क्या आपको पता है कोरोना के इलाज में हो रहा है कौन सी दवाइयों का इस्तेमाल?

हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन, इस दवा का नाम आपने आजकल खबरों में रोजाना सुना होगा, लेकिन यह सिर्फ एक दवा नहीं है जो कोरोनावायरस के मरीजों के इलाज के तौर पर इस्तेमाल की जा रही है. 

क्या आपको पता है कोरोना के इलाज में हो रहा है कौन सी दवाइयों का इस्तेमाल?
हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन ऑटोइम्यून डिसऑर्डर जैसे कि रूमेटाइड अर्थराइटिस और lupus के इलाज में इस्तेमाल की जाती है.

 नई दिल्ली: वह कौन सी दवा है जिससे भारत में कोरोना वायरस (Coronavirus) के गंभीर मरीज भी ठीक हो रहे हैं.

हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन !!

इस दवा का नाम आपने आजकल खबरों में रोजाना सुना होगा, लेकिन यह सिर्फ एक दवा नहीं है जो कोरोना वायरस के मरीजों के इलाज के तौर पर इस्तेमाल की जा रही है. यह दवा दरअसल ऑटोइम्यून डिसऑर्डर जैसे कि रूमेटाइड अर्थराइटिस और lupus के इलाज में इस्तेमाल की जाती है.

दूसरी दवा- इसका नाम है क्लोरोक्वीन!! यह दवा मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल की जाती है.

अब आपको यह भी बता दें कि अमेरिका और ब्राजील इस दवा के लिए भारत जैसे देश पर क्यों निर्भर हैं.

दरअसल, मलेरिया की बीमारी भारत में ही ज्यादा पाई जाती है. यूरोपीय देश हों या अमेरिका, वहां पर मलेरिया इतनी बड़ी समस्या नहीं है. इसीलिए यह दोनों दवाएं वहां न बनाई जाती हैं, और न आमतौर पर इनकी मांग होती है.

लेकिन अब कोरोना वायरस के मरीज भी इस दवा से ठीक हो रहे हैं. ऐसे में यह दवा आजकल डिमांड में है. भारत में इसका बहुत स्टॉक रहता है, इसीलिए अमेरिका और ब्राजील समेत कई बड़े देश इस वक्त भारत की तरफ इस दवा के लिए देख रहे हैं.

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Hydroxicloroquine का कितना स्टॉक है मौजूद?

फार्मा इंडस्ट्री की मानें तो भारत की औसतन घरेलू जरूरत इस दवा को लेकर ढाई करोड़ दवाओं की रहती है. इसके लिए भारत को जो रॉ मटेरियल आता है, उसका 70 फीसदी हिस्सा चीन से ही आता है जो कि तकरीबन 40 मीट्रिक टन होता है. इससे भारत में 20 करोड़ दवाएं बनाई जाती हैं. फिलहाल भारत के पास रॉ मटेरियल और दवाओं का 5 से 6 महीने का स्टॉक उपलब्ध है.

चीन से अभी भी रॉ मटेरियल और जरूरी केमिकल सप्लाई हो रही है यानी फिलहाल भारत निर्यात करने की स्थिति में है. 

यह दवा इसलिए भी अहम है क्योंकि यह prophylaxis के तौर पर काम करती है. इसका मतलब यह है कि कोरोना वायरस के मरीजों की देखभाल में लगे डॉक्टर मेडिकल कर्मी और टेस्ट करने वाले कर्मचारियों को यह दवा एहतियातन दे दी जाती है, जिससे उन्हें कोरोनावायरस होने का खतरा कुछ कम किया जा सके.

अभी तक के परिणाम के हिसाब से ऐसा माना जाता है कि ये दवा कोरोना वायरस के सेल की ताकत को काफी हद तक कमजोर कर सकती है.

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एक तीसरी दवा भी है जिसे कोरोना वायरस के मरीजों को इलाज के तौर पर देकर देखा जा रहा है.

इस दवा का नाम है ओसेल्टामिविर- जो बाजार में टेमीफ्लू ब्रांड नेम से भी बिकती है. ये दवा  स्वाइन फ्लू के मरीजों के इलाज में भारत में पहले भी इस्तेमाल हो चुकी है. चूंकि अभी तक कोरोनावायरस की कोई दवा नहीं बनी है, ऐसे में वायरस के खिलाफ इन सभी एंटीवायरल दवाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है.

ग्रेटर नोएडा के कासना में बने गवर्नमेंट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के डॉक्टर अब तक वहां भर्ती कोरोनावायरस के 11 मरीजों को डिस्चार्ज कर चुके हैं. डॉक्टरों की मानें, तो यह दवाएं उन मरीजों पर अच्छा काम कर रही हैं, जो बहुत गंभीर हालत में नहीं है या उन्हें कोई और पुरानी बीमारी नहीं है.

यहां यह साफ कर देना भी बहुत जरूरी है कि यह दवाएं कोरोना वायरस का इलाज नहीं हैं, लेकिन प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल की जा रही हैं. अगर इनके नतीजे इसी तरह उत्साहवर्धक रहे, तो आगे चलकर कोरोना वायरस के पुख्ता इलाज के तौर पर ये दवाएं प्रामाणिक हो सकती हैं. 

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