वाह रे MP: नसबंदी शिविर में किया पैसे लेकर ऑपरेशन, परिजनों की गोद बना स्ट्रेचर

मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले में भारत सरकार का राष्ट्रीय कार्यक्रम नसबंदी शिविर लापरवाही की भेंट चढ़ गया.

वाह रे MP: नसबंदी शिविर में किया पैसे लेकर ऑपरेशन, परिजनों की गोद बना स्ट्रेचर
नसबंदी शिविर में परिजनों की गोद महिला मरीजों का स्ट्रेचर बनी तो नसबंदी कराने आई महिलाओं को ऑपरेशन कराने के लिए दो सौ रुपये मिलने के बजाय पांच-पांच सौ रुपये भी देने पड़े

टीकमगढ़ (आर.बी.सिंह परमार): मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले में भारत सरकार का राष्ट्रीय कार्यक्रम नसबंदी शिविर लापरवाही की भेंट चढ़ गया. अव्वल तो शिविर में नसबंदी कराने आई महिलाओं को ऑपरेशन के लिए अपनी जेब ढीली करनी पड़ी वहीं दूसरी ओर उन्हें आने-जाने के लिए स्ट्रेचर तक नसीब नहीं हुआ. जानकारी के मुताबिक नसबंदी शिविर में परिजनों की गोद महिला मरीजों का स्ट्रेचर बनी तो नसबंदी कराने आई महिलाओं को ऑपरेशन कराने के लिए दो सौ रुपये मिलने के बजाय पांच-पांच सौ रुपये भी देने पड़े.

ये कहानी एमपी के स्वास्थ्य मंत्री के प्रभार वाले जिले की है
जी हां, हम बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री रुस्तम सिंह के प्रभार वाले टीकमगढ़ जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र बल्देवगढ़ की. यहां अस्पताल में आयोजित शिविर में न तो महिलाओं को उनके घर तक छोड़ने के लिए वाहन की व्यवस्था की गई और न ही उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए स्ट्रेचर उपलब्ध कराए गए. वहीं अब स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी पूरे मामले की जांच कर कार्यवाही की बात कह रहे हैं.

ऐसा रहा तो लोग नसबंदी कराने से ही कतराने लगेंगे
जानकारी के मुताबिक टीकमगढ़ जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बल्देवगढ़ में एक दिन पहले लगा नसबंदी शिविर अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ गया. अस्पताल में स्ट्रेचर की व्यवस्था न होने के कारण शिविर में आलम ये था कि महिला मरीजों को उनके परिजन गोद में उठाकर इधर से उधर जा रहे थे. शिविर में नसबंदी कराने आईं महिलाओं को जिस तरह की असुविधाओं का सामना करना पड़ा उससे नसबंदी के प्रति जागरूकता बढ़ना तो दूर बल्कि लोग नसबंदी कराने से ही कतराने लगेंगे.

न स्ट्रेचर मिला न वाहन, पैसे अलग से देने पड़े
शिविर में नसबंदी कराने आई महिलाओं को जहां अपना ऑपरेशन कराने के लिए पांच-पांच सौ रुपये देने पड़े ऊपर से ऑपरेशन कराने के बाद उन्हें घर तक छोड़ने के लिए वाहन तक की व्यवस्था नहीं की गई और उन्हें खुले आसमान के नीचे घंटों इंतजार करने के बाद किसी तरह किराये पर प्राइवेट वाहन लेकर घर पहुंचना पड़ा.

ठेकेदार का 'बहाना', उसे पता ही नहीं था
इस संबंध में नसबंदी शिविर के दौरान महिलाओं को उनके घर तक छोड़ने के लिए वाहन उपलब्ध कराने वाले वाहन ठेकेदार सुशील अग्रवाल का कहना है कि उन्हें शिविर के बारे में पहले से कोई सूचना नहीं दी गई. दस मिनिट पहले ही सूचना मिली इसलिए वो वाहनों की व्यवस्था नहीं कर सका. इस बारे में टीकमगढ़ के स्वास्थ्य महकमे की सीएमएचओ डॉ.वर्षा राय का कहना है कि इस पूरे मामले की उन्हें कोई जानकारी नहीं है और अब जानकारी मिलने पर वह बीएमओ से जानकारी कर दोषियों के खिलाफ कार्यवाही करेंगी.

परिजनों के गोद में गईं मरीजें
शासकीय नियमों के अनुसार महिलाओं को नसबंदी के लिए प्रेरित करने पर दो सौ रुपये प्रेरक राशि प्रदान करने के साथ-साथ नसबंदी कराने वाली महिलाओं को अस्पताल में बेड और नाश्ता के अलावा उन्हें परिवहन की व्यवस्था मुफ्त दी जाती है ताकि वे अपने घर तक आसानी से पहुंच सकें. लेकिन, अस्पताल में अव्यवस्थाओं और संवेदनहीनता का स्तर ये था कि महिलाओं को अपना ऑपरेशन कराने के लिये 500-500 रुपये देने पड़े. हैरानी की बात तो यह है कि शिविर में सर्जरी वाले मरीजों को यहां से वहां ले जाने के लिए स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं होने के कारण लोगों को अपने मरीजों को गोद में उठाकर इधर से उधर ले जाना पड़ा.

इसलिए सरकार लगाती है शिविर
आपको बता दें कि शासन की ओर से मुफ्त नसबंदी शिविर की व्यवस्था इसलिए की जाती है ताकि लोगों को नसबंदी के लिए जागरूक किया जा सके और उन्हें इसकी सुविधा नजदीकी स्वास्थ्य केन्द्रों पर उपलब्ध हो सके, लेकिन, प्रशासन में बैठे संवेदनहीन लोग इन शिविरों के औचित्य पर ही सवाल खड़ा कर जाते हैं.