दिवाली हो या ईद, यहां लोग नहीं करवाते घरों की पुताई

घर में दिवाली या ईद का मौका हम अपने घरों को सजाते हैं संवारते हैं, घरों की पुताई-रंगाई करते हैं लेकिन रतलाम में एक गांव ऐसा है जहां लोग ऐसा नहीं करते जानिए क्यों। 

दिवाली हो या ईद, यहां लोग नहीं करवाते घरों की पुताई
प्रतीकात्मक तस्वीर

रतलाम: घर में त्योहर का मौका हो तो हम अपने घरों को सजाते हैं संवारते हैं, घरों की पुताई-रंगाई करते हैं लेकिन रतलाम में एक गांव ऐसा है जहां लोग ऐसा नहीं करते। 

कछलिया गांव में बड़ी-बड़ी इमारतें नज़र आ जाएंगी। लेकिन उनपर रंग-रोगन नहीं किया जाता है।

चाहे त्योहार का मौका हो, या फिर शादी ब्याह का। सदियों से इस गांव में ये प्रथा चली आ रही है, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी निभाया जा रहा है।

इतना ही नहीं गांव के लोग ना तो काले जूते पहनते हैं और ना ही भैरव मंदिर से गुज़रते वक्त दूल्हा घोड़ी चढ़ता है।

और तो और आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि गांव के लोग कभी छानकर पानी नहीं पीते हैं।

कहा जाता है कि ये सबकुछ काल भैरव के आदेश पर किया जाता है। मान्यता है कि जो भी गांव में विराजमान काल भैरव का आदेश नहीं मानता है उसके यहां मौत हो जाती है।

गांव वाले इसके पीछे कहानी भी बताते हैं, मान्यता है कि बहुत समय पहले इस गांव में एक अंग्रेज आया था।

उसने मंदिर के पास वाले तालाब से मछली पकड़ी और गांव वालों के मना करने के बाद भी उसे पकाने के लिए काटने लगा, लेकिन जैसे ही उसने मछली पर वार किया, तालाब खून से लाल हो गया।

लोगों ने भैरव जी से माफी मांगी और मछली को फिर से तालाब में डाल दिया।

कहा जाता है कि काल भैरव की कृपा से मछली फिर से जिंदा हो गई, तभी से गांव में भैरव जी के आदेश का सम्मान किया जाता है।