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छत्तीसगढ़ः वैज्ञानिकों ने 6 साल की रिसर्च के बाद तैयार की धान की नई किस्म, यह है खासियत

अब तक बस्तर में धान की जो भी प्रजाति विकसित हुई है वह इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा की गई है, लेकिन ''बस्तर धान-1'' की यह किस्म 1992 से संचालित अखिल भारतीय समन्वित चावल सुधार परियोजना द्वारा विकसित धान की पहली किस्म है. 

छत्तीसगढ़ः वैज्ञानिकों ने 6 साल की रिसर्च के बाद तैयार की धान की नई किस्म, यह है खासियत
धान की प्रजाति '' बस्तर धान -1 '' का ईजाद बस्तर के लिए गौरव की बात है.

(अविनाश प्रसाद/बस्तर)/नई दिल्लीः 6 साल के रिसर्च के बाद बस्तर की वैज्ञानिक बेटी ने चार वैज्ञानिकों के साथ मिलकर धान की नई किस्म ''बस्तर धान-1'' का निर्माण कर दिखाया है. बस्तर में इस धान की किस्म का ईजाद एक बड़ी क्रन्तिकारी घटना है. लगभग पूरी तरह से बारिश पर निर्भर बस्तर के किसान और खेती के लिए यह खोज बेहद महत्वपूर्ण है. कम पानी वाली  मरहान भूमि पर भी ''बस्तर धान-1'' आसानी से रोपा जा सकेगा और एक हेक्टेयर में ही  किसान  35- 40 क्विंटल तक उत्पादन कर सकेंगे. कृषि वैज्ञानिक डॉ. सोनाली कर ने बताया कि अब तक बस्तर में धान की जो भी प्रजाति विकसित हुई है वह इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा की गई है, लेकिन ''बस्तर धान-1'' की यह किस्म 1992 से संचालित अखिल भारतीय समन्वित चावल सुधार परियोजना द्वारा विकसित धान की पहली किस्म है. 

27 सालों से किए जा रहे धान अनुसंधान के प्रयास को साकार रूप देकर इस किस्म को विकसित किया गया है. धान की इस किस्म की खेती का किसानों को फायदा मिलेगा. अब तक बस्तर के किसान मरहान भूमि में धान की खेती कर एक हेक्टेयर 20-25 क्विंटल धान का उत्पादन करते थे. बस्तर धान-1 का उपयोग कर किसान प्रति हेक्टेयर 35- 40 क्विंटल तक उत्पादन कर सकेंगे.

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105 से 110 दिन में फसल तैयार हो जाएगी 
बस्तर धान 1 जल्दी पकने वाली किस्म है. इसकी खेती सीधी बुआई में अधिक फायदेमंद साबित होगी. वैज्ञानिकों ने बताया कि अब सामान्य रूप से मरहान भूमि में धान की फसल 130-140 दिनों में तैयार होती है. लेकिन इस नई किस्म का धान 105 से 110 दिनों में तैयार हो जाएगी. इस फसल पर झुलसा रोग का कोई असर नहीं पड़ेगा. इसमें झुलसा रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधक क्षमता भी है . 

बस्तर और सरगुजा को सबसे अधिक फायदा
सबसे अधिक फायदा मरहान में खेती करने वाले बस्तर व सरगुजा जिले के किसानों को मिलेगा. डॉ. सोनाली कर ने बताया कि प्रदेश में धान की खेती 36 लाख हेक्टेयर में की जाती है. जिसमें 30-35 क्षेत्र उच्चहन भूमि है. धान की खेती भिन्न-भिन्न भू परिस्थतियों में की जाती है. इसमें मरहान टिकरा भूमि शामिल है. उन्होंने बताया कि उच्चहन भूमि की मिट्टी हल्की होती है और इसकी जलधारण क्षमता कम होती है. 

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आने वाले साल में बेहद काम आएगी ये किस्म
शोध में डॉ सोनाली कर के अलावा कीट वैज्ञानिक डॉ. एनपी मंडावी, पौध रोग वैज्ञानिक आरएस नेताम के साथ शस्य वैज्ञानिक डॉ. मनीष कुमार शामिल रहे. बस्तर की बेटी डॉ सोनाली कर शुरू से ही किसानो के लिए कुछ अच्छा करना चाहती थीं. इन्होनें कृषि में जगदलपुर से स्नातक, रायपुर से स्नातकोत्तर और रांची के बिरसा विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि हांसिल की.  लगातार एक दशक तक इन्होने इस विषय पर कई प्रयोग किये हैं.

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डॉ सोनाली की इस सफलता से कृषि विज्ञानं केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक बेहद खुश हैं.  उनका मानना है की  धान की इस नयी प्रजाति के ईजाद से न केवल कृषकों को फायदा मिलेगा बल्कि बस्तर में रिसर्च के नए आयाम स्थापित होंगे.  कम संसाधनों में प्रयोग कर बड़ी सफलता हांसिल करना अपने आप में बड़ा कठिन कार्य है.  शासकीय कृषि विज्ञानं केंद्र जगदलपुर के संचालक, वरिष्ठ वैज्ञानिक  मनीष नाग के मुताबिक डॉ अंजलि शुरू से ही मेहनती और किसानों की हितैषी रही हैं.  वे उनकी शिष्या भी रही हैं.  धान की प्रजाति ''बस्तर धान -1'' का ईजाद बस्तर के लिए गौरव की बात है.