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EXCLUSIVE: कारगिल की कहानी तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक की जुबानी

इस 26 जुलाई को कारगिल युद्ध की 20वीं वर्षगांठ है.

EXCLUSIVE: कारगिल की कहानी तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक की जुबानी
जनरल वीपी मलिक ने जी न्‍यूज डिजिटल के ओपिनियन एडीटर पीयूष बबेले को बताया कि शुरू के तीन-चार दिन बाद यह पता चला कि यह लोग मुजाहिदीन नहीं हैं, बल्कि पाकिस्तानी फौज के लोग हैं.

नई दिल्ली: कारगिल की लड़ाई 1999 की गर्मियों में हुई थी. इस 26 जुलाई को इस लड़ाई की 20वीं वर्षगांठ है. यह एक ऐसी जंग थी जो दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ों पर सबसे खराब मौसम और सबसे खराब हालात में लड़ी गई. जंग में भारत के 500 से अधिक सैनिक शहीद हुए. भारत की तरफ से इस जंग को लड़ने वाले सबसे बड़े कमांडर और तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक ने जी न्यूज डिजिटल के ओपिनियन एडिटर पीयूष बबेले से एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में इसकी कहानी बयान की. पेश हैं इंटरव्यू के खास अंश:

जब कारगिल में घुसा पाक तब विदेश में थे सेनाध्यक्ष
सवाल: कहा जाता है कि जब कारगिल के घुसपैठिए देश में घुस आए, उस वक्त आप विदेश में थे. आपको जब पहली सूचना मिली तो आपका क्या रिएक्शन था?
जवाब: बिलीव नहीं होता था, किसी ने अखबार पढ़कर पहली बार मुझे यह खबर सुनाई. उन्होंने मुझे बताया कि कुछ घुसपैठिए अंदर आ गए हैं. यह लोग लाइन ऑफ कंट्रोल (एलओसी) को क्रॉस करके अंदर आए हैं. मुझे लगा कि यह नामुमकिन है. फिर मैंने टेलीफोन करके अपने लोगों से बात की, तो उन्होंने कहा, 'हां, थोड़ा सा इंसिडेंट हुआ है.' लेकिन आप फिक्र मत करो. हम उनको यहां से निकाल देंगे.

सवाल: लेकिन फिक्र तो आपको हुई होगी?
जवाब: हां, फिक्र तो हुई थी.

सवाल: जब आप देश वापस आ गए, तो आपको कब पता चला कि यह बड़ा हमला है?
जवाब: जब मैं देश आया तो सबसे पहले अगले दिन ही श्रीनगर और कारगिल की तरफ जाना चाहता था. श्रीनगर तो मैं गया, लेकिन कारगिल नहीं जा सका. क्योंकि वहां मौसम खराब था. लेकिन मैंने अपने लोगों से ब्रीफिंग ली श्रीनगर में और उधमपुर में. जब डिटेल्स मेरे सामने आए तो मैं समझ गया कि यह सीरियस बात है और इसे हमको सीरियसली लेना चाहिए. तब तक हमारे शहीद होने वाले जवानों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी. यह बहुत फिक्र की बात थी.

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सवाल: जैसे ही आपको तीन-चार दिन बाद यह पता चला कि यह लोग मुजाहिदीन नहीं हैं, बल्कि पाकिस्तानी फौज के लोग हैं, तो जाहिर है भारत सरकार ने और सेना ने बड़ा अभियान चलाया होगा. उस तैयारी के बारे में बताएं?
जवाब: यह सही बात है कि हमने जिस इलाके में लड़ाई लड़ी, कारगिल, द्रास और लद्दाख के एरिया में, वह बहुत ही कठिन इलाका है. इसमें सिर्फ दुश्मन से ही नहीं निपटना होता है, मौसम और ऊंचाई का ख्याल भी रखना होता है. लेकिन हमारे सामने बहुत ज्यादा समय नहीं था. हमें जल्दी से जल्दी रिएक्ट करना था और वहां के हालात को पलटना था. हमें अपने जवानों की मौत को भी रोकना था. हमने कैबिनेट को सारे हालात से अवगत कराया और उनसे परमिशन मांगी.

