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जानें BHU को भूत विद्या शुरू करने की जरूरत क्यों पड़ी और कोर्स में क्या सिखाया जाएगा?

आमतौर पर लोग भूत का मतलब उस तथ्य से लगाते हैं जिसमें इस जीवन के बाद आत्मा का भूत बन जाने की बात होती है, पर भूत विद्या में ऐसा नहीं है.

जानें BHU को भूत विद्या शुरू करने की जरूरत क्यों पड़ी और कोर्स में क्या सिखाया जाएगा?

नई दिल्ली: बीएचयू में भूत विद्या का कोर्स शुरू किया जा रहा है. इस कोर्स की अवधि 6 माह होगी. और फीस होगी पूरे पचास हजार रुपये. बीएचयू के आयुर्वेद कालेज के डीन डॉ वायबी त्रिपाठी के मुताबिक इस कोर्स में साइकोसोमेटिक डिसऑर्डर, न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर,इडियोपैथिक डिसऑर्डर को जड़ से खत्म करने पर आयुर्वेद से संबंधित उपचार सिखाए जाएंगे उन पर प्रयोग भी किया जाएगा. इन प्रयोगों के परिणामों को सार्वजनिक किया जाएगा.

इडियोपैथिक को समझाते हुए डॉ त्रिपाठी "कहते हैं कि इडियोपेथिक यानी ऐसा कोई रोग यह कारण कुछ समझ नहीं आ रहा हो शारीरिक के रूप से जबकि ऊपर से सब कुछ सही लग रहा हो. साइकोसोमेटिक का संबंध प्रायोगिक मनोविज्ञान और उससे आए व्यवहारिक बदलाव से है. 

आमतौर पर लोग भूत का मतलब उस तथ्य से लगाते हैं जिसमें इस जीवन के बाद आत्मा का भूत बन जाने की बात होती है, पर भूत विद्या में ऐसा नहीं है. ये पंचमहाभूत यानि धरती, आकाश, अग्नि, जल और वायु से संबंधित है. हां! ये हो सकता है हमारे पास कुछ ऐसे मरीज आ जाएं जो कहें कि भूत लग गया है तो ऐसे लोगों का प्राचीन वैज्ञानिक विधि से इलाज हम ज़रुर करेंगे.

इस कोर्स में मन से संबंधित 16 तरह की बीमारियों पर काम होगा. इन बीमारियों का तीन गुणों यानि सत्व,रज और तम के आधार पर वर्गीकरण किया जाएगा और काउंसलिंग, हाथ में पहनने वाले ज्योतिषीय रत्न (Astrological Stone), मंत्र के प्रभाव और आयुर्वेदिक औषधियों (Herbs) के ज़रिए इलाज करने के प्रयोग सिखाए जाएंगे . उनके मुताबिक सारी बीमारियो में 66% बीमारी मन से संबंधित है और आयुर्वेद इनका इलाज करने में सक्षम जबकि एलोपैथी इसके लिए पूर्णत: कारगर नहीं है."

कोर्स के दौरान इस तरह के प्रयोग भी होंगे जैसे किसी को ज्योतिषी के हिसाब से रत्न पहनाए जाएंगे किसी पर केवल मंत्र के प्रभाव देखने जाएंगे,किसी पर दोनों के साथ दवाइयों का प्रयोग होगा.  मंत्रों के बारे में भारतीय ग्रंथों में ऐसे प्रमाण मिले हैं कि हरेक शब्द की एक खास ध्वनि होती है उसका प्रभाव कंपन्न पैदा करता है इससे मस्तिष्क और उसके सोचने के तरीके या विचारों के निर्माण पर पड़ता है मंत्र विज्ञान इसी तरह काम करता हैं. 

दिल्ली में एनडीएमसी अस्पताल के चीफ मेडिकल ऑफिसर के पद से रिटायर हुए डॉक्टर डी एम त्रिपाठी आयुर्वेद के नाड़ी ज्ञान विशेषज्ञ हैं वो कहते हैं कि "पंच महाभूत यानि धरती आकाश वायु अग्नि जल हमारे पर्यावरण को बनाते हैं और हमारे शरीर की रचना में इनका अहम योगदान है. इनमें कोई भी परिवर्तन हमारे शरीर के अंदर परिवर्तन का कारण बनते हैं. इन तत्वों की विशेषता और इनमें परिवर्तन के गहराई से अध्ययन से हमारे शरीर के बदलावों का पता लगाया जा सकता है.आयुर्वेद ,ज्योतिष और मंत्रों के मिक्स के जरिए उपचार संभव है.  

दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल और जयपुर के SMS अस्पताल में भी इस तरह के प्रयोग चल रहे हैं और वहां सफलता भी मिल रही है. उनके मुताबिक अलग-अलग रोगों में ध्वनि विज्ञान पर आधारित मंत्र बहुत कारगर होते हैं दुनिया में जो कुछ भी घटित हो रहा है  वह ऊर्जा तरंग आधारित है और उन तरंगों से संबंधित कुछ शब्द है जो पहले ही खोजे गए हैं ये शब्द उन तरंगों को उद्वेलित करते हैं ,शब्द मिलकर मंत्र बनते हैं और ये ध्वनि तरंगें ऊर्जा पैदा करती हैं और काम कर जाती हैं.

वहीं आयुर्वेद में कहा गया है कि वात यानि वायु तत्त्व,पित्त यानि अग्नि तत्त्व और कफ यानि जल तत्त्व इन तीनों तत्व के‌ अलग होने पर या किसी कॉन्बिनेशन में होने पर व्यक्ति की मोटे तौर पर व्यक्ति की पसंद नापसंद, उसकी व्यवहार गत विशेषताएं उसके रोगों के विशेषताएं पता लग जाती हैं इससे इलाज आसान हो जाता है."

दिल्ली के कई ज्वैलरी डिजाइनिंग इंस्टीट्यूट में जेमोलॉजी (रत्न विज्ञान) के विजिटिंग फैकल्टी साइंटिफिक जेमोलॉजिस्ट प्रसून दीवान अपने अनुभव के आधार पर बताते हैं  - "एस्ट्रोलॉजिकल स्टोन को एक तरह से रीसीवर मानिये जो ग्रहों से ट्रांसपोंड हो रही प्रकाश किरणों और तरंगों को रिसीव करते हैं. ये स्टोन हमारी त्वचा से टच करते हुए पहने जाते हैं. 

ये तरंगों को रीसीव करके हमारे सेंट्रल नर्वस सिस्टम में भेजते हैं जो हमारे न्यूरॉन्स को प्रभावित करते हैं और देखने में आया है कि लोगों का कॉन्फीडेंस बढ़ता है क्योंकि वो इस पर भरोसा करते हैं, इससे विचारों और फैसले पर असर पड़ता है इस तरह फैसले बदलने से व्यक्ति के काम करने की दिशा बदल जाती है. देखा जाए तो ये मनोविज्ञान का हिस्सा ही है. हालांकि इस विज्ञान को न जानने वालों नौसिखियों की वजह से इसका नाम बदनाम हुआ है इसलिए इसका अंधविश्वास की श्रेणी में रखा जाना दुखद है, इस पर पहले ही आधुनिक रिसर्च और स्टडी होनी थी लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया. "

BHU का ये कोर्स अगर कामयाब होता है तो योगा के बाद आने वाले समय में दूसरी भारतीय पद्धति यह होगी जो व्यापक स्वीकार्यता की ओर बढ़ेगी यानि ये कोर्स इसपर से अंधविश्वास का टैग हटाने में मील का पत्थर साबित होगा.