एक पुरानी परंपरा के नाम पर कड़ाके की ठंड में गर्म लोहे से दागे जाते हैं यहां के मासूम बच्चे

जमशेदपुर और उसके आस-पास के आदिवासी लोगों को आज के दिन का पूरे एक साल से इंतजार रहता है

एक पुरानी परंपरा के नाम पर कड़ाके की ठंड में गर्म लोहे से दागे जाते हैं यहां के मासूम बच्चे
जमशेदपुर के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में परंपरा और संस्कृति के नाम पर गर्म लोहे से बच्चों को दागा जाता है (प्रतीकात्मक तस्वीर)

जमशेदपुर: जमशेदपुर के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में परंपरा और संस्कृति के नाम पर गर्म लोहे से बच्चों को दागा जाता है. यह परंपरा सदियों से आदिवासी समाज में चली आ रही है. कड़ाके के ठण्ड में एक महीने के बच्चे से लेकर 15 साल तक के बच्चों को दागा जा रहा है और प्रशाशन इसको रोकने मे आज तक नाकाम है. जिला पुलिस का कहना है कि अगर शिकायत मिलेगी तो कार्रवाई की जाएगी. यह इनकी परंपरा है इसको तुरंत रोक पाना मुश्किल है. बताया जा रहा है कि यह परंपरा इनके पुरखों के जमाने से चली आ रही है. आदिवासी लोग इस परंपरा को कायम रखते हुए बच्चे को आज भी गर्म लोहे से दागते हैं. इसी वजह से जमशेदपुर और उसके आस-पास के आदिवासी लोगों को आज के दिन का पूरे एक साल से इंतजार रहता है. इन लोगों की मान्यता है कि मकर संक्रांति के दूसरे दिन बच्चों के पेट में दाग लगाने से उसको कभी पेट से जुड़ी बीमारी नहीं होती है.

मान्यता है कि इसके बाद नहीं होगा पेट का रोग
आपको बता दें कि जमशेदपुर में इन दिनों कड़ाके की ठण्ड पड़ रही है लेकिन आदिवासी समुदाय के लोगों को आज भी अपनी परंपरा को जिन्दा रखने के लिए मकर संक्रांति सुबह-सुबह उठकर अपने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर चिड़ी दाग लगवाने पहुंच जाते हैं. मान्यता है कि गांव के बच्चे हों या बुजुर्ग जिनको पेट या कमर में कहीं भी दर्द हो तो उनको गर्म लोहा से दाग दिया जाए तो दर्द ठीक हो जाता है. इन लोगों की मान्यता है कि जिनको भी पेट से संबंधित कोई बीमारी होती है वो लोग सुबह-सुबह सूर्य निकलने के साथ ही एक जगह पर जमा हो जाते हैं और पेट में दाग लगवाते हैं.

"बच्चे को कभी पेट की बीमारी नहीं होगी"
जमशेदपुर के ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाली महिला के अनुसार उनके बच्चों को भी पेट का दर्द था उन्होंने गुरू बाबा के अनुसार 4 दाग दिया और बच्चों का दर्द ठीक हो गया था. वहीं एक महिला को पीठ में दर्द था उसने भी दाग करवाया जिसके बाद उसको भी दर्द से मुक्ति मिल गई. इन लोगों का कहना है कि ये हमारी पुरानी परंपरा है इसलिए साल में एक दिन हम इसको करते हैं. एक स्थानीय आदिवासी महिला जसमीत ने जी न्यूज से बातचीत के दौरान कहा, "पेट का नश मोटा हो जाता है जिससे बच्चों को तकलीफ होती है. इसलिए अगर इसको दाग लगा दिया जाए तो बच्चे को कभी पेट की बीमारी नहीं होगी." 

ऐसे निभाई जाती है ये परंपरा
इस परंपरा को करने के लिए आदिवासी महिलाएं लोग सुबह-सुबह 'गोइठा' (उपले) को सुलगाकर लोहे का एक सींक उसमें डाला जाता है. लोहे को गोइठा में गर्म किया जाता है. जब लोहा गर्म हो जाता है तो बच्चों को पकड़ कर फिर उसके पेट में नाभि के बगल में सरसों का तेल लगाया जाता है और फिर गर्म लोहे से उसमें चार बार दागा जाता है. ये काम गांव के ही एक किसी जानकार व्यक्ति के द्वारा किया जाता है, जो इस परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी करते आ रहे हैं. चार जगह पर दाग के बाद लोगों की मान्यता है कि पूरा साल इसको अब कभी भी पेट की कोई बीमारी नहीं होगी.

परंपरा के नाम पर बच्चों पर अत्याचार?
इस दाग के समय चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ बच्चों का रोना ही सुनाई देता है. बच्चों को उसके मां-बाप खुद ले कर आते हैं और दाग लगवाते हैं. परंपरा के नाम पर बच्चों पर अत्याचार की बात कहने पर इन लोगों का कहना है कि- ये हमारी परंपरा है जो पुरखों के जमाने से चली आ रही है. इसलिए हम लोग भी करते हैं. इसमें दाग के कारण कोई सेप्टिक या कोई अन्य बीमारी नहीं होती है.

अब सवाल ये उठता है कि किसी समुदाय द्वारा परंपरा के नाम पर इस तरह बच्चों पर अत्याचार किया जाना क्या सही है? क्या यह बच्चों के बचपन के साथ खिलवाड़ नहीं है?