भैरव अष्टमी: आगर मालवा का वो प्राचीन मंदिर, जहां जंजीरों में कैद हैं भैरव बाबा!

आगर मालवा के केवड़ा स्वामी मंदिर में भैरव बाबा की प्रतिमा को जंजीरों में जकड़कर रखा गया है, जिसके पीछे कई पौराणिक मानयताएं हैं. 

भैरव अष्टमी: आगर मालवा का वो प्राचीन मंदिर, जहां जंजीरों में कैद हैं भैरव बाबा!
ये प्राचीन मंदिर आगर मालवा के सबसे बड़े तालाब मोती सागर के पास है. मंदिर के पास ही केवड़े के फूलों का बगीचा है.

भोपाल: देशभर में आज भैरव अष्टमी की पूजा की जा रही है. इस अवसर पर हम आपको बताने जा रहे हैं, आगर मालवा के उस प्राचीन मंदिर के बारे में, जहां भैरव बाबा की प्रतिमा को जंजीरों में जकड़कर रखा गया है. आगर मालवा के केवड़ा स्वामी मंदिर की जो देशभर में प्रसिद्ध है. बताते हैं कि इस मंदिर की विशेषता और मान्यताओं के चलते जो भी इसके बारे में सुनता है, वो यहां दर्शन के लिए चला आता है.

ये प्राचीन मंदिर आगर मालवा के सबसे बड़े तालाब मोती सागर के पास है. मंदिर के पास ही केवड़े के फूलों का बगीचा है, जहां से हर वक्त केवड़े की खुशबू आती है. यही वजह है कि लोग मंदिर को केवड़ा स्वामी के नाम से जानते हैं. हर साल भैरव पूर्णिमा और अष्‍टमी पर बड़ी संख्‍या में यहां दर्शनार्थी आते हैं. ये दर्शनार्थी मंदिर के परिसर में ही दाल बाटी बनाते हैं और भगवान को भोग भी लगाते हैं. इसके अलावा भक्‍त भैरव बाबा को मदिरा का भी भोग लगाते हैं. भैरव महाराज के मंदिर में नवविवाहित जोड़ों की भी काफी भीड़ दिखाई देती है. जिन भी परिवारों के कुल देवता भैरव हैं, वो अपने परिवार के नवविवाहित जोड़ों को यहां आशीर्वाद दिलवाने लाते हैं.

इस मंदिर की सबसे खास बात ये है कि यहां भैरव बाबा की प्रतिमा को जंजीरों से बांधकर रखा गया है. ऐसा कहा जाता है कि भैरव बाबा अपने मंदिर को छोड़कर बच्चों के साथ खेलने चले जाया करते थे. वहीं, जब उनका मन भर जाता था, तो वे बच्चों को उठाकर तालाब में फेंक देते थे. यही वजह है कि केवड़ा स्वामी के भैरव नाथ को जंजीरों से बांध दिया गया. साथ ही उन्हें रोकने के लिए उनके आगे एक खंभा भी लगा दिया गया. ताकि भगवान उत्पात ना मचाएं और लोगों को परेशान ना करें.

केवड़ा स्वामी मंदिर का इतिहास बेहद पुराना है. मान्‍यता है कि वर्ष 1424 में केवड़ा स्वामी मंदिर बनने से पहले झाला राजपूत परिवार के कुछ लोग अपने कुल देवता भैरव बाबा को गुजरात से लेकर जा रहे थे. इसी दौरान रत्‍नसागर तालाब किनारे उनके रथ का चक्का थम गया और भैरव महाराज यहीं बस गए. माना जाता है कि झाला वंश के राजा राघव देव ने इस प्रतिमा की स्थापना की थी. ये झाला राजपूत समाज के कुलदेव भी हैं.

काल भैरव को भगवान शिव का ही रूप माना जाता है. काल भैरव अष्टमी को कालाष्टमी भी कहते हैं. इस दिन इनका प्राकट्य हुआ था, इसलिए इनकी विधि-विधान से पूजा की जाती है. माना जाता है कि काल भैरव अपने भक्तों पर सदैव कृपा बनाए रखते हैं और इनकी पूजा करने से घर से नकारात्मक शक्तियां भी दूर हो जाती हैं. साथ ही काल भैरव की पूजा से शत्रुओं पर भी विजय प्राप्त होती है.