लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं? इन कविताओं से 'अटल' हो गए वाजपेयी

लेखनी हो या फिर भाषण अटल बिहारी के धुर विरोधी नेता भी उनकी कविताएं पढ़ने के बाद उनकी तारीफ किए बिना नहीं रह पाते थे. 

लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं? इन कविताओं से 'अटल' हो गए वाजपेयी
फाइल फोटो

नई दिल्ली : देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का गुरुवार को निधन हो गया है. गुरुवार (16 अगस्त) को अटल बिहारी वाजपेयी ने दिल्ली स्थित एम्स में आखिरी सांसे ली. अटल आज बेशक से हमारे बीच न रहे हों, लेकिन उनकी कही हुई बातें और कविताएं हमेशा ही जीवन का हिस्सा रहेंगी. 

अटल बिहारी वाजयेपी को जितना प्रखर नेता थे, उतने ही वह प्रखर वक्ता भी थे. कविता लिखने के शौकीन और माहिर अटल संसद और कई मौकों पर इसका पाठ किए बिना नहीं रह पाते थे. लेखनी हो या फिर भाषण अटल बिहारी के धुर विरोधी नेता भी उनकी कविताएं पढ़ने के बाद उनकी तारीफ किए बिना नहीं रह पाते थे. अटल की कवितओं की जितनी तारीफ की जाए, उतनी ही कम होगी. आइए नजर डालते हैं उनकी कुछ कविताओं पर...

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1. गीत नया गाता हूं...
 टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर ,
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर,
झरे सब पीले पात,
कोयल की कूक रात,
प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूं।
गीत नया गाता हूँ।
टूटे हुए सपनों की सुने कौन सिसकी?
अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी।
हार नहीं मानूँगा,
रार नहीं ठानूँगा,
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ।
गीत नया गाता हूँ।
 
2. कर्तव्य के पुनीत पथ को
हमने स्वेद से सींचा है,
कभी-कभी अपने अश्रु और—
प्राणों का अर्घ्य भी दिया है।
 

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किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में—
हम कभी रुके नहीं हैं।
किसी चुनौती के सम्मुख
कभी झुके नहीं हैं।
 
आज,
जब कि राष्ट्र-जीवन की
समस्त निधियाँ,
दाँव पर लगी हैं,
और,
एक घनीभूत अंधेरा—
हमारे जीवन के
सारे आलोक को
निगल लेना चाहता है;
 
हमें ध्येय के लिए
जीने, जूझने और
आवश्यकता पड़ने पर—
मरने के संकल्प को दोहराना है।
 
आग्नेय परीक्षा की
इस घड़ी में—
आइए, अर्जुन की तरह
उद्घोष करें :
‘‘न दैन्यं न पलायनम्।’’

 
3. 
कौरव कौन, कौन पांडव, टेढ़ा सवाल है.
दोनों ओर शकुनि का फैला कूटजाल है.
धर्मराज ने छोड़ी नहीं जुए की लत है.
हर पंचायत में पांचाली अपमानित है.
बिना कृष्ण के आज महाभारत होना है,
कोई राजा बने, रंक को तो रोना है.

 

Atal Bihari Vajpayee
 
4. 
खून क्यों सफेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया.
बंट गए शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार गड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.
खेतों में बारूदी गंध,
टूट गए नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है.
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई.
अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं गैर,
खुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता.
बात बनाए, बिगड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.
 
5. 
जीवन की ढलने लगी सांझ
उमर घट गई, डगर कट गई
जीवन की ढलने लगी सांझ.
बदले हैं अर्थ, शब्द हुए व्यर्थ
शांति बिना खुशियां हैं बांझ.
सपनों में मीत, बिखरा संगीत
ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ.
जीवन की ढलने लगी सांझ.
 
6. 
क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंजिल भूले, यात्रा आधी.
जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे.
चिताभस्म की चिंगारी से,
अंधकार के गढ़ तोड़ेंगे.
 
7. 
न मैं चुप हूं, न गाता हूं
सवेरा है मगर पूरब दिशा में
घिर रहे बादल, रूई से धुंधलके में
मील के पत्थर पड़े घायल
ठिठके पांव, ओझल गांव
जड़ता है न गतिमयता
स्वयं को दूसरों की दृष्टि से
मैं देख पाता हूं
न मैं चुप हूँ न गाता हूं.
समय की सर्द सांसों ने
चिनारों को झुलसा डाला,
मगर हिमपात को देती
चुनौती एक दुर्ममाला,
बिखरे नीड़, विहंसे चीड़,
आंसू हैं न मुस्कानें,
हिमानी झील के तट पर
अकेला गुनगुनाता हूं,
न मैं चुप हूं न गाता हूं.

Atal Bihari Vajpayee
 
8. 
आओ फिर से दिया जलाएं
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें
बुझी हुई बाती सुलगाएं
आओ फिर से दिया जलाएं.
हम पड़ाव को समझे मंजिल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में
आने वाला कल न भुलाएं.
आओ फिर से दिया जलाएं.
आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज्र बनाने
नव दधीचि हड्डियां गलाएं.
आओ फिर से दिया जलाएं.
 
9. 
एक बरस बीत गया
झुलासाता जेठ मास
शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया
सीकचों में सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अंबर तक
गूंज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया 
पथ निहारते नयन
गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया
 
10. 
भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है.
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं.
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं.
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है.
यह चंदन की भूमि है, अभिनंदन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है.
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिंदु-बिंदु गंगाजल है.
हम जिएंगे तो इसके लिए
मरेंगे तो इसके लिए.