नक्सलियों के साथ मुठभेड़ से ज्यादा बीमारियों से मरते हैं CRPF जवान

देश के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ के कर्मियों के कामकाज की स्थिति पर तैयार की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले पांच सालों में नक्सलियों और उग्रवादियों से हुई मुठभेड़ में बल के जितने जवान मरे हैं, उससे कहीं ज्यादा जवान दिल का दौरा पड़ने, मलेरिया या किसी अन्य बीमारी की चपेट में आने और खुदकुशी करने से मरे ।

नई दिल्ली : देश के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ के कर्मियों के कामकाज की स्थिति पर तैयार की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले पांच सालों में नक्सलियों और उग्रवादियों से हुई मुठभेड़ में बल के जितने जवान मरे हैं, उससे कहीं ज्यादा जवान दिल का दौरा पड़ने, मलेरिया या किसी अन्य बीमारी की चपेट में आने और खुदकुशी करने से मरे ।

साल 2009 से 2014 के बीच सीआरपीएफ कर्मियों को जिन बीमारियों ने सबसे ज्यादा अपनी चपेट में लिया उनमें दिल का दौरा पड़ना और हृदय रोग शामिल हैं । इस अवधि में दिल का दौरा पड़ने और हृदय रोग की चपेट में आने से 600 से ज्यादा पुरूष एवं महिला कर्मियों की मृत्यु हुई । सीआरपीएफ की कार्यप्रणाली से जुड़े मुद्दों एवं चुनौतियों को सामने लाने के लिए तैयार की गई रिपोर्ट में कहा गया है बल की कड़ी और प्रतिकूल कार्य स्थितियों की वजह से सीआरपीएफ अधिकारियों एवं कर्मियों की शारीरिक एवं मानसिक अवस्था पर बुरा असर पड़ा है ।

साल 2009 से 2014 के दौरान बीमारियों और अभियानों से अलग कामों के कारण बल के 2,900 से ज्यादा कर्मियों की मृत्यु हुई, जबकि इसी अवधि में सुरक्षा संबंधी कर्तव्यों को अंजाम देते हुए 252 कर्मी मारे गए । इस अवधि में सीआरपीएफ कर्मियों के बीच खुदकुशी के 207 मामले, कैंसर के 231 मामले, मलेरिया के 102 मामले और एचआईवी-एड्स के 153 मामले सामने आए । यह वही अवधि है जब बल ने देश के विभिन्न नक्सल प्रभावित राज्यों में सबसे ज्यादा अभियान चलाए हैं । साल 2009 से 2014 के दौरान दिल का दौरा पड़ने और हृदय रोग से मृत्यु के कुल 614 मामले सामने आए, जिससे ये सीआरपीएफ के लिए सबसे बड़ी मेडिकल चुनौती के तौर पर सामने आए हैं ।

 

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