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दुनिया 'गरम गोले' में बदल रही, केवल 57 देश बचाने का कर रहे प्रयास...वक्‍त रेत की तरह फिसल रहा

जलवायु परिवर्तन जनित वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी (ग्लोबल वार्मिंग) के परिणामस्वरूप, इस साल भारत के तटीय इलाकों में एक के बाद एक आठ चक्रवाती तूफान देखने को मिले जिनकी वजह से व्यापक पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ. 

दुनिया 'गरम गोले' में बदल रही, केवल 57 देश बचाने का कर रहे प्रयास...वक्‍त रेत की तरह फिसल रहा
सांकेतिक तस्वीर

नई दिल्लीः बीते साल के दौरान वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों और इसके विनाशकारी प्रभावों ने भारत की दहलीज पर भी दस्तक दे दी है.जलवायु परिवर्तन जनित वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी (ग्लोबल वार्मिंग) के परिणामस्वरूप, इस साल भारत के तटीय इलाकों में एक के बाद एक आठ चक्रवाती तूफान देखने को मिले जिनकी वजह से व्यापक पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ. 

‘कोप 24 सम्मेलन’ में गंभीर मंथन
जलवायु परिवर्तन के वैश्विक प्रभाव और चुनौतियों से निपटने की कार्ययोजना बनाने पर सभी देशों ने साल के आखिर में पोलैंड में आयोजित ‘कोप 24 सम्मेलन’ में गंभीर मंथन कर कुछ दिशानिर्देश बनाने में कामयाबी जरूर हासिल की. सम्मेलन में हिस्सा लेकर लौटने पर केन्द्रीय पर्यावरण सचिव सी के मिश्रा ने बताया कि सभी देशों ने मिलकर जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिये पेरिस समझौते में तय की गयी कार्ययोजना को लागू करने के दिशानिर्देश तय करने में कामयाबी हासिल की. 

मिश्रा ने कहा कि सम्मेलन के दौरान संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई में तैयार किए गए ये दिशानिर्देश सभी देशों की विकास और ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति, पर्यावरण की कीमत पर नहीं करने का लक्ष्य तय करते हुए विकसित और विकासशील देशों के बीच की खाई को पाटने में सहायक होंगे. उन्होंने कहा कि सम्मेलन में भारत विकसित देशों को यह समझाने में कामयाब रहा कि विकास की दौड़ में पीछे चल रहे विकासशील देशों को विकसित देश ऊर्जा एवं विकास संबंधी अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिये पर्यावरण हितैषी तकनीक एवं आर्थिक मदद मुहैया करायेंगे. 

आर्थिक अंशदान के लिए सकारात्मक संदेश
पर्यावरण चुनौतियों के लिहाज से इस सम्मेलन को साल की सबसे अहम उपलब्धि बताते हुये मिश्रा ने कहा कि वैश्विक स्तर पर संतुलित विकास के लिये सभी देशों के बीच आर्थिक अंशदान का साझा कोष भी गठित करने में कामयाबी मिली. अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों को इस कोष में हिस्सेदारी करने के लिये रजामंद करने में मिली कामयाबी, पेरिस समझौते को अंजाम तक पहुंचाने का विश्वास जगाती है. 

विश्व नेताओं का रवैया शर्मनाकः टनबर्ग
इस बीच कोप 24 सम्मेलन में युवा पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा टनबर्ग ने अपने धमाकेदार भाषण से दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचते हुये जलवायु परिवर्तन की हकीकत से निपटने में विश्व के नेताओं के अपरिपक्व रवैये को शर्मनाक बताया. ग्रेटा ने कहा ‘‘आप सभी अपनी बेकार की तरकीबों के सहारे इस मुद्दे पर एक साथ आगे बढ़ने की महज बातें करते रहे, जिसकी वजह से आज हम खुद को इस मुसीबत में फंसा पाते हैं.’’ उन्होंने कहा कि हालात से निपटने के लिये जब ‘आपात ब्रेक’ लगाने की जरूरत थी, उस समय भी दुनिया के नेताओं का यही रवैया बना रहा. जलवायु परिवर्तन की आसन्न चुनौतियों से धरती को बचाने की जोरदार अपील करते हुये 15 साल की ग्रेटा ने कहा कि तमाम शोध रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गयी कि अगर अभी नहीं संभले तो जीवन के वजूद वाला यह ग्रह ‘गरम गोले’ में तब्दील हो जायेगा. इसके बावजूद दुनिया भर में इस पर कोई ‘कारगर पहल’ नहीं की गयी. 

उल्लेखनीय है कि कोप 24 के आगाज से पहले जारी की गयी एक रिपोर्ट के मुताबिक कार्बन उत्सर्जन का स्तर अपने शीर्ष बिंदु पर पहुंच गया है और इसमें अभी गिरावट का फिलहाल कोई संकेत नहीं दिख रहा है. रिपोर्ट में पेरिस समझौते में तय की गयी मंजिल को हासिल करने के लिये चल रहे प्रयासों की गति और मात्रा में तीन गुना बढ़ोतरी की बात कही गयी है. ऐसा होने पर ही पिछली एक सदी में धरती के तापमान में हुयी बढ़ोतरी में दो डिग्री सेल्सियस की गिरावट लायी जा सकेगी. 

रिपोर्ट में चौंकाने वाली बात यह भी सामने आयी है कि साल 2030 तक धरती का तापमान नियंत्रण के उपाय लागू करने की निर्धारित गति के मुताबिक मात्र 57 देश आगे बढ़ रहे हैं. इतना ही नहीं, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को धता बताते हुये भ्रामक अभियानों के जरिये दुनिया भर में प्रपंच फैलाने वाले तमाम संगठन और तेल कंपनियों के पैरोकार संभावित खतरे को झुठलाते रहे. इससे उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों को झटका लगा और इसके परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन ने इस साल के आखिर तक दुनिया भर में विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं की शक्ल में अपना असर दिखाना शुरु कर दिया है. 

विश्व मौसम संगठन के मुताबिक, 2018 बीते 138 सालों में अब तक का चौथा सबसे गरम साल रहा. जलवायु परिवर्तन जनित मौसम की चरम स्थितियों के कारण भारत सहित दुनिया के अधिकांश हिस्सों में तबाही का मंजर देखने को मिला. विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम करते हुये कुदरत के साथ कदमताल मिलाने की नसीहत देने वाली तमाम अध्ययन रिपोर्टों में ‘‘अभी नहीं तो कभी नहीं’’ की चेतावनी देते हुये एक बात साफ तौर पर कही गयी है कि धरती को जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से बचाने के लिये माकूल वक्त मुठ्ठी से रेत की तरह तेजी से फिसल रहा है.