'हजार चौरासी की मां' पर GOOGLE का खास DOODLE

महाश्वेता देवी बांग्ला लेखिका और उपन्यासकार थी, उनका जन्म 1926 में ढाका में हुआ था. 1936 से 1938 के बीच उन्होंने शांतिनिकेतन में पढ़ाई की. 

'हजार चौरासी की मां' पर GOOGLE का खास DOODLE
बांग्ला लेखिका और साहित्यकार महाश्वेता देवी को गूगल ने डूडल के जरिए किया याद

नई दिल्लीः वर्ष 1998 फिल्म 'हजार चौरासी की मां' से लोगों के दिलों में जगह बनाने वाली महाश्वेता देवी का आज 92वां जन्मदिन हैं. महाश्वेता देवी के जन्मदिन पर गूगल ने उनके याद करते हुए एक खास डूडल बनाया है. महाश्वेता देवी बांग्ला लेखिका और उपन्यासकार थी, उनका जन्म 1926 में ढाका में हुआ था. 1936 से 1938 के बीच उन्होंने शांति निकेतन में पढ़ाई की. उन्होंने बीए और एमए इंग्लिश विषय में किया. 

पिता से मिली प्रेरणा
ऐसा माना जाता है कि बच्चों की परवरिश में उनके माता-पिता की मेहनत नजर आती हैं. महाश्वेता देवी को लिखने की कला उनके पिता मनीष घटक से मिली थी. अपने जमाने में मनीष घटक एक जाने माने कवि और उपन्याकार थे. उन्होंने कल्लोल आंदोलन में भी अपना योगदान दिया. पिता के रास्तों पर चलते हुए महाश्वेता देवी ने ना सिर्फ लेखन में परांगता हासिल की, बल्कि आदिवासियों को उनका अधिकार दिलाने के लिए कई कार्यक्रमों में हिस्सा लिया. 

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साहित्य और फिल्म का सफर
महाश्वेता देवी का जितना नाम साहित्य क्षेत्र में हैं उतना ही नाम फिल्मी दुनिया में भी हैं. उनकी कहानियों पर कई सारी फिल्में बनीं, जिन्होंने लोगों के दिलों में जगह बनाई. साहित्य और फिल्मों में महाश्वेता देवी के योगदान के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और रेमन मेगसायसायर पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है.

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महाश्वेता देवी की कुछ यादगार फिल्में
संघर्ष (1968):
महाश्वेता देवी की कहानी ‘लायली असमानेर आयना’ पर आधारित फिल्म संघर्ष की कहानी को फिल्मी पर्दे पर बड़ी कामयाबी मिली थीं. दिलीप कुमार और वैजयंती माला पर फिल्माया गया “मेरे पैरों में घुंघरू पहना दो...” गाना उस जमान में काफी लोकप्रिय हुआ था.

रूदाली (1993): राजस्थान में रोने वाली महिलाओं की स्थित पर आधारित फिल्म में डिंपल कपाड़िया मुख्य किरदार में नजर आईं थी. इस फिल्म के अभिनय के लिए डिंपल को नेशनल पुरस्कार से नवाजा गया, जिसका श्रेय महाश्वेता देवी को ही जाता है.

हजार चौरासी की मां (1998): महाश्वेता देवी के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म की कहानी वर्ष 1970 के नक्सली आंदोलन पर आधारित थी. यह फिल्म आज भी लोगों के दिलों के दिमाग पर छाई हुई है. इस फिल्म के लिए महाश्वेता देवी को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

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