चर्चा के लिए संसदीय समितियों को क्यों नहीं भेजे जा रहे बिल? सरकार ने दिया ये जवाब
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चर्चा के लिए संसदीय समितियों को क्यों नहीं भेजे जा रहे बिल? सरकार ने दिया ये जवाब

मोदी सरकार पर तीनों किसान कानूनों की वापसी के लिए लाए गए बिल को बिना संसदीय समितियों (Parliamentary Committees) को भेजे पास कराने के आरोप लग रहे हैं. सरकार ने इस बारे में आंकड़ों के साथ विपक्ष को जवाब दिया है. 

चर्चा के लिए संसदीय समितियों को क्यों नहीं भेजे जा रहे बिल? सरकार ने दिया ये जवाब

नई दिल्ली: भारत की संसदीय प्रणाली में सत्ता और विपक्ष के बीच किसी भी बिल को संसदीय समितियों (Parliamentary Committees) में भेजे जाने को लेकर अक्सर आरोप- प्रत्यारोप लगते रहे हैं. विपक्ष अक्सर लगभग सभी बिलों को संसद के दोनों सदनों में पारित होने से पहले, संसदीय समितियों को भेजे जाने की मांग करता है. जबकि सरकार का मानना रहता है कि उस पर सदन के अंदर ही चर्चा हो जाए.

अब ऐसे ही आरोप पीएम मोदी सरकार के ऊपर भी लग रहे हैं. हालांकि सरकार ने आंकड़ों के जरिए बताने की कोशिश की है कि इस तरह के आरोप गलत हैं. सरकार का कहना है कि संसदीय समितियों (Parliamentary Committees) को बिल भेजा जाना लोकतंत्र मापने का पैमाना नहीं हो सकता. 

1993 में हुआ संसदीय समितियों का गठन

सरकार का कहना है कि संसदीय समितियों का गठन 1993 में हुआ था. यानी उसके पहले के 41 सालों तक जो बिल, बिना संसदीय समितियों की चर्चा के, संसद में रखे जाते थे, क्या वे सही नहीं थे? बता दें कि पहली लोकसभा का पहला सत्र 17 अप्रैल 1952 को हुआ था.

सरकार का ये भी कहना है कि क्या इसका मतलब ये है कि देश में 41 वर्षों तक लोकतंत्र नहीं था? क्या पंडित नेहरु, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के समय बनाए गए कानून गलत थे? बाबा साहब आंबेडकर का बनाया गया संविधान भी तो, सेलेक्ट कमेटी को नहीं भेजा गया था?

जहां 2004-2009 के बीच 60 प्रतिशत बिल संसदीय समितियों (Parliamentary Committees) के पास भेजे गए. वहीं 2009-2014 में 71 प्रतिशत बिल संसदीय समितियों को भेजे गए. आरोप है कि  मोदी सरकार आने के बाद से यह संख्या तेजी से गिरी है. हालांकि आंकड़े कुछ और ही कहते हैं. 

सरकार ने सामने रखा लेखा-जोखा

आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2014- 2019 में केवल 27 प्रतिशत बिल संसदीय समितियों (Parliamentary Committees) के पास भेजे गए. जबकि 2019 के बाद से अभी तक केवल 12 प्रतिशत बिल संसदीय समितियों के पास गए हैं.  2014-19 के बीच राज्य सभा में केवल 18 नए विधेयक लाए गए और इनमें से 11 बिल यानी 61 प्रतिशत बिल राज्य सभा की समितियों को भेजे गए. जबकि 5 बिल यानी 28 प्रतिशत बिल लोक सभा की स्थाई समितियों को भेजे गए. यूपीए-1 में 2004-09 के दरम्यान राज्य सभा में 100 नए बिल रखे गए और इनमें से 48 बिल यानी 48 प्रतिशत राज्य सभा की स्थाई समिति को भेजे गए. जबकि 30 बिल यानी 30 प्रतिशत लोक सभा की स्थाई समिति को भेजे गए.

यूपीए- 2 में 2009-14 के दरम्यान 78 नए बिल राज्य सभा में रखे गए. इनमें से 40 बिल यानी 51 प्रतिशत राज्य सभा की और 21 बिल यानी 27 प्रतिशत लोक सभा की स्थाई समिति को भेजे गए. यह सही है कि ये समितियां (Parliamentary Committees) संसद का हिस्सा हैं. इनको मिनी पार्लियामेंट भी कहा जाता है. लेकिन वे किसी बिल को पारित नहीं कर सकती. वे केवल सिफारिश कर सकती है. संसद सर्वोच्च है. सारे कानून संसद से ही पारित होते हैं. वैसे भी सारे बिल संसदीय समितियों को नहीं भेजे जाते. उदाहरण के लिए बिलों की जगह लाए जाने वाले अध्यादेश, मनी बिल और महत्वपूर्ण संवैधानिक बिल इन समितियों को नहीं भेजे जाते.

'2014 से पहले कमजोर सरकारें थीं'

सरकार का कहना है कि 2014 के पहले 25 वर्षों तक केंद्र में बनी सरकारें कमजोर थीं. उस वक्त ज्यादातर गठबंधन की सरकारें थीं. इसलिए आम राय के अभाव में सत्तारूढ़ दल के भीतर ही अलग अलग विचारों और मतभेद के कारण बिलों को संसदीय समितियों को भेजा जाना जरूरी था. लेकिन 2014 के बाद से सत्तारूढ़ दल को पूर्ण बहुमत है. इसलिए जब कोई बिल चर्चा के लिए आता है तो बहुसंख्यक सदस्यों में आम राय होती है. इसलिए इन्हें संसद की स्थाई समितियों (Parliamentary Committees) को भेजने की गुंजाइश कम रह जाती है. यानी संसदीय समितियों को बिल पर चर्चा करने के लिए भेजे जाने को लेकर आगे भी रस्साकसी जारी रहेगी.

संसद में 3 किसान कानून को वापस लेने वाले बिल को चंद मिनटों में पास कराए जाने के आरोप पर कहा गया है कि इसके पहले भी बहुत कम समय मे बिल पारित हुए हैं. उसके कुछ उदाहरण भी दिए गए है. 2014 से पहले 1 घंटे से भी कम समय में पारित हुए बिल इस प्रकार हैं:

'यूपीए सरकार में कम समय में पारित हुए बिल'

यूपीए के समय 'The Union Duties of Excise (Electricity) Distribution Repeal Bill, 2006' केवल 12 मिनट में पास हो गया था. उसी तरह से यूपीए के समय ही 'The Punjab General Sales Tax (As in force in the Union Territory of Chandigarh) Repeal Bill, 2005' भी  मात्र 36 मिनट में पारित हो गया.

संसद में The Special Tribunals (Supplementary Provisions) Repeal Bill, 2004 केवल 18 मिनट में पास हो गया था. The Customs and Central Excise Laws (Repeal) Bill, 2004 मात्र 8 मिनट में पास कर दिया गया था. The Mysore State Legislature (Delegation and Powers) Repeal Bill, 2002 को पारित कराने में केवल 9 मिनट का समय लगा था.

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इसी तरह The Imperial Library (Indentures Validation) Repeal Bill, 2002 भी केवल  14 मिनट में पास करा लिया गया था. जबकि The Refugee Relief Taxes (Abolition) Repeal Bill, 2002 को पारित होने में भी मात्र 9 मिनट लगे थे. इसलिए  सरकार का कहना है कि किसान बिल के निरस्तीकरण पर मचाई जा रही हाय तौबा केवल सियासी है और इसका किसान हित से कोई लेना-देना नहीं है.

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