मैं खुद चेयरमैन, चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी था. मैंने कैबिनेट को बताया कि आप फिक्र ना करें, हम इस परिस्थिति को टेकल कर सकते हैं. लेकिन हमको पूरी तैयारी के साथ जाना पड़ेगा और इसमें आर्मी, नेवी और एयर फोर्स तीनों जुड़कर काम करेंगे. उस ब्रीफिंग के बाद हमें कैबिनेट से इजाजत मिल गई और हमने अपना काम शुरू कर दिया. आपको याद होगा कि 24 या 25 को एयर फोर्स ने वहां काम शुरू कर दिया. नेवी वालों ने भी अपना काम शुरू कर दिया. हमने माउंटेन डिवीजन को कश्मीर से द्रास भेजा.

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सेना को एलओसी पार करने से न रोकें
सवाल: उस समय के अखबारों में छपा कि सरकार ने कहा था कि हम लाइन ऑफ कंट्रोल के उस पार नहीं जाएंगे. लेकिन बाद में शायद आपने सरकार से गुजारिश की थी कि इस बात पर जोर न दिया जाए. जरूरत के मुताबिक काम होने दें?
जवाब: देखिए कैबिनेट ने फैसला लिया था कि हम लाइन ऑफ कंट्रोल पार नहीं करेंगे. एक तो उसकी वजह यह थी कि उस समय तक भारत और पाकिस्तान दोनों ही परमाणु शक्ति संपन्न देश बन गए थे.

दूसरी बात यह थी कि लोगों को तब तक सही स्थिति पता नहीं थी. इंटेलिजेंस रिपोर्ट सही नहीं थी कि यह लोग मुजाहिदीन हैं या यह पाकिस्तानी आर्मी के लोग हैं, क्योंकि हमारे रूल्स ऑफ एंगेजमेंट अलग-अलग होते हैं. अगर पाक फौज से लड़ना है तो अलग नियम हैं और अगर मिलिटेंट से लड़ना है तो दूसरी स्थिति है. इस वजह से उन्होंने इजाजत नहीं दी थी, हमें LOC पार करने की.

लेकिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जब दो बार पब्लिकली यह बात कही कि उन्होंने फौजों से कहा है कि वे एलओसी पार ना करें तब मैंने उनसे यह बात की कि सर, आपको यह बात पब्लिक में कहना ठीक नहीं है. हम कोशिश करेंगे कि हम लाइन ऑफ कंट्रोल पार न करें, लेकिन अगर हमको जरूरत पड़े और मुझे लगा कि एक जगह लड़ाई से काम नहीं चलेगा, तो हमारे पास छूट होनी चाहिए. ऐसे में उस वक्त आप क्या बोलेंगे. उन्होंने मेरी बात समझी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र ने उसी शाम एक चैनल के ऊपर इंटरव्यू दिया और कहा कि नियंत्रण रेखा पार ना करने की बात आज के लिए ठीक है. लेकिन कल क्या होगा इसके बारे में अभी हम कुछ कह नहीं सकते.

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सवाल: जब यह लड़ाई हो रही थी तो पाकिस्तान ऊंचे पहाड़ों पर बैठा हुआ था. हमारे हाई-वे उनके निशाने पर थे. हमारे जवान बड़ी संख्या में शहीद हो रहे थे और यहां तक कि हमारे लड़ाकू विमान भी गिरा दिए गए थे, उस कठिन समय में आपने सेना का हौसला कैसे बढ़ाया?
जवाब: सबसे पहले तो मैं अपने सारे जवानों और ऑफिसर्स की दाद देता हूं कि उन्होंने पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल कायम की. बहादुरी क्या होती है, देशभक्ति क्या होती है. और जिस लगन से उन्होंने काम किया वह वाकई प्रशंसा लायक चीज थी. मैं जाता था वहां पर उनसे मिलने के लिए हर 6 दिन में एक बार. मैं यह भी कह सकता हूं कि उन्होंने मेरा हौसला भी बढ़ाया क्योंकि मैंने जब भी पूछा कि क्यों क्या हालात हैं, कैसा लग रहा है तो उन्होंने यही कहा कि आप फिक्र मत करो सर हम सब ठीक कर देंगे. आप फिक्र मत करो.

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बरस रहे थे गोले और मुस्कुरा रहे थे अटल बिहारी वाजपेयी
सवाल: एक बार प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी आपके साथ वहां गए थे और उनकी मौजूदगी में ही वहां गोले बरसने लगे थे. वह मंजर कुछ याद आता है?
जवाब: 13 जून को प्रधानमंत्री के साथ मैं गया था कारगिल. और वहां कारगिल के हेलीपैड पर हम खड़े हुए थे. बृजेश मिश्रा भी थे और शायद जॉर्ज फर्नांडिस भी थे, तभी पाकिस्तानियों ने कारगिल कस्बे के ऊपर बमबारी शुरू कर दी. हम लोग हेलीपैड के ऊपर खड़े हुए थे. वहां से यह सब देख रहे थे, सौभाग्य से वह हेलीपैड ऐसी जगह पर था, जहां मुझे यकीन था कि कोई गोला वहां तक नहीं आ सकता. तो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी साथ में थे. उन्होंने भी देखा. उन्होंने मेरी तरफ देखा, लेकिन वह बहुत शांत रहे और मुस्कुराते रहे. मुझसे इशारा करके कहने लगे यह क्या हो रहा है. मैंने कहा हां, यह तो ऐसा होता रहता है लड़ाई में.

