BJP National Working President News: बिहार में बीजेपी कोटे से सड़क निर्माण मंत्री नितिन नबीन पार्टी के नए कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं. लोग हैरान हैं कि पार्टी में दिग्गज नेताओं के रहते लो प्रोफाइल नितिन ने यह बाजी कैसे मार ली.
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How Nitin Nabin became Working National President of BJP: जेपी नड्डा के मोदी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बनने के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए चल रही बीजेपी की खोज आज पूरी हो गई. पार्टी ने चौंकाने वाली घोषणा करते हुए बिहार सरकार में बीजेपी कोटे से मंत्री नितिन नबीन के नाम का ऐलान कर दिया. उन्हें फिलहाल कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है. लेकिन माना जा रहा है कि आगे चलकर उन्हें पूर्णकालिक अध्यक्ष के रूप में प्रमोट कर दिया जाएगा.
राजनीतिक हलकों में नितिन नबीन का नाम कोई खास चर्चित नहीं थ. इसलिए जैसे ही उनके नाम का ऐलान हुआ, लोग हैरान रह गए. उन्हें आश्चर्य इस बात का था कि पार्टी के तमाम कद्दावर और नामचीन नेताओं की फौज होते हुए आखिर एक लो प्रोफाइल नेता इस पद तक पहुंचने में कैसे कामयाब रहा. लेकिन ऐसा नहीं है कि यह सब एकाएक हुआ. इसके पीछे तमाम कारण थे, जिन्होंने नितिन नवीन बीजेपी का मुखिया की कुर्सी दिलाने में बड़ा योगदान दिया. आइए जानते हैं कि नितिन नबीन को बीजेपी कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के संभावित कारण क्या रहे.
नबीन के चयन से व्यापक संदेश
पार्टी ने इस नियुक्ति से संदेश दिया है कि कोई कार्यकर्ता या सामान्य चेहरा भी भाजपा का कार्यकारी अध्यक्ष हो सकता है. पार्टी सबका ख्याल रखती है. मप्र के मुख्यमंत्री मोहन यादव, राजस्थान के भजनलाल, छत्तीसगढ़ के विष्णु साय, ओडिशा के मोहन चरण मांझी जैसे लो प्रोफाइल चेहरों को पार्टी ने मुख्यमंत्री जैसे पद देकर यह संदेश दिया है कि पार्टी हर कार्यकर्ता का ध्यान रखती है. जरूरत के समय उन्हें नवाजने से पीछे नहीं हटती है. पार्टी के इस कदम से अखिल भारतीय स्तर पर कार्यकर्ताओं को मोटिवेट करने में बहुत मदद मिलेगी. साथ ही दूसरी पार्टियों के कल्चर पर आक्रमण करने में तेजी आएगी जहां बड़े नेता या उनके संबंधी ही बड़े पदों को प्राप्त कर पाते हैं. वहां कार्यकर्ताओं की ज्यादा हैसियत नहीं होती.
इस नियुक्ति को बिहार में पार्टी को मजबूती देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. भाजपा राज्य में अपने बल पर सरकार बनाने का सपना सजाकर रखे है. इस नजरिये से भी आगे इस नियुक्ति का बड़ा महत्व है. साथ ही युवा शक्ति को लीडरशिप में जगह देने की पार्टी की कवायद के तहत भी इस नियुक्ति के अपने मायने हैं. युवा चेहरों को आगे लाने और उन्हें बड़ी भूमिकाएं देने की बात देश की बड़ी युवा आबादी को अपने साथ जोड़ने की बड़ी मुहिम का भी हिस्सा हो सकती है. पिछले चुनावों में युवाओं ने बड़ी संख्या में पार्टी के पक्ष में मतदान किया था. अब पार्टी इसी नए वोटबैंक को अपने साथ जोड़ने के लिए कई तरह की कवायद कर रही है.
परंपरागत वोट बैंक सवर्णों को को साधने की कवायद
भाजपा का यह फैसला न सिर्फ पार्टी के परंपरागत वोट बैंक सवर्णों को साधने की दिशा में बड़ा कदम है. सवर्ण भाजपा को लगातार अपना सपोर्ट देते आए हैं, इस वर्ग को इस नियुक्ति से यह संदेश दिया जा सकता है कि हम आपको भूले नहीं हैं. आपका शुक्रराना किया जा रहा है. इसके अलावा इस नियुक्ति से बंगाल के प्रभावशाली कायस्थ समुदाय को भी अपने पाले में लाने की कोशिश भी माना जा सकता है. नबीन कायस्थ समुदाय से आते हैं. वे इस समुदाय को भाजपा से जोड़ने का काम कर सकते हैं. यह समुदाय बंगाल में पारंपरिक रूप से ममता का समर्थक रहा है. बिहार और बंगाल के कायस्थ समाज के बीच सांस्कृतिक, वैचारिक और पारिवारिक रिश्ते रहे हैं. भाजपा यदि किसी कायस्थ चेहरे को राष्ट्रीय भूमिका देती है तो उसका सांकेतिक असर बंगाल तक जाना स्वाभाविक है.
