिन अगले कुछ वर्षों के भीतर ही इंदिरा गांधी की सत्‍ता का इकबाल जाता रहा. लिहाजा 25-26 जून, 1975 की आधी रात को देश में आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा कर दी गई.


25-26 जून, 1975 की मध्‍य रात्रि को देश में आपातकाल लगा दिया गया और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे विपक्षी नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया. (फाइल फोटो)

तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन 'आंतरिक अशांति' के तहत देश में आपातकाल की घोषणा कर दी. 26 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 तक की 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल था. स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह अब तक का सबसे विवादित दौर माना जाता है. आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए थे. आपातकाल में लोगों के मूल अधिकार ही निलंबित नहीं किए गए, बल्कि उन्‍हें जीवन के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया? बड़ा सवाल उठता है कि लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकार ने लोकतंत्र को संवैधानिक तानाशाही में क्‍यों तब्‍दील कर दिया?

इंदिरा गांधी ने भारत में इमरजेंसी क्‍यों लगाई?

किन घटनाओं ने बदला माहौल
1971 के बाद से ही सियासत में इंदिरा युग के आगाज के साथ ही उनकी पर्सनालिटी कल्‍ट बनाने की शुरुआत हुई. उसी कड़ी में इंदिरा सरकार, न्‍यायपालिका और प्रेस पर नियंत्रण की कोशिश में भी लग गई. 1967 में गोलकनाथ केस में सुप्रीम कोर्ट ने व्‍यवस्‍‍था देते हुए कहा कि संविधान के बुनियादी तत्‍वों में संशोधन का अधिकार संसद के पास नहीं है. इस फैसले को बदलवाने के लिए 1971 में 24वां संविधान संशोधन पेश किया गया.

दिरा गांधी के नेतृत्‍व में सरकार की यह कोशिश भी उस वक्‍त विफल हो गई जब केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 7-6 बहुमत के आधार पर 1973 में फैसला दिया कि संविधान की मूल भावना के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती. न्‍यायपालिका के साथ कार्यपालिका का विवाद इस हद तक बढ़ गया कि एक जूनियर जज को कई वरिष्‍ठ जजों पर तरजीह देते हुए चीफ जस्टिस बना दिया गया. नतीजतन कई सीनियर जजों ने इस्‍तीफा दे दिया.


इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनावों में धांधली करने का दोषी ठहराया था (फाइल फोटो)

छात्र आंदोलन
1973 में अहमदाबाद में एलडी इंजीनियरिंग कॉलेज में हॉस्‍टल मेस के शुल्‍क में बढ़ोतरी के बाद छात्रों ने आंदोलन शुरू कर दिया. राज्‍य के शिक्षा मंत्री के खिलाफ शुरू हुए इस नव निर्माण आंदोलन ने बाद में भ्रष्‍टाचार और आर्थिक संकट के खिलाफ उग्र रूप धारण किया और इसका नतीजा यह हुआ कि मुख्‍यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्‍तीफा देना पड़ा और राज्‍य में राष्‍ट्रपति लगाना पड़ा.

इसी तरह उसी दौर में बिहार छात्र संघर्ष समिति के आंदोलन को गांधीवादी समाजवादी चिंतक जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने समर्थन दिया. 1974 में जेपी ने छात्रों, किसानों और लेबर यूनियनों से अपील करते हुए कहा कि वे अहिंसक तरीके से भारतीय समाज को बदलने में अहम भूमिका निभाएं. इन सब वजहों से इंदिरा गांधी की राष्‍ट्रीय स्‍तर पर छवि प्रभावित हुई.


जपप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया.(फाइल फोटो)

राज नारायण केस
समाजवादी नेता राज नारायण ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में इंदिरा गांधी के लोकसभा चुनाव (1971) में जीत को चुनौती दी. इंदिरा गांधी ने 1971 के चुनाव में राज नारायण को रायबरेली से हराया था. राज नारायण ने आरोप लगाया कि चुनावी फ्रॉड और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के चलते इंदिरा गांधी ने वह चुनाव जीता. इस पर 12 जून, 1975 को फैसला देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्‍हा ने इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध ठहरा दिया. इंदिरा गांधी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. 24 जून, 1975 को जस्टिस वीके कृष्‍णा अय्यर ने इस फैसले को सही ठहराते हुए सांसद के रूप में इंदिरा गांधी को मिलने वाली सभी सुविधाओं पर रोक लगा दी. उनको संसद में वोट देने से रोक दिया गया. हालांकि उनको प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की छूट दी गई.

'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है'
25 जून, 1975 को दिल्‍ली के रामलीला मैदान में जेपी ने इंदिरा गांधी के पद नहीं छोड़ने की स्थिति में उनके खिलाफ अनिश्चितकालीन देशव्‍यापी आंदोलन का आह्वान करते हुए रामधारी सिंह दिनकर की मशहूर कविता की पंक्तियों को दोहराया-'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है.' उसी रात 'आंतरिक अशांति' का हवाला देते हुए देश में आपातकाल की घोषणा कर दी.