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कारगिल के लिए मुशर्रफ और शरीफ दोनों जिम्मेदार
सवाल: लंबे समय तक यही माना जाता रहा कि कारगिल के युद्ध के पीछे असली दिमाग जनरल परवेज मुशर्रफ का था और पाकिस्तान का राजनैतिक नेतृत्व इसके पीछे नहीं था. लेकिन आपने अपनी किताब 'फ्रॉम सरप्राइस टू विक्ट्री' में यह कहा कि इसके पीछे नवाज शरीफ का भी हाथ था. अब पाकिस्तान में भी एक किताब आई है 'फ्रॉम कारगिल टू कूप, जिसमें कहा गया है कि इस युद्ध के पीछे नवाज शरीफ का भी बराबर का हाथ था, आपको यह बात इतने पहले कैसे पता चली?
जवाब: जब हमें यकीन हो गया कि इसके पीछे पाकिस्तान मुजाहिदीन नहीं हैं, यह पाकिस्तानी फौज है. इसके अलावा परवेज मुशर्रफ और उनके कमांडर के बीच जो एक कन्वर्सेशन हुआ था, जिसको हमने पकड़ लिया था. तो उससे मुझे पता चला था कि इस बारे में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को कुछ ना कुछ मालूम तो जरूर है. हो सकता है, उन्हें पूरी बात मालूम न हो, लेकिन कुछ न कुछ बताया तो उन्हें जरूर गया है. उसके बाद भी जो रिपोर्ट आती रही हैं, उससे यही अंदाजा लगा कि परवेज मुशर्रफ ने प्राइम मिनिस्टर से बातचीत की थी और उसको कुछ ब्रीफिंग भी दी है. नवाज शरीफ का यह कहना कि उन्हें कुछ मालूम नहीं था, यह बात सही नहीं है.

इंटेलिजेंस की नाकामी से हुआ था कारगिल युद्ध
सवाल: क्या आपको लगता है कि अगर हमें सही समय पर इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिल गई होती तो शहीद हुए जवानों की संख्या कम हो जाती?
जवाब: अगर हमें पहले से अच्छी वार्निंग मिल जाती या यह खबर मिल जाती कि पाकिस्तान आर्मी वहां है और ऐसा हमला करने की तैयारी कर रही है तो निश्चित तौर पर हम वहां पहले से कुछ न कुछ तैयारी कर लेते. शायद बहुत ज्यादा कर लेते. हथियार भी वहां पर पहुंचा देते, क्योंकि उन हालात में हमने जल्दबाजी में जो रिएक्शन किया, इंटेलिजेंस सूचना होने पर वही काम हम पूरी तैयारी से आराम से करते. ऐसे हालात में हमारे कम सैनिक शहीद होते. लेकिन इस बात में कोई शक नहीं है कि यह इंटेलिजेंस का फेल्योर था. हम यह नहीं कह पाए कि पाकिस्तान आर्मी वहां पर तैयारी कर रही है अटैक करने की.

उधार के हथियारों से लड़ रही थीं कई बटालियन
सवाल: उस समय का आपका एक बयान है कि हमारे पास जो होगा, हम उससे लड़ेंगे. क्या आपका इशारा उस समय गोला बारूद और हथियारों की कमी की तरफ था?
जवाब: हां, हथियारों की काफी शॉर्टेज थी. हमने राष्ट्रीय राइफल्स की कई नई यूनिट बनाई थीं, लेकिन उनके हथियारों के लिए मंजूरी नहीं आई थी, तो उनको दूसरी बटालियन से हथियार इकट्ठे करके हमने दिए थे. तो हमारे पास जरूरत के हिसाब से हथियार नहीं थे. इसके अलावा बोफोर्स तोप के पुर्जे हमारे पास नहीं थे, गोला बारूद कम था. काफी दिक्कतें थीं.

