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द्रास: सेना का ऐसा स्कूल जो सैनिकों को बना रहा है मजबूत और सक्षम

यहां सैनिकों को नवीनतम तकनीक और नवीनतम उपकरण प्रदान किए जा रहे हैं. इन पहाड़ी में रॉक क्लाइम्बिंग, रॉक क्राफ्ट और कैजुअल्टी इवकेशन के गुण जवानों को सिखाया जाता है.

द्रास: सेना का ऐसा स्कूल जो सैनिकों को बना रहा है मजबूत और सक्षम
दुश्मन के बंकरों पर कैसे हमले करें वो भी इस प्रशिक्षण का हिस्सा होता है.

द्रास: भारतीय सेना ने 1999 में हुए कारगिल युद्ध से बहुत कुछ सीखा और कमजोर कड़ियों से सबक लेते हुए उन्हें बेहतर करने के प्रयास शुरू किए. ऊंचे और पथरीली पहाड़ी इलाकों में लड़ने के लिए सैनिकों की सक्षम करने पर जोर दिया गया. कारगिल युद्ध में पथरीली पहाड़ियों को पार करके भारतीय सेना ने विजय हासिल की थी, लेकिन कई सैनिकों ने अपने प्राणों के न्यौछावर किया था. 

कारगिल बैटल स्कूल (केबीएस) वह स्कूल है, जो कारगिल और लद्दाख क्षेत्रों में नियंत्रण रेखा (एलओसी) के साथ ऊंचाई वाली पहाड़ी पोस्टों पर तैनात जवानों को पूर्व प्रशिक्षण प्रदान करता है. साल 2000 में कारगिल बैटल स्कूल (केबीएस) बनाया गया. फॉरवर्ड पोस्ट्स पर चुनौतियों और कठिनाईयों का सामना करने और उन्हें दूर करने के लिए सैनिकों को यहां परिक्षण दिया जाता हैं. यहां सैनिकों को नवीनतम तकनीक और नवीनतम उपकरण प्रदान किए जा रहे हैं. इन पहाड़ी में रॉक क्लाइम्बिंग, रॉक क्राफ्ट और कैजुअल्टी इवकेशन के गुण जवानों को सिखाया जाता है.

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ट्रेनिंग को दो हिस्सों में दी जाती है. शारीरिक चुस्ती, रॉक क्राफ्ट, आइस क्राफ्ट और माउंटेन वार आदि का प्रशिक्षण सैनिकों को दिया जाता है. इसके साथ ही सैनिकों को 90 डिग्री में चढ़ाई करना, रैपलिंग और रॉक क्लाइम्बिंग का प्रशिक्षण दिया जाता है. दुश्मन के बंकरों पर कैसे हमले करें वो भी इस प्रशिक्षण का हिस्सा होता है. इस सब के लिए सैनिकों को शारीरिक रूप से स्वस्थ और मजबूत होना पड़ता है. 

साल 2000 में स्थापित इस स्कूल में जम्मू कश्मीर में तैनात हर सेना के जवान को इस बैटल स्कूल में परिक्षण के लिए आना आवश्यक होता है और 2-4 महीने तक की ट्रेनिंग के बाद को इन पथरीली ऊंची पहाड़ियों पर दुश्मन से लोहा लेने के लिए तैयार होता हैं.