2019 का लोकसभा चुनाव स्वतंत्र भारत का सबसे अहम चुनावः येचुरी

उन्होंने कहा, ‘‘पिछले पांच साल में समाज को तोड़ने और देश एवं आम आदमी को आर्थिक बदहाली में धकेलने वाली मोदी सरकार की नीतियों से नाराज जनता ने सत्ता परिवर्तन का मूड बना लिया है

2019 का लोकसभा चुनाव स्वतंत्र भारत का सबसे अहम चुनावः येचुरी
एचुरी ने कहा कि सांप्रदायिक सोच वाला एक खास वर्ग है जो वामदल और अन्य विपक्षी दलों में बिखराव की धारणा को फैलाने में लगा है. (फाइल फोटो)

नई दिल्लीः विपक्षी दलों की एकजुटता पर उठते सवालों को सांप्रदायिक सोच वाले ‘खास तबके’ की रणनीति का नतीजा बताते हुए माकपा के महासचिव सीताराम एचुरी का कहना है कि इस चुनाव में सपा बसपा जैसे धुर विरोधी भी एकजुट हुए हैं. यह भाजपा आरएसएस की घातक नीतियों के खिलाफ बने जनमानस का ही नतीजा है जिसने देशहित में जन्मजात राजनीतिक विरोधियों के मिलने की जमीन तैयार की. एचुरी ने पीटीआई भाषा को बताया कि इस चुनाव का मकसद महज सत्ता परिवर्तन नहीं है बल्कि भाजपा आरएसएस की विखंडनकारी नीतियों से देश को निजात दिलाना है. इसलिए यह चुनाव स्वतंत्र भारत का सबसे अहम चुनाव बन गया है. 

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उन्होंने कहा, ‘‘पिछले पांच साल में समाज को तोड़ने और देश एवं आम आदमी को आर्थिक बदहाली में धकेलने वाली मोदी सरकार की नीतियों से नाराज जनता ने सत्ता परिवर्तन का मूड बना लिया है. इसे समझते हुए ही सपा, बसपा और तेदेपा, कांग्रेस जैसे दल इस चुनाव में एक साथ आए हैं.’’ वामदलों के अलग थलग पड़ने के सवाल पर एचुरी ने कहा कि सांप्रदायिक सोच वाला एक खास वर्ग है जो वामदल और अन्य विपक्षी दलों में बिखराव की धारणा को फैलाने में लगा है. वामदलों सहित पूरा विपक्ष मोदी सरकार को हटाने के लिए एकजुट है. हमारी पूर्व निर्धारित रणनीति के तहत ही, राज्यों में जहां जिसके एक साथ आने की जरूरत थी, वहां वे सभी दल, एक साथ आए हैं.’’ 

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बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्यों में कांग्रेस के साथ नहीं आने से भाजपा को चुनावी लाभ होने के सवाल पर उन्होंने कहा, ‘‘किसी विपक्षी दल के साथ आने से जहां भाजपा को लाभ होने की आशंका हो, वहां उसके साथ गठजोड़ की क्या जरूरत है.’’ उन्होंने दलील दी कि छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में भी अजीत जोगी और बसपा के अलग लड़ने से भाजपा को लाभ होने की बात कही गयी थी, लेकिन नतीजा उलट ही रहा. मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी बसपा कांग्रेस के साथ नहीं थी. इससे साफ है कि जहां जैसी जरूरत है उसके मुताबिक ही गठजोड़ हो रहे हैं. एचुरी से पूछा गया कि राजग के घटक दल समय रहते एकजुट होकर प्रचार में जुट गए हैं जबकि बिहार, पश्चिम बंगाल और दिल्ली में गठबंधन पर स्थिति साफ नहीं होने से विपक्ष में बिखराव साफ दिख रहा है.

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इस पर उन्होंने कहा, ‘‘हमसे ज्यादा बिखराव राजग में है. रालोसपा जैसे राजग के घटक दल हों या शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद जैसे दिग्गज नेता हों, आखिर ए कौन लोग हैं जो भाजपा छोड़ रहे हैं.’’ उन्होंने कहा, ‘‘इस बिखराव से ध्यान भटकाने के लिए एक प्रकार के राजनीतिक ध्रुवीकरण की छद्म तस्वीर दिखायी जा रही है. हकीकत यह है कि जनता में मोदी सरकार को हटाने के लिए ध्रुवीकरण हो चुका है. यह ध्रुवीकरण अलग अलग राज्यों में अलग अलग रूप में जाहिर हो रहा है. यही वजह है कि पहली बार जन्मजात राजनीतिक दुश्मन भी एक साथ आए हैं.’’ एचुरी ने अपने पिछले चुनावी अनुभवों के आधार पर कहा, ‘‘राजनीति, महज अंकगणित नहीं है बल्कि व्यापक जनमत का खेल है. पूरे देश में सामान्य तौर पर जनता ने अपना मत (मूड) तय कर लिया है. देशव्यापी स्तर पर राजनीतिक मंथन चल रहा है, जिसका असर विभिन्न रूपों में चुनाव के बाद दिखेगा.’’

(इनपुट भाषा)