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JK News: लश्कर कमांडर मुसैब लखवी की प्रेमिका को कोर्ट से झटका, नजरबंदी हटाने की याचिका हुई खारिज

Jammu Kashmir News in Hindi: लश्कर कमांडर मुसैब लखवी की प्रेमिका को कोर्ट से झटका लगा है. उसकी नजरबंदी हटाने की याचिका खारिज कर दी गई है. 

JK News: लश्कर कमांडर मुसैब लखवी की प्रेमिका को कोर्ट से झटका, नजरबंदी हटाने की याचिका हुई खारिज

Shaista Maqbool News in Hindi: लश्कर कमांडर मुसैब लखवी के साथ कथित प्रेम संबंध रखने वाली शाइस्ता मकबूल उर्फ ​​"छोटी बहन" की पीएसए रद्द करने की अपील कोर्ट ने खारिज कर दी है. सुरक्षा बलों का आरोप है कि शाइस्ता का जम्मू-कश्मीर में लश्कर के एक आतंकवादी के साथ प्रेम संबंध था और लखवी की मौत के बाद वह नियंत्रण रेखा के पार आतंकी आकाओं के संपर्क में थी. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत नजरबंदी की उसकी अपील को बरकरार रखा है.

अधिकारियों ने आरोप लगाया कि शाइस्ता 2016 और 2018 के बीच सक्रिय आतंकवादी मुसैब लखवी के निकट संपर्क में थी और स्थानीय हलकों में कथित प्रेम संबंध के नाम पर काम कर रही थी.लखवी की मौत के बाद, उस पर एन्क्रिप्टेड चैनलों का इस्तेमाल करके अबू ज़हरान और अबू हंस सहित पाकिस्तान स्थित आकाओं के साथ संपर्क बनाने का आरोप था. 

'लखवी मुसैब' नाम से फर्जी अकाउंट

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उसने कथित तौर पर 'लखवी मुसैब' आईडी से एक फेसबुक अकाउंट इस्तेमाल किया था और आतंकवादी हलकों में 'छोटी बहन' जैसे उपनामों से जानी जाती थी, जो उत्तरी कश्मीर में लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) नेटवर्क को रसद और खुफिया सहायता प्रदान करती थी. 

हाई कोर्ट की खंडपीठ ने उसकी अपील यह कहते हुए खारिज कर दी कि उसकी नज़रबंदी का आदेश विशिष्ट, अस्पष्ट आधारों पर आधारित था. अदालत ने कहा कि सामान्य आपराधिक कानून उसकी गुप्त 'कुत्सित और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों' को रोकने के लिए अपर्याप्त माना गया. इस प्रकार पीएसए के तहत उसकी निवारक नज़रबंदी को उचित ठहराया गया.

हाई कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि न्यायिक समीक्षा, नज़रबंदी प्राधिकारी की व्यक्तिपरक संतुष्टि का विकल्प नहीं हो सकती, जब तक कि आदेश बिना उचित विचार किए जारी न किया गया हो, जो कि यहां मामला नहीं है. 

'छोटी बहन' तो आतंक परस्त निकली!

बता दें कि 'छोटी बहन' शाइस्ता मकबूल है, जो एक कथित ओवरग्राउंड वर्कर (OGW) और जम्मू-कश्मीर के बांदीपोरा से प्रतिबंधित लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) संगठन की प्रशंसक है. हिरासत संबंधी दस्तावेज़ और अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, शाइस्ता मकबूल मुसैब लखवी के साथ आतंकवादी गतिविधियों में शामिल थी.

अधिकारियों ने आरोप लगाया कि 2016 और 2018 के बीच मुसैब लखवी नामक एक सक्रिय आतंकवादी के साथ उसका "प्रेम संबंध" था और वह उसके निकट संपर्क में रही. आतंकवादी हलकों में उसे "छोटी बहन" और "छोटी" जैसे कई छद्म नामों से जाना जाता था.

पाकिस्तानी आकाओं के संपर्क में थी

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शाइस्ता ने सीमा पार के आतंकवादियों से संवाद करने के लिए "लखवी मुसैब" आईडी वाले एक फेसबुक अकाउंट का इस्तेमाल किया. मुसैब लखवी की मौत के बाद, उसने कथित तौर पर एन्क्रिप्टेड सोशल मीडिया चैनलों का उपयोग करके पाकिस्तान स्थित अबू ज़हरान और अबू हंस नामक आकाओं से संपर्क स्थापित किया.

अधिकारियों ने उस पर उत्तरी कश्मीर में लश्कर-ए-तैयबा नेटवर्क को महत्वपूर्ण खुफिया और रसद सहायता प्रदान करने का आरोप लगाया, जिसमें राजनीतिक नेताओं और संरक्षित व्यक्तियों की आवाजाही से संबंधित जानकारी भी शामिल थी. 

अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि वह आतंकवादियों के काम में मदद करने के लिए सीमा पार के आकाओं से सीधे निर्देश ले रही थी और आतंकवादियों द्वारा की गई हत्याओं की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने में शामिल थी.

जजों ने खारिज की नजरबंदी के खिलाफ अपील

मुख्य न्यायाधीश अरुण पल्ली और न्यायमूर्ति रजनीश ओसवाल की खंडपीठ ने शाइस्ता की नज़रबंदी के खिलाफ अपील खारिज कर दी, जिसका आदेश दिसंबर 2023 में दिया गया था.

अदालत ने इस तर्क को स्वीकार किया कि सामान्य आपराधिक प्रक्रियाएँ उसकी "गुप्त और गुप्त" राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों को रोकने के लिए अपर्याप्त थीं, जिससे निवारक नज़रबंदी आवश्यक हो गई. खंडपीठ के न्यायाधीशों ने सर्वोच्च न्यायालय के उदाहरणों का हवाला देते हुए फैसला सुनाया कि न्यायिक समीक्षा, नज़रबंदी प्राधिकारी की व्यक्तिपरक संतुष्टि का स्थान नहीं ले सकती, बशर्ते आदेश पर्याप्त सामग्री पर आधारित हो.

कोर्ट ने महिला पर क्या की टिप्पणी?

पीठ ने पुष्टि की कि सभी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन किया गया था. अदालत ने यह भी कहा कि शाइस्ता को 30 पृष्ठों की नजरबंदी सामग्री प्रदान की गई, सलाहकार बोर्ड के समक्ष व्यक्तिगत सुनवाई की गई और उसके प्रतिनिधित्व पर विचार किया गया और उसे अस्वीकार कर दिया गया.

पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि उसकी गतिविधियों और जम्मू-कश्मीर लोक सुरक्षा अधिनियम के तहत नजरबंदी की आवश्यकता के बीच एक स्पष्ट "सजीव और निकट संबंध" था, जो एक सही निर्णय है.

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