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भारत को कमजोर ना समझे चीन, आसान नहीं है युद्ध करना

भारत को कमजोर ना समझे चीन, आसान नहीं है युद्ध करना
भारत को कमजोर ना समझे चीन, आसान नहीं है युद्ध करना (फाइल फोटो)

नई दिल्लीः भारतीय सीमा पर एक तरफ पाकिस्तानी घुसपैठिए तो दूसरी तरफ चीनी सेना लगातार तनाव बनाए हुए है. पाकिस्तान के साथ तो अपना हिसाब लगातार चलता रहता है. कई बार युद्ध हुआ और हमने अपने इस बिगड़े पड़ोसी को धूल चटाई. लेकिन साल 1962 की लड़ाई में चीन से हारने का मलाल हमारे देश को आज भी सालता है. यही वजह है कि हम कभी भी चीन पर उतने आक्रामक नहीं होते है जितना पाकिस्तान पर. लेकिन पिछले कुछ महीनों में भारत और चीन के रिश्तों तल्खी आई है और सीमा तनाव बढ़ा है.

सीपीइसी को लेकर भारत ऐतराज जता चुका है

सीपीइसी यानि चीन पाकिस्तान इकोनोमिक कॉरिडॉर को लेकर भारत पहले ही अपना ऐतराज कर चुका है. हाल ही में बीजिंग में वन बेल्ट, वन रोड पर आयोजित बैठक में भारत की गैरमौजूदगी चीन को नागवार लगा. इसके अलावा अमेरिका और भारत की बढ़ती नजदीकी से चीन असहज महसूस कर रहा है. हिंदमहासागर में भारत और अमेरिका की सक्रियता से भी चीन नाराज है. लेकिन चीन की ये आदत बन चुकी है कि जब कोई देश उसकी हरकतों के खिलाफ आवाज उठाता है तो चीन यह दिखाने के लिए अपनी गतिविधियां तेज कर देता है. इसी का नतीजा है कि हिंद महासागर में चीन अपनी नौसेना की मौजूदगी बढ़ाता जा रहा है.

हाल ही में कम से कम 14 चीनी नौसेना पोतों को भारतीय समुद्री क्षेत्र में घूमते देखा गया

हाल ही में कम से कम 14 चीनी नौसेना पोतों को भारतीय समुद्री क्षेत्र में घूमते देखा गया. इनमें आधुनिक लुआंग-3 और कुनमिंग क्लास स्टील्थ डेस्ट्रॉयर्स भी शामिल हैं. चीनी नौसेना का कदम भारत को बिना बताए या जानकारी दिए उठाया गया है. इस पूरे मामले में भारतीय नौसेना भी पूरी तरह से चौकन्नी है. भूटान के जिस इलाके को लेकर चीन, युद्ध करने की धमकी दे रहा है, वो इलाका सामरिक तौर पर तीनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है. चीन अपनी बात रखने के लिए 1890 के समझौते का हवाला दे रहा है. लेकिन उसने 1988 और 1989 में भूटान के साथ समझौता किया था जिसमें चीन ने उस इलाके को भूटान का हिस्सा माना.

भारत और भूटान के बीच रिश्ते घनिष्ठ हैं

भारत और भूटान के बीच रिश्ते घनिष्ठ हैं. इसलिए जब चीन ने डोकलाम इलाके में सड़क बनानी शुरू की को भारत की तरफ से आपत्ति जताई गई. 1962 में अपनी कामयाबी को चीन बताता फिरता है. लेकिन 1962 के बाद दो घटनाओं का जिक्र नहीं करता है जब उसे भारत ने सीमित लड़ाई में चीन को शिकस्त दी. दरअसल चीन का मूल मकसद भूटान की जमीन हासिल करना नहीं है, बल्कि तिब्बत की तरफ लगने वाली सीमाओं में आधारभूत संरचना को मजबूत करना है.

भारत ने सीमित लड़ाई में चीन को शिकस्त दी

-1967 में नाथू ला पर चीनी सैनिकों को खदेड़ा था. 1962 की लड़ाई में जीत का जश्न मना रहे चीनी हुक्मरानों ने ऐसा सोचा भी नहीं था. उन्हें उम्मीद नहीं थी कि भारतीय फौज इतना कड़ा प्रतिवाद कर सकती है. 1987 में तवांग(अरुणाचल) के सोमदोरुंग में चीन की नापाक हरकत का सेना ने जवाब दिया. सेना के जवान उन इलाकों से हटे नहीं बल्कि डटे रहे.

भारत-चीन सैन्य क्षमता की तुलना

चीन और भारत की सैन्य क्षमता में अगर तुलना करें तो निश्चित तौर पर चीन की सैन्य ताकत भारत से कही आगे है. लेकिन वैश्विक तौर पर हालात बदल चुके हैं. वैसे भी आज की लड़ाई में दो बातें ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. पहली यह कि आप किस इलाके में लड़ रहे हैं और किस तादाद में अपनी फौज को वहां लगाते हैं. हिमालय से सटी जो सरहदे हैं, वहां पर चीन की काबिलियत इतनी नहीं है कि वो इतनी जल्दी इतने सैनिक भेजकर भारत को परास्त कर सके.

इसके अलावा चीन की जीडीपी और डिफेंस खर्च में जितनी चीजें गिनी जाती हैं हमारे यहां के डिफेंस सेक्टर में नहीं गिनी जाती हैं. लेकिन वे राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में काम करती हैं. भारत में जितने भी अर्द्ध सैन्य बल हैं उन सबको जोड़ने पर संख्या फौज के बराबर है. इस तरह देखा जाए तो हमारी आधी सेना गृह मंत्रालय के अधीन है.

भारत की ताकत बढ़ी

चीन के पास अगर एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम है तो रूस से भारत ने इसी तरह का सिस्टम खरीद रहा है. हवा से हवा और जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल, लड़ाकू विमान के मामले में भारत ने प्रगति की है.

चीन की सामरिक मजबूरी

मौजूदा समय में चीन दक्षिण चीन सागर समेत कई मोर्चों पर घिरा हुआ है. ताइवान और तिब्बत मुद्दे पर चीन को नए दुश्मनों का सामना करना पड़ सकता है. झिंगझियांग प्रांत में चीन अलगाववादियों का सामना करना पड़ रहा है. चीन की वन बेल्ट, वन रोड की योजना पर असर पड़ सकता है. दोनों देशों के बीच तनाव की वजह से भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों पर असर पड़ेगा.

भारत के लिए चिंता का कारण

पाक सीमा पर लगातार तनाव की वजह से चीन के साथ संघर्ष करना आसान नहीं, एनएसजी की सदस्यता हासिल करने के लिए चीन का समर्थन जरूरी. चीन के मुकाबले सैन्य क्षमता में कमी.

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