जब वाजपेयी ने हटाई बोफोर्स तोप से पाबंदी
सवाल: उस समय तो बोफोर्स तोप पर पाबंदी भी लगी हुई थी.
जवाब: बोफोर्स कंपनी पर पाबंदी लगी थी, इसकी वजह से हम उसके पार्ट नहीं मंगा पाते थे. युद्ध के दौरान मैंने प्रधानमंत्री से निवेदन किया कि हमें यह चीजें चाहिए, इसलिए आप बोफोर्स तोप से पाबंदी हटा दीजिए, तो फिर वह पाबंदी उस समय हटा दी गई थी. उसके बाद हम बोफोर्स के पार्ट्स मंगाने के लिए स्वतंत्र हो गए थे.

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26 जुलाई, 1999 को कारगिल की पहाड़ियों पर तिरंगा फहराकर भारतीय जवानों ने युद्ध में विजय की घोषणा की.(फाइल फोटो)

फौज के पास कम था गोला-बारूद
सवाल: मैं गोला-बारूद की कमी वाले बयान की बात पूछ रहा था?
जवाब: दरअसल, उस समय हमारे एक पत्रकार मित्र ने सवाल किया था कि आप तो हमेशा गोला बारूद की कमी की बात करते रहे हैं और अब तो युद्ध आ गया है, तो ऐसे में आप कैसे लड़ेंगे. तो उसका मैंने जवाब दिया था कि हमारे पास जो भी है हम उससे लड़ेंगे. यह कोई बहादुरी की बात नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसी सिचुएशन थी, जिसमें हम हेल्पलेस थे. हमारे पास कोई और चारा ही नहीं था. तो ऐसी सिचुएशन में आर्मी चीफ और क्या करता. मैं नहीं चाहता था कि ऐसे हालात में हमारे जवानों का हौसला किसी भी तौर पर टूटे या उन पर कोई गलत असर पड़े.

कारगिल से नहीं सीखा सबक, हथियारों के लिए आज भी जूझ रही सेना
सवाल: सर, कारगिल युद्ध के 19 साल हो चुके हैं और आप यही बता रहे हैं कि उस समय की दो कमियां थीं- एक इंटेलिजेंस का नाकाम होना और दूसरा हथियारों और गोला बारूद की कमी होना. आपको क्या लगता है कि हमने इन गलतियों से क्या सबक सीखा. आज हमारी इंटेलिजेंस और गोला बारूद की स्थिति क्या है?
जवाब: इंटेलिजेंस के बारे में मैं अभी कुछ नहीं कह सकता, क्योंकि उस समय के जो इंटेलिजेंस चीफ हुआ करते थे अजीत डोभाल, वह देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं. वह खुद इस समय इंटेलिजेंस को देख रहे हैं. वह इंटेलिजेंस के आदमी रहे हैं. लेकिन जहां तक गोला-बारूद और सामग्री की बात है तो सुनने में तो यही आ रहा है कि अभी तक हालत खराब है. अभी कुछ दिन पहले आर्मी के वाइस चीफ ने पार्लियामेंट की एक कमेटी को बोला था कि हमारे पास आधुनिकीकरण में आ रही कमियों को पूरा करने के लिए पैसा नहीं है. एयरफोर्स वालों ने भी कुछ ऐसी ही स्टेटमेंट दी हैं. जो स्टेटमेंट हम सुन रहे हैं, पढ़ रहे हैं, उससे लगता है कि हालत अभी भी ठीक नहीं है.

पांच दिन तक गुत्थम-गुत्था लड़ाई लड़ रहे थे सैनिक
सवाल: कारगिल की लड़ाई को लंबा वक्त बीत गया है, उस बारे में आप किताब भी लिख चुके हैं, लेकिन फिर भी एक सवाल बनता है कि क्या कोई ऐसा क्षण आया था, जब आप भी हिल गए हों?
जवाब: एक तो हमारा एक विमान और एक हेलीकॉप्टर गिर गया, दूसरे जब हमने तोरो लिंक पर हमला किया तो वहां कई दिन तक आमने-सामने की गुत्थम-गुत्था लड़ाई चलती रही. आमने-सामने गोलियां चल रही हैं, गोले बरस रहे हैं. चार-पांच दिन जब वह लड़ाई चली, तो हमें भी लगने लगा कि यह क्या हो रहा है. हमसे क्या हो पाएगा? कठिनाई के बारे में ज्यादा मालूम पड़ गया. लेकिन मैं एयरफोर्स की बहादुरी को दाद देता हूं और अपने जवानों की बहादुरी को दाद देता हूं.