ज्योति बसु से लेकर विधानचंद्र राय तक पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक सत्ता में रहे मुख्यमंत्रियों का संबंध कायस्थ वर्ग से रहा है. बिहार–बंगाल की भौगोलिक और सामाजिक नजदीकी इस रणनीति को और मजबूत बनाती है. बंगाल का भद्रलोक और बौद्धिक वर्ग परंपरागत रूप से कायस्थ समुदाय से जुड़ा रहा है. इसके सबसे बड़े चेहरे के रूप में विवेकानंद और सुभाष चंद बोस का नाम लिया जा सकता है. नितिन नबीन की नियुक्ति से भाजपा को कायस्थ समुदाय को जातिगत और सांस्कृतिक संकेत देने का मौका मिलेगा.
शाह से करीबी भी बड़ा कारण
नबीन की नियुक्ति का एक कारण अमित शाह से उनकी करीबी को भी माना जा सकता है. चूंकि संगठन में अमित शाह का बहुत दखल होता है तो नबीन की नियुक्ति से संगठन औऱ सरकार का कॉर्डिनेशन बहुत सहज हो जाएगा. रणनीतिक कामों और फैसलों में तेजी आएगी. उनके पक्ष में एक औ प्लस पॉइंट है उनका काफी लो प्रोफाइल नेता होना. इस खासियत की वजह से वे कार्यकर्ताओं के साथ भी सहज संबंध बना पाएंगे. भाजपा जैसी पार्टी हमेशा से ही हाइकमांड कल्चर के खिलाफ रही है तो उस भूमिका में भी नबीन आसानी फिट हो रहे हैं.
भाजपा की नई सोशल इंजीनियरिंग
भाजपा अब सिर्फ़ हिंदुत्व पर ही काम नहीं करती है बल्कि जाति-क्षेत्र और वहां किस तरह का परसेप्शन बनाया जाए. इस समीकरण पर काम कर रही है. चूंकि भाजपा पर आरोप लगता रहता है कि वह सिर्फ नार्थ इंडिया यानी कि हिन्दी हार्टलैंड की पार्टी है. पार्टी इस पर्सेप्शन को तोड़ने के लिए लिए लगातार काम कर रही है. बिहार से भाजपा के नए कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने से यह संदेश भी जाएगा कि पार्टी केवल उत्तर भारत तक ही सीमित नहीं है. नबीन कायस्थ जाति से आते हैं तो इस कदम से पार्टी को बंगाल-असम की कायस्थ जाति में सेंध लगाने का मौका मिलेगा. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह नियुक्ति भाजपा की पूर्वोत्तर भारत के लिए बनाई जा रही स्ट्रैटेजी का हिस्सा है, जिसमें पूरे रीजन को साधने के लिए किसी कॉमन फैक्टर पर काम किया जाता है.
इस नियुक्ति से भाजपा बिहार और बंगाल दोनों को एक ही नैरेटिव के माध्यम से जोड़ा गया है. यानी एक ही तीर से बंगाल-असम की कायस्थ जाति, क्षेत्र के पाइंट ऑफ व्यू से दोनों राज्यों के लिए कॉमन नैरेटिव औऱ नार्थ की पार्टी वाले पर्सेप्शन को भेदने का काम किया गया है. छत्तीसगढ़ चुनावों के दौरान नबीन अपनी संगठन संयोजन की क्षमता का लोहा मनवा चुके हैं. जहां पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस की एकतरफा जीत की बात की जा रही थी. उन्होंने ग्रासरूट लेवल पर कार्यकर्ता को मोबलाइज करके करके चुपचाप एक ऐतिहासिक जीत भाजपा के पाले में डाली थी. पार्टी को उनसे यही उम्मीद बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों को लेकर भी है. नबीन को पूर्वोत्तर का भी काफी अनुभव है वे सिक्कम में भी काम कर चुके हैं.
ममता के मुकाबले एक सॉफ्ट चेहरा
नितिन नबीन की नियुक्ति भाजपा की पश्चिम बंगाल के लिए बनाई गई स्ट्रेटजी का एक अहम हिस्सा भी माना जा सकता है. यह नियुक्ति तृणमूल के पारंपरिक सामाजिक आधार में सेंध लगाने की कोशिश के रूप में देखी जा सकती है. नबीन का भद्र और शालीन चेहरा वहां ममता जैसी आक्रमक नेता के खिलाफ भी चुनाव प्रचार के दौरान एक भद्र विकल्प पेश कर सकता है. चूंकि बंगाल में भाजपा की सबसे बड़ी समस्या रही है, आक्रामक राजनीति का अभाव, बाहरी पार्टी की छवि होना, ममता बनर्जी जैसा कोई बड़ा और स्वीकार्य चेहरा नहीं होना. इस समस्या से निजात पाने के लिए वे नबीन के रूप में एक सॉफ्ट-स्पोकन, लंबे प्रशासनिक अनुभव वाले, लो-प्रोफाइल लेकिन कुशल संगठक नेता को ममता के राज्य में सेंध लगाने की जिम्मेदारी दी जा सकती है.