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डाकुओं के सरदार रहे मोहर सिंह की PM मोदी से गुहार, बोले- देश की धरोहरों को बचा लें

 कभी आतंक का पर्याय रहे मोहर सिंह ने खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इन मंदिरों के जीर्णोद्धार की मांग की है, ताकि देश की धरोहरें सुरक्षित रह सकें और साथ ही देश की शान के रूप में बनी रहे.

डाकुओं के सरदार रहे मोहर सिंह की PM मोदी से गुहार, बोले- देश की धरोहरों को बचा लें
मोहर सिंह ने 1972 में कर दिया था आत्मसमर्पण

ग्वालियरः चंबल के बियाबान बीहड़ो में दशकों तक समानांतर सरकार चलाकर अपना लोहा मनबाने वाले एक सैकड़ा डकैतों के सरदार आत्मसमर्पित दस्यु मोहर सिंह अब अपने जीवन के आखिरी पड़ाव पर पहुंच कर चम्बल की ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने के लिए प्रयास में लग गए हैं. दरअसल, भिंड जिले के मेहगांव तहसील में रहने वाले आत्मसमर्पित डकैत मोहर सिंह गुर्जर ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मुरैना में गुर्जर प्रतिहार राजवंश के निर्मित 9वीं सदी के बटेश्वर स्थित शिव मंदिरों की शृंखला में शामिल जर्जर मंदिरों के जीर्णोद्धार का आग्रह किया है. 

पूर्व दस्यु मोहर सिंह का कहना हैं कि गुर्जर प्रतिहार राज वंशकालीन यह ऐतिहासिक धरोहर शिव मंदिर गुर्जर समाज के साथ-साथ इस अंचल के प्राचीन इतिहास की धरोहर है. यह दुर्भाग्य की बात है कि 200 मंदिरों की श्रंखला में से सिर्फ 80 मंदिरो का ही जीर्णोद्धार किए गया है. वहीं बाकि के मंदिर आज भी अवशेष के रूप में जर्जर हालात में बिखरे पड़े हैं. 

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उन्होंने कहा कि ऐसी प्राचीन धरोहर को आर्कोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) नजरंदाज कर रहा है. 6 सितंबर 2019 को लिखे गए हस्तलिखित पत्र में दस्यु मोहर सिंह गुर्जर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इन ऐतिहासिक पुरासंपदाओं के जीर्णोद्धार का अनुरोध किया है. साथ ही चम्बल के सभी मंदिरों के उद्धार का प्रयास कर रहे हैं. कभी डकैत रहे मोहर सिंह अब प्रधान मंत्री के पत्र के जबाब का इंतजार कर रहे हैं.

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बता दें कि बटेश्वर मंदिरों की यह श्रृंखला दूर-दराज के इलाकों में स्थित है, जिसके चलते इस इलाके में कभी डाकुओं का दबदबा हुआ करता था, लेकिन अब यहां से डकैतों का खौफ खत्म हो चुका है. ऐसे में कभी आतंक का पर्याय रहे मोहर सिंह ने खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इन मंदिरों के जीर्णोद्धार की मांग की है, ताकि देश की धरोहरें सुरक्षित रह सकें और साथ ही देश की शान के रूप में बनी रहे. आपको बता दें कि एक समय पर मोहर सिंह के सिर पर 2 लाख का ईनाम था, लेकिन 1972 में आत्मसमर्पण करने के बाद वह कई साल जेल में रहे और अब महगांव कस्बे में गुमनामी की जिंदगी बिता रहे हैं.